5000 किलो खिचड़ी से 2019 में गल जाएगी बीजेपी की दाल? पढ़ें, पूरा सियासी गुणा-भाग

BJP Spokesperson Shahnawaz Hussain

नई दिल्‍ली

उन्‍होंने 1000 किलो दाल-चावल, 500 किलो सब्‍जी, 200 किलो घी, 100 लीटर तेल, 200 किलो मसाले और 5000 लीटर पानी की मदद 5000 किलो खिचड़ी पकाई और वर्ल्‍ड रिकॉर्ड बना डाला.

मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में हार के तुरंत बाद और 2019 लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले पकाई गई यह खिचड़ी क्‍या वाकई दलित मतदाताओं की जीभ पर चढ़ सकेगी? बड़ी पुरानी कहावत है- ‘काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती’। 2014 लोकसभा चुनाव में जिस प्रकार से बीजेपी को बंपर वोट मिला, क्‍या वैसा 2019 में हो सकेगा? यह सवाल बड़ा है, जिसका जवाब कुछ महीने बाद मिलेगा, लेकिन हालात पर चर्चा जरूरी है। बीजेपी को क्‍यों बनानी पड़ रही समरसता खिचड़ी, आइए जानते हैं इसके पीछे की ठोस राजनीतिक वजह:

1-सबसे पहले तो यह जानते हैं कि इस खिचड़ी के जरिए बीजेपी ने किस प्रकार से दलितों के साथ संपर्क साधा। बीते 3 महीने से बीजेपी के 28,000 कार्यकर्ता ‘समरसता खिचड़ी’ के लिए दिल्ली-एनसीआर में रह रहे अनुसूचित जाति/जनजाति के 3 लाख लोगों से दाल-चावल इकट्ठा कर रहे थे। 20 जनवरी को बीजेपी युवा संकल्प रैली का आयोजन भी करने जा रही है, जिसमें अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को साधने का प्रयास किया जाएगा, लेकिन फोकस युवाओं पर रहेगा।

2-दलित कभी बीजेपी के कोर वोटर नहीं रहे, लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव में पहली बार मोदी लहर में वे बीजेपी के साथ बह गए, लेकिन धीरे-धीरे ये वोट बैंक बीजेपी से दूर सरकने लगा। 2015 दिल्ली विधानसभा चुनाव में सभी 12 आरक्षित सीटों पर बीजेपी हार चुकी है। बिहार में भी ऐसा ही हुआ, लेकिन 2017 उत्‍तर प्रदेश चुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन अब मध्‍य प्रदेश, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ में एससी-एसटी वोटर उससे रूठे ही नजर आए।

3-मोदी सरकार आने के बाद से दलितों के खिलाफ अत्‍याचार के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। राष्‍ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास आए मामलों के हिसाब से 2013-2014 में कुल 12,410 केस सामने आए। 2014-2015 में यह आंकड़ा बढ़कर 16,175 पर पहुंच गया और 2015-2016 में संख्‍या बढ़कर 17, 321 पर पहुंच गई।

4-अब चुनावी आंकड़ों पर नजर डालते हैं। मध्य प्रदेश की बात करें तो कुल 35 आरक्षित सीटों में से 2013 विधानसभा में बीजेपी ने 28 पर जीत दर्ज की थी, लेकिन 2018 विधानसभा चुनाव में वह केवल 18 पर ही जीत दर्ज कर पाई। मतलब एमपी चुनाव में बीजेपी को इन 10 सीटों की हार की वजह से सत्‍ता गंवानी पड़ गई। बीजेपी को मध्‍य प्रदेश में 109 सीटों पर जीत मिली है और अगर ये 10 सीटें भी उसने जीत ली होतीं तो बहुमत के लिए जरूरी 116 का आंकड़ा वह आसानी से पार कर जाती।

5-मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों की बात करें तो कुल 78 आरक्षित सीटों में से 43 पर कांग्रेस ने जीत दर्ज की।

6-छत्तीसगढ़ में भी बीजेपी को दलितों के गुस्‍से का सामना करना पड़ा। 2013 में बीजेपी ने आरक्षित सीटों में से 9 जीती थीं, लेकिन 2018 में उसे सिर्फ 2 पर जीत मिली। इसी प्रकार से 2013 में कांग्रेस को सिर्फ एक आरक्षित सीट पर जीत मिली थी, लेकिन 2018 में उसे 7 सीटों पर जीत प्राप्‍त हुई।

7-एससी-एसटी एक्‍ट को लेकर देश भर में हुए उग्र प्रदर्शन, दलितों के खिलाफ हिंसा ने भी बीजेपी के खिलाफ उनका गुस्‍सा भड़काया। यहां तक कि बीजेपी में ही अब विरोध के स्‍वर उठने लगे हैं। बहराइच से बीजेपी सांसद सावित्री बाई फुले इस्तीफा दे चुकी हैं। रॉबर्ट्सगंज से बीजेपी सांसद छोटेलाल खरवार तो सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ बीजेपी को चिट्ठी तक लिख चुके हैं।

8-दलितों की ताकत के बारे में बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक देश में दलितों की आबादी करीब 17 फीसद थी। इस आधार पर अनुमान लगाएं तो देशभर में दलितों की आबादी इस समय लगभग 20 फीसद है। 543 लोकसभा सीटों में से 80 अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में इन 80 सीटों में से भाजपा ने 41 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

9- उत्तर प्रदेश में करीब 20.7 प्रतिशत दलित आबादी है। राज्य की 17 लोकसभा और 86 विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। बीजेपी ने 17 लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव में 76 आरक्षित विधानसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी।

ये आंकड़े बताते हैं कि बीजेपी को आखिरकार क्‍या 5000 किलो ‘समरसता खिचड़ी’ पकानी पड़ रही हैं, लेकिन बीजेपी के इस दलित प्रेम के चलते सवर्णों में गुस्‍सा है। मध्‍य प्रदेश विधानसभा चुनाव में हार के बाद कई नेताओं ने कहा कि आरक्षण को लेकर शिवराज का बयान और एससी-एसटी एक्‍ट की वजह से मध्‍य प्रदेश में सवर्ण बीजेपी से नाराज हो गए। बात सच है कि बीजेपी का दलित प्रेम सवर्णों को रास नहीं आ रहा है, इसलिए मोदी सरकार गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण का दांव चल रही है। मतलब सवर्ण और दलित दोनों को एक साथ साधने की कोशिशें बीजेपी ने अब युद्ध स्‍तर पर शुरू कर दी हैं। देखना रोचक होगा कि आखिर परिणाम क्‍या निकलकर आता है।

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