वो बड़े चेहरे जिनके सपने मोदी ने कर दिए चकनाचूर

किंग मेकर बनने की आस में चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र गंवाया, राहुल गांधी अपनी ही सीट बचा नहीं पाए.

हर चुनाव ऐतिहासिक होता है लेकिन ये वाला लोकसभा चुनाव ऐतिहासिक का होल स्क्वायर था. इस चुनाव से नरेंद्र जवाहर और इंदिरा की लीक में शामिल हो गए. इससे पहले लगातार दूसरी बार उन्होंने ही पूर्ण बहुमत हासिल किया था. 1962 में जवाहर ने और 1971 में इंदिरा ने ये कारनामा किया था. नरेंद्र ऐसा करने वाले पहले गैर कांग्रेसी नेता हो गए हैं. नरेंद्र और अमित का सपना पूरा हुआ लेकिन बहुत से ऐसे लोग हैं जो 23 तारीख की दोपहर से लगातार मुकेश, किशोर से लेकर अरिजित सिंह तक के दर्दभरे नगमों की प्लेलिस्ट बजा रहे हैं. तो चलिए इन दुखियारों की बात शुरू से शुरू करते हैं.

राहुल गांधी

सर्वप्रथम विपक्ष के वटवृक्ष का नाम लेते हैं, जो इस चुनाव में छुईमुई हो गए. अमेठी से लगातार 3 बार यानी 15 साल सांसद रहे राहुल गांधी ने स्मृति ईरानी के हाथों मुंह की खाई. जीतने के बाद स्मृति ईरानी ने ट्वीट किया ‘कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता?’ स्मृति ईरानी ने नामुमकिन को मुमकिन करके दिखाया इसमें नरेंद्र के अलावा उनकी मेहनत भी कुछ कम नहीं है. 2014 का चुनाव हारने के बाद भी अमेठी में बनी रहीं और राहुल गांधी की राजनीति की जड़ों में मट्ठा डालती रहीं. राहुल गांधी 38 हजार वोटों से भरभरा कर गिर गए. अब राहुल गांधी को उस आदमी की मूर्ति बनवा देनी चाहिए जिसने उन्हें वायनाड से भी परचा भरने का आइडिया दिया था. नहीं दिया होता तो उनका सांसद बनने का सपना ही टूट जाता. इन्होंने अपने साथ साथ एक फैमिली का सपना भी तोड़ दिया. शत्रुघ्न सिन्हा और पूनम सिन्हा.

इस दंपत्ति के साथ बुरा नहीं, बहुत बुरा हुआ. हालांकि होशियारी इन्होंने पूरी दिखाई थी लेकिन कुछ काम न आई. शत्रुघ्न सिन्हा ने चुनाव से पहले पार्टी बदली. कांग्रेस के टिकट पर पटना से चुनाव लड़ा. रविशंकर प्रसाद ने उन्हें हराया. इधर लखनऊ की वीआईपी सीट से अपनी पत्नी पूनम सिन्हा के लिए प्रचार किया, जो सपा के टिकट पर कांग्रेस और बीजेपी के खिलाफ थीं. दोनों लोग हार गए. एक फैमिली के लिए इससे बड़ी मुश्किल क्या होगी कि इतनी होशियारी बरबाद हो गई. शत्रुघ्न सिन्हा के लिए उनकी ही फिल्म का एक गाना- जिंदगी इम्तेहान लेती है.

अखिलेश यादव

अखिलेश यादव और डिंपल यादव. राजनीति की इस क्यूट जोड़ी के जीवन में भी दुख आ गया. अखिलेश यादव निरहुआ को हराकर सांसद बन गए लेकिन उनकी पत्नी डिंपल जीत नहीं हासिल कर सकीं. उन्हें बीजेपी के सुब्रत पाठक ने हरा दिया. ये सिन्हा फैमिली की तरह बदकिस्मत नहीं हुए, एक सीट तो घर में आई. मगर सपना तो फिर भी टूट गया. कुछ लोग कहेंगे कि इसी लड़के की वजह से मुलायम सिंह यादव का प्रधानमंत्री बनने का सपना भी टूट गया.

सच ये है कि मुलायम का कहा सही हुआ है, उन्होंने संसद में कहा था कि मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्हें खुशी होगी. अखिलेश ने अपने सपने के लिए क्या क्या नहीं किया. चाचा को ठिकाने लगाया, बुवा से गठबंधन किया. मायावती और मुलायम की पुरानी दुश्मनी पर मिट्टी डालकर एक मंच पर लेकर आए लेकिन कुछ काम नहीं आया. जब इन्होंने गठबंधन किया तो कहा गया कि यूपी में सबसे बड़ा वोटबैंक इन्हीं पार्टियों का है, कोई और नहीं ले जा पाएगा लेकिन मामला उलट गया.

मायावती

मायावती भी प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रही थीं. वो तो एग्जिट पोल में ही महागठबंधन हार गया नहीं तो वो मीटिंग करने दिल्ली आ रही थीं. एग्जिट पोल नतीजों के बाद झट से मीटिंग कैंसिल की और तीन दिन इंतजार करने के बाद ईवीएम पर दोष लगा दिया. कहा कि ‘अधिकतर पार्टियां चुनाव आयोग से लगातार कहती रही हैं कि बैलट पेपर से चुनाव कराया जाए. जब कोई गड़बड़ नहीं है, दिल में कोई काला नहीं है तो क्यों नहीं बीजेपी औक चुनाव आयोग बैलट पेपर से चुनाव करा लेते?’

प्रॉब्लम ये है कि ये सवाल इतनी गंभीरता से चुनाव होने के बाद उठाया गया है. इसीलिए कोई इन बातों पर विश्वास नहीं करता. महागठबंधन की जीत पर लोगों को इतना विश्वास था कि भीम आर्मी वाले चंद्रशेखर भी इसमें शामिल होने के लिए जगह बना रहे थे लेकिन मायावती ने जगह दी ही नहीं. अब भीम आर्मी सोच रही होगी कि हुआ तो हुआ.

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी के लिए इससे बुरा क्या होगा कि जिसके लिए वो कुरते भेजती हैं उसी ने उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी. बीजेपी की मानें तो अपने सपने के लिए उन्होंने पश्चिम बंगाल में साम दाम दंड भेद सारे शॉर्टकट अपनाए उसके बावजूद बीजेपी ने वहां बढ़त बना ली. 18 सीटों पर आज वहां बीजेपी का कब्जा है. नरेंद्र मोदी ने कहा था बंगाल में उनकी पार्टी का कार्यकर्ता सुबह घर से निकलता है तो पता नहीं होता कि शाम को सही सलामत घर वापस आएगा या नहीं आएगा. लोग तो ममता बनर्जी को निर्ममता भी कहने लगे थे लेकिन उनके किले में सेंध लग गई है. बंगाल बचाए रखने का सपना भी टूट चुका है.

तेजस्वी यादव

लालू प्रसाद यादव जब विभिन्न मामलों में जेल चले गए तो आरजेडी की कमान उनके छोटे बेटे तेजस्वी यादव ने संभाल ली. लेकिन ये बेटा भी पार्टी और पापा के सपने पूरे नहीं कर पाया. तेजस्वी के नेतृत्व में आरजेडी का इतना बुरा प्रदर्शन रहा कि बिहार से उसका सफाया ही हो गया. एक भी सीट नहीं मिली. बिहार में विपक्ष को जो एक सीट मिली भी है वो कांग्रेस के खाते में चली गई. तेजस्वी यादव को स्ट्रगल का पुराना एक्सपीरियंस है लेकिन अब उनकी पार्टी के स्ट्रगल का दौर आ गया है. उनके साथ भी उस गाने वाला हाल हुआ है ‘अपने ही गिराते हैं नशेमन पे बिजलियां.’ उनके बड़े बाई तेज प्रताप यादव बहुत बड़े वाले साबित हुए और लगातार उस डाल को काटते रहे जिस पर तेजस्वी यादव बैठे हुए थे. रोज रोज इस कदर ड्रामा मचाया कि जनता एंटरटेनमेंट लेने में वोट देना भूल गई.

चंद्रबाबू नायडू

आंध्र प्रदेश में टीडीपी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू को किंगमेकर कहा जाता है. सॉरी, कहा जाता था. अब तो ये meme मेकर हैं, इन पर भारी मात्रा में मीम्स बनाए जा रहे हैं. एनडीए से अलग होकर इन्होंने सफल विपक्ष बनने का सपना देखा था. वो पूरा हो गया तो देश की राजनीति पर फोकस करने का सपना देख लिया. एग्जिट पोल आने से तीन दिन पहले घूम घूमकर अखिलेश यादव, राहुल गांधी, मायावती सबसे मिलने लगे थे. इतना ज्यादा कॉन्फिडेंस था कि कुछ मत पूछिए. सपने ऐसे चकनाचूर हुए कि आंध्र प्रदेश भी हाथ से निकल गया. सीएम पद से इस्तीफा हो गया है. अगर ये करें तो करें क्या बोलें तो बोलें क्या?

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