Menstrual Hygiene Day: पीरियड्स होने पर लड़कियों को चाहिए केयर, महिलाओं को जागरूकता

देश में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां पर एक कपड़े को ही पीरियड्स में बार-बार इस्तेमाल करने के कारण महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कई महिलाएं Menstrual Hygience को लेकर जागरूक ही नहीं हैं.
Menstrual Hygiene Day, Menstrual Hygiene Day: पीरियड्स होने पर लड़कियों को चाहिए केयर, महिलाओं को जागरूकता

हमारे देश में पीरियड्स यानी महावारी को लेकर आज भी लोगों की सोच काफी रूढ़िवादी है. पीरियड्स को लेकर कई लड़कियां और महिलाएं खुलकर बात तक नहीं कर सकतीं. पीरियड्स पर बात करना कई घरों में आज भी एक टैबू बना हुआ है. इस टैबू के कारण खुलकर बात न कर पाना महिलाओं को बीमारी की तरफ धकेलता है. आज हम इस विषय पर इसलिए बात कर रहे हैं, क्योंकि आज Menstrual Hygiene Day है.

महावारी को लेकर कई लड़कियां और महिलाएं कितनी सजग हैं यह तो इससे ही पता चलता है कि वे सेनेटरी नैपकिन और पीरियड्स के समय अन्य हाईजीनिक चीजों को इस्तेमाल करने की जगह कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं. एक ही कपड़े को बार-बार इस्तेमाल करना यानि अपनी जान गंवाना.

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देश की आधी महिलाएं नहीं हैं जागरूक

देश में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां पर एक कपड़े को ही पीरियड्स में बार-बार इस्तेमाल करने के कारण महिलाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि कई महिलाएं Menstrual Hygience को लेकर जागरूक ही नहीं हैं. लड़कियों को अपने फर्स्ट पीरियड से पहले इसकी सही जानकारी होना जरूरी है. उम्र छोटी होती है, जिसके कारण ऐसे समय में उनकी देखभाल भी बहुत मायने रखती है. वहीं महिलाओं को इसके प्रति जागरूक होने की जरूरत है, क्योंकि अगर वे जागरूक होंगी तो अपनी जान जोखिम में नहीं डालेंगी.

Menstrual Hygiene Day, Menstrual Hygiene Day: पीरियड्स होने पर लड़कियों को चाहिए केयर, महिलाओं को जागरूकता

2015-16 में एक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे हुआ था, जिसमें यह बात सामने आई थी कि भारत में कुल 57.6 प्रतिशत महिलाएं ही सेनेटरी नैपकिंस का इस्तेमाल करती हैं. अन्य महिला कपड़ा इस्तेमाल करती हैं, जिसके कारण उन्हें वर्जिनल इंफेक्शन भी हो जाता है. 2016 में एक रिपोर्ट और सामने आई थी, जिसमें कहा गया था कि 71 प्रतिशत लड़कियां ऐसी थीं, जिन्हें महावारी के शुरू होने से पहले इसकी कोई जानकारी नहीं थी. न ही स्कूलों में और न ही घर में इन लड़कियों को महावारी के प्रति जागरूक किया गया.

पीरियड्स शुरू होते ही लड़कियों ने छोड़ा स्कूल

2014 की एक रिपोर्ट कहती है कि करीब 23 मिलियन लड़कियों ने पीरियड्स शुरू होते ही स्कूल जाना छोड़ दिया था. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, तमिलनाडू में करीब 75 प्रतिशत लड़कियां और महिलाएं ऐसी हैं जो कि मैंसट्रुल हाईजीन को लेकर जागरूक नहीं हैं. वहीं उत्तर प्रदेश में यह आकंड़ा करीब 65 प्रतिशत, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में 50 प्रतिशत है.

2015 में शिक्षा मंत्रालय ने एक सर्वे कराया था, जिसमें ये बात सामने आई थी कि ग्रामीण इलाकों में करीब 65 प्रतिशत ऐसे स्कूल हैं, जहां पर टीचर्स छात्राओं से पीरियड्स को लेकर बात नहीं करते और न ही उन्हें मेंसट्रुअल हाईजीन को लेकर जागरूक करते हैं. ग्रामीण इलाकों में केवल 2-3 प्रतिशत महिलाएं ही सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं. गांव तक सेनेटरी नैपकिन पहुंचना भी एक गंभीर मुद्दा है.

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ग्रामीण इलाकों में किसी जनरल स्टोर या फार्मेसी पर सेनेटरी नैपकिन बहुत मुश्किल से मिल पाते हैं. लड़कियों और महिलाओं को मेंसट्रुल हाईजीन के प्रति जागरूक करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने चाहिए और साथ ही सरकार को सेनेटरी नैपकिन और पीरियड्स के समय इस्तेमाल की जाने वाली अन्य हाईजीनिक चीजों के दाम कम करने चाहिए, ताकि हर लड़की और हर महिला आसानी से इन्हें खरीद सके और अपनी जान बचा सके.

कब हुई Menstrual Hygiene Day की शुरुआत?

Menstrual Hygiene Day की शुरुआत साल 2013 में हुई थी. इसकी पहल एक जर्मन बेस्ड एनजीओ WASH द्वारा की गई थी. यह दिवस पहली बार साल 2014 में मनाया गया था. Menstrual Hygiene Day ने एक ऐसा मंच दिया है जो कि विश्वभर के सरकारी संगठनों, गैर सरकारी संगठनों और प्राइवेट सेक्टर्स को एक साथ लाता है, ताकि महिलाओं को पीरियड्स के प्रति जागरूक किया जा सके.

पीरियड्स पर बन भारत में बन चुकी हैं ये फिल्में

भारत में महावारी को लेकर कई फीचर और शॉर्ट फिल्में भी बन चुकी हैं. पर सबसे ज्यादा किसी ने सुर्खियां बंटोरी तो वो थी शॉर्ट फिल्म Period: End of Sentence. यह शॉर्ट फिल्म ऑस्कर अवॉर्ड जीत चुकी है. फिल्म ‘पीरियड: एंड ऑफ सेंटेंस’ को बेस्ट डॉक्युमेंट्री शॉर्ट कैटेगरी फिल्म के लिए ऑस्कर अवॉर्ड मिला. भारतीय फिल्म प्रोड्यूसर गुनीत मोंगा ने इसे बनाया. फिल्म को रयाक्ता जहताबची और मैलिसा बर्टन ने निर्देशित किया था. फिल्म की कहानी हापुड़ में रहने वाली लड़कियों पर बुनी गई.

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इसके अलावा दूसरी फिल्म जिसने सबसे ज्यादा सुर्खियां बंटोरी, वो है अक्षय कुमार की फिल्म Padman. इस फिल्म में अक्षय एक ऐसा शख्स का किरदार निभाते हैं जो कि महिलाओं को गंदा कपड़ा इस्तेमाल न करने के बजाए सेनेटरी नैपकिन का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित करता है. वह खुद एक सेनेटरी नैपकिन बनाने वाली मशीन तैयार करता है और महिलाओं को जागरूक करता है. यह फिल्म तमिलनाडु के रहने वाले समाजसेवी अरुणाचलम मुरुगनाथम पर आधारित है.

इन दोनों फिल्मों के अलावा दो और फिल्में भी महावारी को लेकर बनी हैं. एक साल 2013 में आई फिल्म Menstrual Man है और दूसरी 2017 में आई फिल्म Phullu है. ये दोनों ही फिल्म ऐसे व्यक्तियों की कहानी है जो महिलाओं को कपड़ा इस्तेमाल न करने के प्रति जागरूक करते हैं.

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