क्या अब हिंदू-मुस्लिम की पॉलिटिक्स में हाथ आजमाना चाहते हैं मार्क्सवादी सीताराम येचुरी?

सीताराम येचुरी कुछ दिन और चुप रह लेते तो ये चुनाव निपट जाता. लेकिन रामायण-महाभारत में हिंसा की बात करके भाषाई हिंसा को भड़का दिया.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी. वामपंथी नेता, जिनके नाम में सीता भी है राम भी, लेकिन रामायण को लेकर उन्होंने विवादित बयान दे दिया है. कहा “रामायण और महाभारत भी हिंसा और युद्धों से भरी पड़ी हैं. प्रचारक होने के नाते, आप इनका ज़िक्र करते हैं, लेकिन फिर भी दावा करते हैं कि हिन्दू हिंसक नहीं हो सकते. फिर इस बात को कहने के पीछे क्या तर्क है कि एक धर्म है, जो हिंसा करता है, और हम हिन्दू नहीं करते.”

सीताराम येचुरी का इतना कहना था कि दक्षिणपंथी नेता उन पर टूट पड़े. शिवसेना के उद्धव ठाकरे, संजय राउत से लेकर बीजेपी के ‘पाकिस्तान ट्रैवेल्स एजेंट’ गिरिराज सिंह ने उनको खूब खरी खरी सुनाई. इतना सुनने के बाद भी सीताराम येचुरी को शायद ही अहसास हुआ हो कि उनसे कुछ गलत हुआ है.

प्रॉब्लम ये है कि शिवसेना या बीजेपी हिंदू-मुस्लिम, मंदिर-मस्जिद की राजनीति से पूरी तरह ऊब चुकी हैं. वो न तो चुनावी मंच से, न टीवी डिबेट में और न रैली में, कहीं भी भड़काऊ भाषण भी नहीं देना चाहते. लेकिन फिर सीताराम येचुरी जैसे लोग मजबूर कर देते हैं. सब आराम से चल रहा था, येचुरी ने भड़का दिया. अब चिंगारी रख दी है तो आग भड़केगी ही.

सीताराम येचुरी ने मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर मार दिया है. अगर वो रामायण महाभारत को बीच में न लाते तो ये चुनाव शांति से निपट जाता. गिरिराज सिंह कन्हैया से निपटने में लगे थे, संजय राउत फिर कोई बायोपिक बनाने की तैयारी में थे लेकिन सीताराम येचुरी ने उनके अरमान जगा दिए. इतने दिनों से जो कंट्रोल खुद पर कर रखा था वो छूट गया. बयानों की बमबारी शुरू हो गई.

सीताराम येचुरी सच्चे मार्क्सवादी होते तो धार्मिक ग्रंथों का हवाला न देते. मार्क्सवाद धर्म, ईश्वर जैसी चीजों पर विश्वास नहीं करता. फिर क्यों अपनी बात की पुष्टि के लिए उन्होंने धार्मिक किताब का सहारा लिया? इससे तो मार्क्सवाद पर सीताराम येचुरी की निष्ठा पर ही सवाल उठता है.

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये कि किसी भी धर्म में हिंसा देखने के लिए 4-5 हजार साल पहले जाने की जरूरत नहीं है. उसका नजदीकी इतिहास ही हिंसा से भरा हुआ मिल जाएगा क्योंकि हिंसा धार्मिक बंधनों में नहीं बंधी है. अगर कोई हिंसा करता है तो उसे जस्टिफाई भी करता है. हर कोई अपनी हिंसा को ‘बुराई पर अच्छाई की जीत’ और ‘मानवता के लिए आवश्यक’ बताता है.

जो भी हो, चुनाव के समय जनता को जरूरी मुद्दों से भटकाने का ये सबसे सस्ता और अच्छा तरीका है. सड़क, पानी, बिजली, खेती-किसानी, रोजगार, स्कूल, अस्पताल की बात करने में कलेजा कांपता है. बस धर्म जाति मैं फंसाए रहो.

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