‘दोबारा पीएम बनें मोदी’, मुलायम की यह ‘कामना’ किसके लिए बनेगी बददुआ, पढ़ें Analysis

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नई दिल्‍ली। मुलायम सिंह यादव ने बुधवार को संसद में बजट सत्र के आखिरी दिन नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की कामना करके ऐसा राजनीतिक दांव चल दिया, जिसने सपा, कांग्रेस, बसपा समेत तमाम मोदी विरोधी खेमे को असहज कर दिया है. यहां तक कि सपा अध्‍यक्ष और मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश यादव से भी जवाब देते नहीं बन रहा है. कई सपा कार्यकर्ता मुलायम के बयान से 2019 में पार्टी को बड़े नुकसान की आशंका जता रहे हैं, तो राजनीतिक विश्‍लेषक बीजेपी को फायदा मिलने की बात भी कर रहे हैं. यहां मायावती फैक्‍टर को नजरअंदाज किया जा रहा है, क्‍योंकि मुलायम ने जो कहा, उससे सबसे पहले बसपा को नुकसान होगा. अब बचे सपा और बीजेपी तो मुलायम सिंह यादव की कामना इन दोनों के लिए नई राह खोलेगी. फायदे और नुकसान की बात करने से पहले मुलायम के बयान के पीछे की वजह पर चर्चा करना जरूरी है. आखिर मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी के दोबारा पीएम बनने की कामना क्‍यों की? तो जवाब में तीन प्रमुख कारण उभरकर सामने आते हैं.

सबसे पहले एक नजर डाल लेते हैं मुलायम सिंह यादव के संसद में दिए बयान पर. उन्‍होंने कहा, ‘मेरी कामना है कि प्रधानमंत्री जी आप फिर से प्रधानमंत्री बनें. मेरा अनुभव है कि मैं जब भी आपसे मिला, आपने तुरंत मेरा काम किया.’ मतलब साफ है कि कुछ तो काम ऐसे रहे जिनकी उम्‍मीद मुलायम सिंह यादव ने पीएम नरेंद्र मोदी से की और वे पूरे हो गए. वो काम क्‍या हैं? समझदार को इशारा काफी है. अब इस बयान के पीछे की वजह टटोलते हैं. नरेंद्र मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने की मुलायम की कामना के पीछे सबसे पहला कारण जो निकलकर सामने आता है, वह है नरेंद्र मोदी के साथ उनकी करीबी.

दूसरी वजह हैं- मायावती। मुलायम के बयान से स्‍पष्‍ट है कि मुलायम सिंह यादव बसपा के साथ सपा के गठबंधन से खुश नहीं हैं. वह नहीं चाहते कि 2019 लोकसभा चुनाव सपा का वोट बसपा को ट्रांसफर हो. वह नहीं चाहते कि अगले आम चुनाव में यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से बसपा को इतनी सीटें मिलें कि मायावती का नाम पीएम पद की रेस में शामिल हो जाए.

नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनते देखने की मुलायम की कामना के पीछे जो तीसरी वजह सामने आ रही है, वह सपा के लिए 2019 चुनाव के बाद सभी विकल्‍प खुले रखना. दरअसल, अखिलेश यादव इस समय मोदी विरोधी खेमे की तरफ से झंडा उठाए हुए हैं. यह सच है कि आम चुनाव से पहले बीजेपी ने कुछ चुनाव हारे हैं, लेकिन अब भी हर सर्वे में सरकार बनाने लायक नंबर सिर्फ और सिर्फ एनडीए के पास दिखाई दे रहे हैं. ऐसे में मोदी के दोबारा पीएम बनने की कामना रख मुलायम ने एनडीए के साथ 2019 चुनाव में साठगांठ के विकल्‍प खुले रख छोड़े हैं. अगर एनडीए बुरी तरह हारा तो अखिलेश यादव को कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष के साथ कदमताल करने में कोई दिक्‍कत नहीं होगी और अगर मोदी सरकार सत्‍ता में वापस आई तो सपा के लिए वहां भी संभावनाएं बनी रहेंगी. भूलिएगा नहीं कि 2014 लोकसभा चुनाव के बाद किस प्रकार से पीछे की लाइन में बैठे मुलायम को अमित शाह हाथ पकड़कर आगे ले आए थे. मुलायम के परिवार में शादी और योगी आदित्‍यनाथ के शपथ हण में भी नरेंद्र मोदी के साथ मुलायम की फाइन ट्यूनिंग सभी ने देखी.

नरेंद्र मोदी के दोबारा पीएम बनने की मुलायम की कामना के पीछे के कारणों पर चर्चा के बाद अब विश्‍लेषण करने की जरूरत है, इसके इम्‍पैक्‍ट की. मुलायम के बयान से किसे नुकसान होगा और किसे फायदा. मुलायम सिंह यादव के हाथ में आज भले ही पार्टी की कमान न हो, लेकिन यह भी सच है कि सपा के कोर वोटर पर आज भी मुलायम का प्रभाव सबसे ज्‍यादा है. नरेंद्र मोदी के लिए मुलायम की कामना का सबसे बुरा असर मायावती पर पड़ेगा.

2019 लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में सपा-बसपा गठबंधन कर चुके हैं. आंकड़ों के लिहाज से सपा-बसपा की जोड़ी बीजेपी के खिलाफ मजबूत नजर आ रही है. 2014 लोकसभा चुनाव के परिणामों पर गौर करें तो बीजेपी को 42.32 प्रतिशत वोट मिला. बीजेपी ने अपने दम पर 71 सीटें जीती थीं. वहीं, सपा को 22.18 प्रतिशत वोट मिला, जबकि बसपा का वोट प्रतिशत 19.62 रहा. सपा-बसपा का वोट प्रतिशत जोड़ने पर स्थिति बदलती नजर आती है, लेकिन यहां एक पेंच है. गठबंधन में सबसे अहम बात होती है वोट ट्रांसफर. चूंकि बसपा का वोटर लॉयल है, ऐसे में सपा को दिक्‍कत नहीं होगी, लेकिन बसपा को सपा का वोट ट्रांसफर होने में समस्‍या आ सकती है. मुलायम सिंह यादव का बयान स्‍पष्‍ट इशारा करता है कि वे सपा के कोर वोटर से स्‍पष्‍ट कह रहे हैं कि बसपा के बजाय बीजेपी के विकल्‍प को चुनो.

अब जरा वोट ट्रांसफर के गणित को समझिए. एक अनुमान के मुताबिक, अगर सपा-बसपा 2014 लोकसभा चुनाव में मिले 22.18 प्रतिशत और 19.62 प्रतिशत वोटशेयर को 2019 में दोहरा देती हैं, यूपी में उन्‍हें 41 सीटें मिल सकती हैं. इस स्थिति में एनडीए को 37 सीटों पर जीत मिलने की संभावना है. अगर सपा-बसपा 2014 में मिले वोट शेयर का 20 प्रतिशत गवां देते हैं तो एनडीए 60 सीटों तक पहुंच जाएगा और सपा-बसपा को 18 सीटें पर जीत प्राप्‍त हो सकेगी. सवाल यह है कि हम सपा-बसपा का वोट शेयर 2019 में गिरने की चर्चा क्‍यों कर रहे हैं? इसके पीछे दो कारण हैं। अलग-अलग राज्‍यों में बन रहे महागठबंधन या गठबंधनों के पास प्रधानमंत्री पद का क्लियर कट दावेदार नहीं है. बीजेपी इसे मुद्दा बना रही है. अब मुलायम ने बीजेपी की इसी लाइन को सपा कार्यकर्ता और वोटर तक पहुंचा दिया है, मतलब 2019 तक गठबंधन को लेकर कन्‍फ्यूजन और बढ़ेगा, जितना कन्‍फ्यूजन बढ़ेगा सपा-बसपा वोट ट्रांसफर में उतनी ही दिक्‍कत आएगी. नरेंद्र मोदी के दोबारा पीएम बनने की मुलायम सिंह की कामना के पीछे मुख्‍य वजह भी यही है- बसपा को सपा का वोट कम ट्रांसफर हो और यूपी महागठबंधन में सपा बड़ी पार्टी बनकर उभरे और मायावती का नाम किसी भी सूरत में पीएम पद की रेस में शामिल न हो पाए.