क्यों हर एनकाउंटर के बाद मुजरिम के हाथ में चिपकी रह जाती है पिस्टल?

मुजरिम कितना भी शातिर हो, कितना भी कमजोर हो, कैसा भी हो, उसके एनकाउंटर के बाद हाथ में पिस्तौल जरूर मिलती है.

Hyderabad encounter के बाद भी पुलिस पर वही सब सवाल उठ रहे हैं जो हर मुठभेड़ के बाद उठते हैं. जैसे कि इतने शातिर मुजरिम को हथकड़ी क्यों नहीं पहना रखी थी? उसने इतने सिपाहियों के सामने भागने की कोशिश क्यों की? वगैरह. एक सवाल हर एनकाउंटर के बाद रह जाता है कि मुजरिम के हाथ में पिस्तौल या तमंचा क्यों पकड़ा रह जाता है? नीचे कुछ मुठभेड़ों की तस्वीरें दिखा रहे हैं जिनमें मुजरिम के हाथ में तमंचा है. सांसों की डोर टूट गई लेकिन तमंचा नहीं छूटा. सबसे पहले हैदराबाद एनकाउंटर की तस्वीर.

नीचे लगी तस्वीर 12 हजार रुपए के इनामी शातिर बदमाश जान मोहम्मद उर्फ जानू की है. 17 सितंबर 2017 को इसे मुजफ्फर नगर के खतौली में एनएच 58 बाईपास पर पुलिस ने एनकाउंटर में ढेर कर दिया था. इसके पास एक मारुति स्विफ्ट गाड़ी और एक पिस्टल बरामद हुई थी. पिस्टल, जो कि मरने के बाद भी हाथ में रही.

Pistol found in criminal hand after encounter, क्यों हर एनकाउंटर के बाद मुजरिम के हाथ में चिपकी रह जाती है पिस्टल?

जून 2019 में मेरठ पुलिस ने शताब्दी नगर में 25 हजार के इनामी बदमाश को मुठभेड़ के बाद दबोच लिया था. मुठभेड़ में खास बात यह थी कि बदमाश के पैर में गोली लगी थी, वो जमीन पर बेहोश पड़ा था लेकिन फोटो सेशन होने तक तमंचा उसके हाथ में रहा, फोटो खिंचने के बाद तमंचा जमीन पर पड़ा मिला.

Pistol found in criminal hand after encounter, क्यों हर एनकाउंटर के बाद मुजरिम के हाथ में चिपकी रह जाती है पिस्टल?

ये एक और एनकाउंटर की तस्वीर में जिसमें मारे गए बदमाश के हथियार में तमंचा दिख रहा है. यूपी पुलिस के आंकड़े के अनुसार साल 2018 में 85 एनकाउंटर हुए थे जिनमें 80 प्रतिशत मामलों में पिस्टल या तमंचा मारे गए बदमाश के हाथ में मिला था. मार्च 2018 में समस्तीपुर, बिहार का युवक लखनऊ के हजरतगंज में पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ में गंभीर रूप से जख्मी हो गया. उसके परिजनों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने उसके हाथ में पिस्टल पकड़ाकर एनकाउंटर करने की कोशिश की.

Pistol found in criminal hand after encounter, क्यों हर एनकाउंटर के बाद मुजरिम के हाथ में चिपकी रह जाती है पिस्टल?

ये सब तो फिल्मों में होता है. सफाई से एनकाउंटर करके उसके हाथ में पिस्टल पकड़ा दी जाती है. अब यहां असलियत में होने वाले एनकाउंटर से फिल्में प्रेरित होती हैं या फिल्मों से एनकाउंटर प्रेरित होते हैं, इस पर विद्वानों में मतभेद है. उत्तर प्रदेश में तो ऐसी मुठभेड़ भी होती हैं कि मरने वाले बदमाश के हाथ में पिस्टल मिलती है लेकिन पुलिस की बंदूक मौके पर जवाब दे जाती है, उसे मुंह से ठांय ठांय करना पड़ता है.

हमने देशभक्ति फिल्में देखी हैं. उनमें आखिरी वक्त में जवान के हाथ से बंदूक गिर जाती है तो साथी उठाकर उसके हाथ में देता है. ताकि मरते वक्त उसका गर्व उसके साथ रहे. बदमाशों को आखिर किस तरह के गर्व की उम्मीद रहती है कि वे मरने के बाद भी पिस्टल नहीं छोड़ते?

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