World No Tobacco Day: स्‍मोकिंग छोड़ी तो 10 साल में आधा रह जाएगा कैंसर का खतरा

भारत में हर दसवां वयस्क (10.7 प्रतिशत) वर्तमान में तंबाकू का सेवन करता है.

नई दिल्‍ली: विश्व स्तर पर फेफड़ों के कैंसर से दो-तिहाई मौतें होती हैं. यहां तक कि दूसरों द्वारा धूम्रपान किए जाने से पैदा हुए धुएं के संपर्क में आने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है. धूम्रपान छोड़ने से फेफड़ों के कैंसर का खतरा कम हो सकता है. धूम्रपान छोड़ने के 10 वर्षों के बाद, धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के फेफड़ों के कैंसर का खतरा लगभग आधा हो जाता है.

इस साल World No Tobacco Day (WNTD) का फोकस तंबाकू और फेफड़ों का स्वास्थ्य है. हर साल, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और वैश्विक भागीदार 31 मई को World No Tobacco Day का निरीक्षण करते हैं और लोगों को तंबाकू के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करते हैं. इस दौरान लोगों को किसी भी तरह के तंबाकू का उपयोग करने से हतोत्साहित किया जाता है.

WHO के अनुसार, इस वर्ष यह अभियान तंबाकू से फेफड़े पर कैंसर से लेकर श्वसन संबंधी बीमारियों (COPD) के प्रभाव पर केंद्रित होगा. लोगों को फेफड़ों के कैंसर के बारे में सूचित किया जाएगा, जिसका प्राथमिक कारण तंबाकू धूम्रपान है.

स्‍मोकिंग से COPD का भी खतरा

फेफड़ों के कैंसर के अलावा, तंबाकू धूम्रपान भी क्रोनिक प्रतिरोधी फुफ्फुसीय रोग (COPD) का कारण बनता है. इस बीमारी में फेफड़ों में मवाद से भरे बलगम बनात है जिससे दर्दनाक खांसी होती है और सांस लेने में काफी कठिनाई होती है.

इसी तरह, छोटे बच्चों को जो घर पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं, उन्हें अस्थमा, निमोनिया और ब्रोंकाइटिस, कान में संक्रमण, खांसी और जुकाम के बार-बार होने वाले संक्रमण और लगातार श्वसन प्रक्रिया में निम्न स्तर का संक्रमण जैसी श्वसन संबंधी समस्याएं होती हैं.

WHO के अनुसार, विश्व स्तर पर 1.65 लाख बच्चे 5 वर्ष की आयु से पहले दूसरों द्वारा धूम्रपान से पैदा हुए धुएं के कारण श्वसन संक्रमण के कारण मर जाते हैं. ऐसे बच्चे जो वयस्क हो जाते हैं, वे हमेशा इस तरह की समस्याओं से पीड़ित रहते हैं और इनमें सीओपीडी विकसित होने का खतरा होता है.

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डब्ल्यूएनटीडी के मौके पर टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के उपनिदेशक और वॉयस ऑफ टोबैको विक्टिम्स (VOTV) के संस्थापक डॉ. पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि गर्भवती महिला द्वारा धूम्रपान या एसएचएस के संपर्क में आने से भ्रूण में फेफड़ों की वृद्धि कम हो सकती है और इसका असर भ्रूण की गतिविधियों पर हो सकता है. गर्भपात हो सकता है, समय से पहले बच्चे का जन्म हो सकता है नवजात कम जन्म का हेा सकता है और यहां तक कि अचानक शिशु मृत्यु सिंड्रोम भी पैदा हो सकता है. तंबाकू, किसी भी रूप में बहुत खतरनाक है.

World No Tobacco Day : तंबाकू का धुआं बेहद खतरनाक

ग्लोबल टीबी रिपोर्ट-2017 के अनुसार, भारत में टीबी की अनुमानित मामले दुनिया के टीबी मामलों के लगभग एक चौथाई लगभग 28 लाख दर्ज की गई थी. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि टीबी फेफड़े को नुकसान पहुंचाता है और फेफड़ों की कार्यक्षमता को कम करता है और ऐसी स्थिति में यदि कोई व्यक्ति धूम्रपान करता है तो यह आगे चलकर उसकी स्थिति और खराब हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि तंबाकू का धुआं इनडोर प्रदूषण का बहुत खतरनाक रूप है, क्योंकि इसमें 7000 से अधिक रसायन होते हैं, जिनमें से 69 कैंसर का कारण बनते हैं. तंबाकू का धुआं पांच घंटे तक हवा में रहता है, जो फेफड़ों के कैंसर, सीओपीडी और फेफड़ों के संक्रमण को कम करता है.

संबंध हेल्थ फाउंडेशन (एसएचएफ) के ट्रस्टी अरविंद माथुर ने बताया कि ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे 2017 के अनुसार, भारत में सभी वयस्कों में 10.7 प्रतिशत (99.5 मिलियन) वर्तमान में धूम्रपान करते हैं. इनमें 19 प्रतिशत पुरुष और 2 प्रतिशत महिला शामिल हैं. भारत में 38.7 प्रतिशत वयस्क घर पर सेकेंडहैंड स्मोक (एसएचएस) और 30.2 प्रतिशत वयस्क कार्यस्थल पर एसएचएस के संपर्क में आते हैं. सरकारी भवनों, कार्यालयों में 5.3 प्रतिशत स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में 5.6 प्रतिशत रेस्तरों में 7.4 प्रतिशत और सार्वजनिक परिवहन में 13.3 प्रतिशत लोग सेकंडहैंड स्मोक के संपर्क में आते हैं.

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तंबाकू में फेफड़ों के कैंसर का कारण बनने वाले रयायनों में आर्सेनिक (चूहे के जहर में पाया जाता है), बेंजीन (कच्चे तेल का एक घटक जो अक्सर अन्य रसायनों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है), क्रोमियम, निकल, विनाइल क्लोराइड (प्लास्टिक और सिगरेट फिल्टर में पाया जाता है), पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, एन-नाइट्रोसेमाइंस, सुगंधित एमाइन, फॉर्मलाडेहाइड (इमल्मिंग द्रव में पाया जाता है), एसिटालडिहाइड और पोलोनियम -210 (एक रेडियोधर्मी भारी धातु) शामिल हैं.

ऐसे कई कारक हैं जो तम्बाकू की कार्सिनोजेनेसिस को बढ़ा या घटा सकते हैं – विभिन्न प्रकार के तंबाकू के पत्ते, फिल्टर और रासायनिक मिश्रण की उपस्थिति या अनुपस्थिति कैंसर होने के कारक हो सकते हैं.

World No Tobacco Day : दिल्‍ली में 11.3 फीसदी स्‍मोकर

द्वारका स्थित मणिपाल अस्पताल के कैंसर सर्जन डॉ.वेदांत काबारा ने कहा कि ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे (GTAS) 2017 के अनुसार, भारत में आयु 15 वर्ष से अधिक है और वर्तमान में किसी न किसी रूप में तंबाकू का उपयोग करते हैं. ऐसे वयस्कों की संख्या 28.6 प्रतिशत है. इन वयस्कों में 24.9 प्रतिशत (232.4 मिलियन) दैनिक तंबाकू उपयोगकर्ता हैं और 3.7 प्रतिशत कभी-कभार के उपयोगकर्ता हैं.

उन्होंने कहा कि भारत में हर दसवां वयस्क (10.7 प्रतिशत) वर्तमान में तंबाकू का सेवन करता है. 19.0 प्रतिशत पुरुषों में और 2.0 प्रतिशत महिलाओं में धूम्रपान का प्रचलन पाया गया. धूम्रपान की व्यापकता ग्रामीण क्षेत्रों में 11.9 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 8.3 प्रतिशत थी. 20-34 आयु वर्ग के आठ (12.2 प्रतिशत) दैनिक उपयोगकर्ताओं में से एक ने 15 साल की उम्र से पहले धूम्रपान करना शुरू कर दिया था, जबकि सभी दैनिक धूम्रपान करने वालों में से एक-तिहाई (35.8 प्रतिशत) ने जब वे 18 साल से छोटे थे तब से धूम्रपान करना शुरू कर दिया था.

दिल्ली में इस समय 11.3 प्रतिशत लोग धूम्रपान के रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं, जिसमें 19.4 प्रतिशत पुरुष, 1.8 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं. यहां पर 8.8 प्रतिशत लोग चबाने वाले तंबाकू उत्पादों का प्रयोग करते हैं, जिसमें 13.7 प्रतिशत पुरुष व 3.2 प्रतिशत महिलाएं हैं.

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