मां को हो सकता है बच्चे के जन्म के बाद तनाव, जानिए क्या है पोस्टपार्टम डिप्रेशन  

प्रेग्‍नेंसी (Pregnancy) की शुरुआत या यूं कहें डिलीवरी के बाद बेबी ब्लूज (Baby Blues) होते हैं, जिनमें अधिकतर; मूड स्विंग्स, टेंशन, डर, नींद न आना शामिल होते हैं. यह ज्यादातर डिलीवरी के 2-3 दिन बाद से शुरू होकर 1-2 हफ्ते तक चलते हैं.
depression in new mothers, मां को हो सकता है बच्चे के जन्म के बाद तनाव, जानिए क्या है पोस्टपार्टम डिप्रेशन  

बच्चे के जन्म के साथ ही एक महिला में जन्म लेते हैं बहुत सारे इमोशंस. मां बनने के बाद महिला के अंदर खुशी के साथ उत्‍साह का संचार तो होता ही है, लेकिन डर और तनाव भी घर कर जाते हैं. मतलब मां बनने के बाद महिला एक प्रकार के डिप्रेशन से जूझने लगती है, इसे कहते हैं- पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression).

पोस्टपार्टम डिप्रेशन 10-15%  महिलाओं को होता है, यानि कि हर 7वीं महिला इससे जूझती है. कई महिलाओं को प्रेग्‍नेंसी की शुरुआत या डिलीवरी के बाद बेबी ब्लूज (Baby Blues) होते हैं, जिनमें अधिकतर; मूड स्विंग्स, टेंशन, डर, नींद न आना शामिल होते हैं.

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ये ज्यादातर डिलीवरी के 2-3 दिन बाद से शुरू होकर 1-2 हफ्ते तक चलते हैं. लेकिन कुछ महिलाओं में यह तनाव, डिप्रेशन का रूप ले लेता है. पोस्टपार्टम डिप्रेशन कोई कमजोरी या पर्सनैलिटी में कोई कमी नहीं है, इसका संबंध सिर्फ एक बच्चे को जन्म देने की जटिलता से है. शुरुआत में तो पोस्टपार्टम डिप्रेशन को ज्यादातर लोग बेबी ब्लूज समझ लेते हैं. वैसे तो यह लक्षण डिलीवरी के शुरुआती हफ़्तों में ही दिखने लगते हैं, लेकिन कई बार यह प्रेग्‍नेंसी की शुरुआत से लेकर बच्चे के जन्म के एक साल बाद तक भी चल सकते हैं. अगर बेबी ब्लूज डिलीवरी के दो हफ़्तों बाद भी जारी रहे, समय के साथ लक्षण और बढ़ते जाएं तो डॉक्टर की सलाह लेना ज़रूरी हो जाता है.

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डिप्रेशन के लक्षण

*गहरा तनाव, हॉर्मोनल असंतुलन, मूड स्विंग्स
*खुद में अरुचि या बहुत रोना
*बच्चे का पालन-पोषण करने में कठिनाई
*फैमिली और दोस्तों से दूरी बनाना
*भूख न लगना या ज्यादा खाना
*नींद न आना या ज्यादा सोना
*ज्यादा थकान
*चिड़चिड़ापन और गुस्सा
*निराशा, बेचैनी, एकाग्रता में कमी
*आत्महत्या की इच्छा

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के कारण-

*शारीरिक बदलाव- बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन (Estrogen)  और  प्रोजेस्टेरोन (Progesterone)  हॉर्मोन्स के स्तर में अधिक गिरावट के कारण यह तनाव होते हैं. थायरॉयड ग्रंथि से निकलने वाले हॉर्मोन्स का लेवल भी गिरने से तनाव,, थकान और सुस्ती महसूस होती है. डिलीवरी के बाद स्ट्रेच मार्क्स, बालों का झड़ना, वजन बढ़ना आदि भी महिला में तनाव बढ़ाते हैं.

*भावनात्मक मुद्दे- नवजात बच्चे के साथ कनेक्शन बिठाने, उसकी जरूरतों, पालन पोषण को समझने में दिक्कत होना और खुद में होने वाले शारीरिक बदलावों के कारण शरीर और जिंदगी पर अपना कंट्रोल कम महसूस होना भी डिप्रेशन को बढ़ाते हैं.

इलाज- पोस्टपार्टम डिप्रेशन  के इलाज के लिए दवाइयां और थेरेपी दी जाती है. डॉक्टर या तो इनमें से किसी एक का इस्तेमाल करते हैं या फिर ज़रूरत के हिसाब से दोनों का एक साथ.

*स्त्री-रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक से सलाह लेना चाहिए.

*अनुभवी दोस्तों और रिश्तेदारों से बात करनी चाहिए.

*टहलना, दौड़ना, साइकिल चलाना, योगासन जैसी हल्की एक्सरसाइज डॉक्टर की सलाह पर किये जा सकते हैं.

* थेरेपी- मनोचिकित्सक या मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग की मदद से दिमाग में आने वाले नेगेटिव विचारों को दूर करने में मदद करते हैं. एस्ट्रोजन लेवल कम होने पर डॉक्टर हार्मोनल थेरेपी की सलाह देते हैं.

*सेल्फ-केयर – इसमें यह सिखाया जाता है कि तमाम जिम्मेदारियों के बीच खुद का ध्यान कैसे रखें. ज्यादा कामों का बोझ ना उठाएं और थोड़ा समय खुद को भी दें.

* दवाइयां- एंटी-डीप्रेसेंट दिमाग में बनने वाले केमिकल्स पर असर कर मूड को ठीक करने में मदद करते हैं. इन दवाइयों को ब्रेस्टफीडिंग के साथ भी खा सकते हैं.

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