कहां से आया ‘जय श्री राम’ का नारा जिस पर बंगाल में छिड़ा है बवाल?

पश्चिम बंगाल 'जय श्री राम' के नारे के साथ लड़ाई का मैदान बना हुआ है. ममता बनर्जी जय श्री राम बोलने वालों को जेल भेजना चाहती हैं और दूसरा पक्ष जय श्री राम के नारे को डर का दूसरा नाम बना देना चाहता है.

राम राम, जय राम, जय सीता राम, जय सिया राम या जय श्री राम. इनमें से एक पर बवाल चल रहा है. ‘जय श्री राम’ का नारा ज़ेरे बहस है. जहां बाकी सारे ‘राम’ संबोधन हैं वहीं जय श्री राम एक राजनैतिक नारा है. पश्चिम बंगाल में इस पर तलवारें खिंची हुई हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जय श्री राम बोलने वालों पर अघोषित बैन सा लगा दिया है. जय श्री राम के नारे लगाने वाली भीड़ को खाल खींचने की धमकी दे रही हैं. उसके जवाब में अपने ट्विटर हैंडल पर ‘जय हिंद-जय बांग्ला’ लिख लिया है.

दूसरी तरफ की मशीनरी पश्चिम बंगाल में जय श्री राम को एक उन्मादी नारा बनाने की भरसक कोशिश में लगी हुई है. जिसका एक ही मकसद है कि जय श्री राम का नारा आतंक का दूसरा नाम बन जाए. चौराहे पर चार लोग अगर जय श्री राम के नारे लगाते दिख जाएं तो आम आदमी वो रास्ता बदल दे, इसकी तैयारी चल रही है. कुछ ट्रोल ट्विटर हैंडल्स मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मेल आईडी पर जय श्री राम लिखकर भेजने को कह रहे हैं.

कहां से आया ‘जय श्री राम’ नारा

दोनों तरफ से लगी आग में लॉ एंड ऑर्डर कितनी देर सुरक्षित है ये कोई नहीं जानता. फिलहाल जय श्री राम और जय हिंद के नारों के पर थोड़ी सी बात होनी चाहिए. ताकि पता चल सके झगड़े की जड़ कहां है. ‘जय श्री राम’ बजरंग दल का मुख्य नारा है. बजरंग दल 1984 में विश्व हिंदू परिषद के युवा संगठन के रूप में बना. तब इसका नारा था ‘सेवा, सुरक्षा, संस्कृति.’

1987 में रामानंद सागर का सीरियल ‘रामायण’ शुरू हुआ. जिसमें हनुमान का रोल करने वाले दारा सिंह ने ‘जय श्री राम’ संबोधन का इस्तेमाल किया. सीरियल की वजह से संबोधन घर घर पहुंच गया. 1990 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में राम रथ यात्रा शुरू हुई. बजरंग दल के लोगों ने उसमें खुलकर भाग लिया और धार्मिक संबोधन ‘जय श्री राम’ को राजनैतिक बना दिया.

कहां से आया ‘जय हिंद’ का नारा

अब बात दूसरे खेमे वाले ‘जय हिंद’ की. 1941 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर अफगानिस्तान होते हुए जर्मनी पहुंचे. उस वक्त अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों के साथ जो सेना बनाई थी वो जातियों-धर्मों की रेजीमेंट में बटी थी. हिंदू सिपाही नमस्ते कहकर अभिवादन करते थे, मुस्लिम सिपाही ‘सलाम अलैकुम’ और सिख ‘सत श्री अकाल’ बोलते थे.

नेता जी के दिमाग में एक सेना बनाने का विचार था जिसमें सभी जाति और धर्मों के लोग एक साथ रहें. उनके बीच खान पान और बोल चाल की दूरी न रहे. उनका साझा अभिवादन भी खोजना था, ये खोजने का काम नेताजी के सचिव आबिद हसन को मिला. आबिद ने दिन रात इस पर विचार किया और ‘जय हिंदुस्तान की’ समझ में आया. इसी को छोटा करके ‘जय हिंद’ का नारा दिया गया और फिर आजाद हिंद फौज का ये अभिवादन बन गया.

नारे पुराने हैं, व्यवस्था अपडेट होती रहती है. अपडेट होती व्यवस्था में ऐतिहासिक चीजों पर लाठी चलती रहने से वो हमेशा प्रासंगिक रहते हैं.

(Visited 502 times, 1 visits today)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *