क्या है झटका और हलाल मीट में अंतर, जिस पर ट्रोल हो रहा Zomato

मुस्लिम डिलिवरी बॉय को मना करने वाले शख्स को जोमैटो ने जो जवाब दिया वो वायरल हो गया. उसके नीचे इस ट्वीट को लेकर लोग शिकायत कर रहे हैं.

मुस्लिम डिलिवरी बॉय को मना करने वाले शख्स को जोमैटो ने जो जवाब दिया वो वायरल हो गया. उस जवाब के नीचे बहुत सारे लोगों ने अपनी प्रतिक्रिया दी. उन ट्वीट्स में कई जगह एक स्क्रीनशॉट मिला. किसी वाजिद ने हलाल मीट न मिलने की शिकायत करते हुए ऑर्डर कैंसिल किया था. उस पर जोमैटो के पॉजिटिव रिस्पॉन्स को टारगेट किया जा रहा था.

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अब सामने कुछ सवाल हैं.

 

1. हलाल मीट क्या है?
2. इस्लाम में हलाल मीट पर जोर क्यों दिया जाता है?
3. हलाल के अलावा और कौन सा मीट मिलता है?
4. इन सब तरीकों के मीट में अंतर क्या है?

इन सवालों के जवाब कुछ इस तरह मिलेंगे. यहां हलाल और झटका, इन दो तरह के मीट की बात होती है. दुनिया में तीन मुख्य तरीके जानवरों को काटकर उनका मांस प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. हलाल, झटका और शेचिता. शेचिता तरीका यहूदियों में बहुत पुराने समय से इस्तेमाल होता आ रहा है. हमारे देश में इसका कोई खास रोल नहीं है इसलिए बाकी दो तरीकों पर बात करते हैं.

हलाल और झटके में अंतर

हलाल और झटका, इन दोनों तरीकों में एक तेज़ धार वाला हथियार होता है और एक जानवर की गर्दन होती है. दोनों ही तरीकों में जानवर की गर्दन काटी जाती है, जानवर की मौत हो जाती है, इंसान को मीट मिलता है. इन दोनों तरीकों में अंतर अब अंतर न रहकर विवाद की हद तक जा पहुंचा है.

धार्मिक अंतर

पहला अंतर धार्मिक है. मुसलमान किसी भी हाल में हलाल मीट ही खाते हैं जबकि सिख और हिंदू झटका मीट को वरीयता देते हैं. हलाल करने से पहले कलमा पढ़ने और गर्दन पर तीन बार छुरी फेरने की मान्यता है. इस्लामिक कानून के मुताबिक जानवर हलाल के समय बेहोश नहीं होना चाहिए.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिसर्च के मुताबिक हलाल जानवरों को काटने का पारंपरिक तरीका है. 20वीं सदी में सिखों ने सिर्फ अलग तरीके का प्रचार करने के लिए झटका को महिमामंडित किया और बताया कि इससे जानवर को मारने में कम दर्द होता है. कुल मिलाकर दोनों तरफ की मान्यताएं समय के साथ मजबूत होती गईं और अब मीट के दुकानदारों ने अपना कस्टमर बेस तैयार कर लिया है. हलाल और झटका मीट की दुकानें अलग होने लगी हैं.

हलाल के अलावा कोई भी मीट इस्लाम में प्रतिबंधित है इसलिए हलाल मीट पहचानने के बहुत से तरीकों पर बहस चलती रही है. पिछले साल हैदराबाद में नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन मीट के वैज्ञानिकों ने एक रिसर्च की थी. रिसर्च में हलाल की गई भेड़ और बिजली के झटके से मारी गई भेड़ के मीट पर रिजल्ट देखा गया. वैज्ञानिकों ने बताया कि दोनों के मांस में काफी अंतर है. इस टेस्ट के बाद वैज्ञानिकों ने ‘डिफरेंस जेल इलेक्ट्रोफॉरेसिस’ नाम का एक तरीका निकाला जिससे मीट की पहचान की जाती है कि वो हलाल है या झटका.

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काटने के तरीके में अंतर

हलाल मीट के लिए जानवर की गर्दन को एक तेज धार वाले चाकू से रेता जाता है. सांस वाली नस कटने के कुछ ही देर बाद जानवर की जान चली जाती है. मुस्लिम मान्यता के मुताबिक हलाल होने वाले जानवर के सामने दूसरा जानवर नहीं ले जाना चाहिए. एक जानवर हलाल करने के बाद ही वहां दूसरा ले जाना चाहिए.

झटका का नाम बिजली के झटके से आया है. इसमें जानवर को काटने से पहले इलेक्ट्रिक शॉक देकर उसके दिमाग को सुन्न कर दिया जाता है ताकि वो ज्यादा संघर्ष न करे. उसी अचेत अवस्था में उस पर झटके से धारदार हथियार मारकर सिर धड़ से अलग कर दिया जाता है.

जानवर को होने वाला दर्द

दोनों ही तरीकों के पैरोकार क्लेम करते हैं कि हमारे तरीके में जानवर को कम दर्द होता है. हलाल वाले कहते हैं कि तेज धार चाकू से सांस की नली कटने से कुछ ही सेकेंड्स में जान चली जाती है. वो दर्द से तड़पता भी नहीं है. झटका की तरफदारी करने वाले कहते हैं कि इस तरीके में तो जानवर को सांस लेने का भी मौका नहीं मिलता. उन्हें पता भी नहीं चलता कि गर्दन कब कट गई. हलाल वालों का कहना है कि झटका से जानवर मारने से पहले ही उनकी दुर्गति हो चुकी होती है. उन्हें भूखा प्यासा रखा जाता है. जबकि हलाल करने से पहले जानवर को खूब खिलाया पिलाया जाता है.

हाईजीन और मांस की क्वालिटी

ये स्टोरी का मुख्य हिस्सा है. मैसूर के सेंट्रल फूड टेक्नॉलजी रिसर्च इंस्टीट्यूट के हेड डॉक्टर वीके मोदी के मुताबिक हलाल का तरीका जानवर की बॉडी से खून पूरी तरह निकालने में सक्षम है. जबकि झटके में खून के थक्के बॉडी में जमे रह जाते हैं. इस तरह का मीट तुरंत पकाने की बजाय कुछ दिन के लिए रख दिया जाए तो वो खराब हो जाता है. ये मीट को सख्त बना देता है. यानी हलाल मीट को स्टोर करना आसान है.

कुल मिलाकर धार्मिक एंगल से देखा जाए तो जोमैटो की बात माननी चाहिए. खाना खुद एक धर्म है. मीट आखिर मीट है. उसे पाने के लिए जानवर को मारना पड़ता है, यही सच है.

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