तराजू के एक पलड़े में पीएम मोदी, दूसरे में कमल के फूल; जानिए क्‍या है ‘तुलाभारम’ अनुष्‍ठान

नरेंद्र मोदी अब तक दो बार 'तुलाभारम' अनुष्‍ठान पूरा कर चुके हैं.


नई दिल्‍ली: हिन्‍दू धर्म में रीति-रिवाजों और अनुष्‍ठानों की कोई कमी नहीं है. 8 जून को केरल के गुरुवायूर पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां के श्री कृष्ण मंदिर में ऐसा ही एक अनुष्‍ठान पूरा किया. प्रधानमंत्री तराजू के एक पलड़े पर बैठे और दूसरे पर कमल के फूल रखे गए. जब तराजू संतुलित हो गया तो यही कमल दान कर दिए गए. दो महीने पहले, कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी यह अनुष्‍ठान किया था.

क्‍या है तुलाभारम?

तुलाभारम को ‘तुला-दान’, ‘तुला-पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है. यह हिन्‍दू धर्म के सबसे पुराने अनुष्‍ठानों में से एक है. जैसा कि नाम से स्‍पष्‍ट है, इसमें श्रद्धालु के वजन के बराबर वस्‍तु (सोना, अनाज, फूल या कोई अन्‍य वस्‍तु) तौली जाती है और फिर उस वस्‍तु को दान कर दिया जाता है. यह अनुष्‍ठान ‘षोडश महादान’ में से एक हैं. पुराणों में दान के 16 प्रकार के तरीके बताए गए हैं, जिनमें से ‘तुलाभारम’ एक है.

कब, कहां हुई शुरुआत

हिन्‍दू धर्म के कई पुराणों में अलग-अलग नामों से इस अनुष्‍ठान का जिक्र मिलता है. द्वापर युग के ग्रंथों- महाभारत में भी इस अनुष्‍ठान का जिक्र है जब शिबि नाम के राजा की भगवान धर्मराज और अग्नि ने परीक्षा ली थी. इतिहासकारों को खुदाई में तमिलनाडु से ‘तुलाभारम’ से जुड़े ऐसे शिलालेख मिले हैं जो 7वीं-8वीं शताब्‍दी के बताए जाते हैं.

इतिहासकार मानते हैं कि मुगलों ने हिंदुओं के इस अनुष्‍ठान से प्रेरणा ली. अकबर की जीवनी (अकबरनामा) लिखने वाले अबुल फजल ने भी लिखा है कि अकबर को साल में दो बार सोने और बहुमूल्‍य वस्‍तुओं से तौला जाता था. विदेशी भ्रमणकारी थॉमस रो भी लिखते हैं कि यह परंपरा अकबर के बेटे जहांगीर ने भी जारी रखी.

पुराणों के मुताबिक, क्‍या है ‘तुलाभारम’ की प्रक्रिया

मत्‍स्‍य पुराण में इस अनुष्‍ठान के लिए कई शर्तें बताई गई हैं. जैसे अनुष्‍ठान की खातिर मंडप कैसे तैयार किया जाएगा. तुला (तराजू) कैसी होगी और उसे किस तरह सजाया जाएगा. मत्‍स्‍य पुराण में कहा गया कि इस अनुष्‍ठान के लिए 8 पुजारी जरूरी हैं जो दो-दो की संख्‍या में चारों वेदों का प्रतिनिधित्‍व करेंगे. वेदों, पुराणों और शास्‍त्रों के ज्ञाता को गुरु बनाया जाएगा. श्‍लोकों के जाप के बीच चार हवन किए जाने चाहिए.

हवन के बाद, गुरु भगवान की आराधना करेंगे. इसके बाद दानकर्ता को ब्राह्मण नहलाकर सफेद वस्‍त्र पहनाएंगे. दानी को सफेद फूलों की माला पहनाई जाएगी. इसके बाद उसे तुला की परिक्रमा करनी होगी. फिर दानी को तुला के एक पलड़े में बैठना होगा. दूसरे पलड़े में उतने ही वजन का सोना ब्राह्मण रखेंगे. धरती की देवी को साक्षी मानकर आधा सोना गुरु को दिया जाएगा और बाकी ब्राह्मण को. लिंग पुराण में भी ऐसी ही विधि बताई गई है. उसमें यह कहा गया कि सोना भगवान शिव को समर्पित किया जाना चाहिए.

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