दुनियाभर में तेज़ी से बढ़ रहा इस्लामिक बैंक क्या है और कैसे है ये आम बैंकों से अलग?

चारों तरफ इस्लामिक बैंक का शोर मचा है. आइए आज आपको बताते हैं कि ये होता क्या है?

बैंगलोर की एक वित्तीय फर्म पर करोड़ों की धोखाधड़ी के आरोप लगे हैं. फर्म का नाम है- IMA. ये इस्लामिक बैंक और हलाल इन्वेस्टमेंट फर्म है जिसकी स्थापना 2006 में हुई थी. फर्म चलानेवालों का अपने निवेशकों से हर महीने 14% से 18% रिटर्न का वादा था. धीरे धीरे फर्म पोंज़ी स्कीम की राह पर चल निकली, नतीजतन लोगों के 2 हजार करोड़ रुपए अब दांव पर हैं, जिनमें स्वाभाविक तौर पर मुस्लिम समुदाय से ज़्यादा लोग हैं.

अब आपके दिमाग में कौंध रहा होगा कि ये इस्लामिक बैंक और हलाल इन्वेस्टमेंट फर्म होता क्या है? आइए तो बताते हैं आपको.

नाम से ही स्पष्ट है कि इस्लामिक बैंक इस्लाम को माननेवालों के लिए बनाए गए हैं. इसमें शरिया के नियम लागू होते हैं. ब्याज़ लेने और देने की साफ मनाही होती है जो इस्लाम के हिसाब से ‘हराम’ माना जाता है. बहुत सारे मुसलमान सामान्य बैंकों से खुद को दूर रखते रहे हैं क्योंकि इसकी प्रणाली में सूदखोरी अहम हिस्सा है. ऐसे ही धर्मनिष्ठ मुस्लिमों को बैंकिंग से जोड़ने के लिए इस्लामिक बैंक और हलाल इन्वेस्टमेंट फर्म्स स्थापित की गईं.

पाकिस्तान से इस्लामिक बैंक खोलने की शुरूआत हुई. 1963 में मिस्र ने इसे पहली बार खोला लेकिन 1968 में सरकार ने इसे बंद कर दिया. फिर 1972 में इसकी शुरूआत हुई और ये चल पड़ा, जबकि भारत में कोच्चि इसकी प्रयोगस्थली बना जिसमें राज्य की भी हिस्सेदारी थी.

इस्लामिक बैंक के ग्राहकों को पैसा जमा करने पर ब्याज़ नहीं मिलता है. इसी तरह कर्ज़ दिए जाने पर बैंक भी ब्याज़ नहीं वसूलता. हां अगर खाते में जमा हुए पैसे से बैंक को फायदा हुआ तो वो तोहफे के तौर पर कुछ ना कुछ देता है.

अच्छे व्यवहार को आधार बनाकर बैंक में लोन पास किए जाते हैं. लोन लेनेवाला जितनी रकम लेता है उतनी ही वापस करता है, यानि ब्याज़ नहीं देना होता. किसी को अगर बैंक से रकम लेकर कोई सामान खरीदना होता है तो बैंक पहले उस सामान को खुद खरीदता है और फिर खरीदार को लाभ जोड़कर बेचता है. इसके बाद खरीदार बैंक को किश्तों में पैसा चुकाता रहता है. ये प्रक्रिया फ्रिज जैसे सामान से लेकर मकान खरीदने तक पर लागू होती है.

इस्लामिक बैंक ट्रस्ट की तरह काम करता है. शराब, जुआ या पोर्नोग्राफी में ये निवेश नहीं करता. फिक्स्ड इनकम, बॉन्ड्स और डिबेंचर्स की अनुमति भी इस्लाम में नहीं है.  हालांकि, इस्लामिक कानून में ‘सुकूक’ की अवधारणा है जो बॉन्ड के रूप में शरिया आधारित फाइनैंशल प्रॉडक्ट है. इस्लामिक बैंक अपने यहां जमा रकम का मुख्य तौर पर अचल संपत्ति खरीदने में निवेश करते हैं.

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