…तो पृथ्वी का तापमान उस स्‍तर पर होगा, जो 5 करोड़ सालों में नहीं देखा गया

वायुमंडल (Atmosphere) में बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन से 50 मिलियन साल पहले तेजी से ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) बढ़ा. इसी तरह इयोसीन युग में वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड का लेवल गिर गया, अंटार्कटिका में बर्फ की चादरें बनने लगीं और पृथ्वी एक हिमशैल बन गई.
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जलवायु परिवर्तन पर किए गए एक अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि जल्द ही ग्रीन हाउस गैस में कमी नहीं आई तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान (Global Temperature) उस स्थिति तक पहुंच सकता है जो पिछले 50 मिलियन सालों में नहीं देखा गया. सांता क्रूज में कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सह लेखक प्रोफेसर जेम्स जाचोस (James Zachos) और उनके सहयोगियों ने CENOGRID को ‘क्लाइमेट रेफरेंस कर्व’ बनाया है जिसने यह समझने में मदद की है कि 66 मिलियन साल पहले डायनासोर के विलुप्त होने के बाद से पृथ्वी की जलवायु कैसे बदली. यह लगातार और सटीक रूप से पता लगाने का पहला रिकॉर्ड है.

पिछले 66 मिलियन सालों के दौरान धरती पर जलवायु के आधार पर चार अलग-अलग समयों को देखा गया है- हॉटहाउस, वार्महाउस, कूलहाउस और आइसहाउस. हर एक समय में या तो ग्रीन हाउस गैस का प्रभाव है या पृथ्वी के ध्रुवों पर जमा होने वाली बर्फ की मात्रा. पिछले तीन मिलियन से ज्यादा सालों तक पृथ्वी एक हिमशैल (बर्फ का घर) बनी रही, लेकिन ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और अन्य मानवीय गतिविधियां अब जलवायु को ‘वार्महाउस’ और ‘हॉटहाउस’ की ओर ले जा रही है.

आज से कहीं बहुत ज्यादा था पृथ्वी का तापमान

पृथ्वी पर वार्महाउस की स्थितियों को आखिरी बार इयोसीन युग (Eocene Epoch) के दौरान देखा गया था जो लगभग 34 मिलियन साल पहले समाप्त हुआ था. इस समय औसत वैश्विक तापमान 16.225.2 ° F (9–14 ° C) था जो वर्तमान समय से कहीं ज्यादा था और आज की तुलना में 9 से 14 डिग्री सेल्सियस अधिक था.

CENOGRID, जो वर्तमान में वैश्विक तापमान परिवर्तन को दर्शाता है और ग्लोबल वार्मिंग उत्सर्जन के आधार पर भविष्य के लिए अलग-अलग भविष्यवाणियां करता है. इसका इस्तेमाल अतीत, वर्तमान और भविष्य के बीच तुलना करने के लिए एक बारकोड की तरह किया जा सकता है.

CENOGRID के मुताबिक, सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की कक्षा में होने वाले बदलावों की की वजह से होने वाला जलवायु परिवर्तन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन की वजह से भविष्य में होने वाली वार्मिंग की तुलना में बहुत कम है. पेपर लेखक और मरीन जियोलॉजिस्ट थॉमस वेस्टरॉल्ड ने कहा, “66 से 34 मिलियन साल पहले का समय, जब पृथ्वी आज की तुलना में काफी गर्म थी, यह बात बहुत महत्त्व रखती है क्योंकि इससे यह पता बात पता चल सकती है कि मानवीय गतिविधियां भविष्य की जलवायु में क्या बदलाव लाएंगी.”

पृथ्वी की कक्षा में बदलाव होने से जलवायु परिवर्तन

प्रोफेसर जाचोस ने कहा कि “हम लंबे समय से जानते हैं कि ग्लेशियल-इंटरग्लेशियल साइकिल पृथ्वी की कक्षा में बदलाव से प्रभावित है. इस साइकिल से पृथ्वी की सतह तक पहुंचने वाली सौर ऊर्जा की मात्रा में बदलाव हुआ है और खगोलविदों (Astronomers) ने समय के साथ इन बदलावों की गणना की है.”

उन्होंने कहा कि ‘हम लंबे समय तक जलवायु में हो रहे बदलावों को अच्छी तरह से देख सकते हैं और हम यह भी देख सकते हैं कि हम जितना अनुमान लगा रहे हैं, ग्लोबल वार्मिंग की स्थिति इससे कहीं ज्यादा होगी.’ यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के पेपर लेखक और पर्व विज्ञानी अन्ना जॉय ड्रुरी ने कहा, “हम इन बदलावों को समझने के लिए CENOGRID का इस्तेमाल करते हैं. यह दिखाता है कि पृथ्वी पहले एक गर्म गृह थी जो पिछले 50 मिलियन सालों में धीरे-धीरे ठंडी होती गई. लेकिन मानवीय गतिविधियों ने पृथ्वी की इस प्रक्रिया को उलट कर रख दिया है.”

50 मिलियन साल पहले था ग्लोबल वार्मिंग का असर

प्रो जाचोस ने अपने पिछले शोध के आधार पर बताया कि वायुमंडल में बड़े पैमाने पर कार्बन उत्सर्जन से 50 मिलियन साल पहले तेजी से ग्लोबल वार्मिंग बढ़ा. इसी तरह इयोसीन युग में वायुमंडलीय कार्बन डाई-ऑक्साइड का लेवल गिर गया, अंटार्कटिका में बर्फ की चादरें बनने लगीं और पृथ्वी एक हिमशैल बन गई. प्रो जाचोस ने कहा कि जलवायु परिवर्तन अस्थाई हो सकता है और हमें इसे और भी बेहतर तरीके से समझने की जरूरत है.

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