सैक्रेड स्टेन्स: पीरियड्स के दाग इम्प्योर नहीं प्योर हैं

ये दाग स्त्री को हर महीने होने वाले मासिक धर्म के हैं. हमारे समाज में आज भी लोग इसे पवित्रता और अपवित्रता से जोड़ कर देखते हैं.

नई दिल्ली: ये दाग ‘इम्प्योर’ नहीं ‘प्योर’ हैं. नीरज गेरा ने अपनी तस्वीरों के माध्यम से लोगों को यही संदेश देने की कोशिश की है. दरअसल ये दाग स्त्री को हर महीने होने वाले मासिक धर्म के हैं. हमारे समाज में आज भी लोग इसे पवित्रता और अपवित्रता से जोड़ कर देखते हैं. इन दिनों एक स्त्री के लिए बहुत से ऐसे काम जिन्हें पवित्र समझा जाता है उन्हें करने की मनाही होती है.

ललित कला अकादमी में बुधवार को लगी ‘सैक्रेड स्टेन्स’ नाम की फोटो प्रदर्शनी में माहवारी के दौरान होने वाली असहनीय पीड़ा, एकांतवास, शर्मिंदगी के तरह-तरह के रंग देखने को मिले. इसके अलावा समाज में माहवारी को लेकर महिलाओं के साथ किए जाने वाले अमानवीय व्यवहार की तस्वीरें भी देखने को मिलीं.

केरल के सबरीमाला मंदिर में परंपरागत रूप से स्त्रियों के प्रवेश पर पाबंदी के मूल में भी यही कारण रहा है क्योंकि मासिक धर्म के दौरान स्त्री को अपवित्र समझ जाता है और वो इस स्थिति में मंदिर में पर प्रवेश नही कर सकती.

नीरज गेरा ने कहा कि माहवारी के प्रति समाज को जागरूक करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि कई जगह महिलाओं को पीरियड्स के दौरान घर से बाहर जानवर जहां रहते हैं, वहां पर रख दिया जाता है. साउथ में जब किसी लड़की को पीरियड्स शुरू होते हैं तो बाकायदा एक सेरेमनी होती है, लेकिन वो भी अपवित्रता की मानसिकता से घिरे हुए हैं.

विज्ञापन की दुनिया में माहवारी के दाग लाल नहीं नीले दिखते हैं. ये वास्तविकता से लोगों को रूबरू कराने की बजाय इसमें भी ग्लैमर के रंग दिखाते हैं. जिस तरह से परिवारों में खासतौर पर पिता से ऐसी बातें छुपाई जाती हैं और उन्हें बेटी की इस तरह की समस्याओं से दूर रखा जाता है. उन्होंने कहा कि इसके प्रति चुप्पी तोड़ने की जरूरत है, ताकि इसे भी शरीर की सामान्य क्रिया की तरह देखा जाए.

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