मंच सजे हैं, माइक लगे हैं, शोर भी बेतहाशा, पर ‘ठेठ बिहारी’ के न होने की कसक

Share this on WhatsAppमुंह में पान की गिलोरी, सिर पर हरा गमछा, चमरे का चप्पल और स्टार्च लगा कुर्ता पायजामा. लालू यादव की यही तस्वीर बिहार की राजनीतिक फिजा में 70 के दशक से तैरती आई है. खांटी देहाती अंदाज़ में बिहार के गरीब गुरबों के बीच मसीहाई ईमेज बना लेने वाले लालू साढ़े तीन […]

मुंह में पान की गिलोरी, सिर पर हरा गमछा, चमरे का चप्पल और स्टार्च लगा कुर्ता पायजामा. लालू यादव की यही तस्वीर बिहार की राजनीतिक फिजा में 70 के दशक से तैरती आई है. खांटी देहाती अंदाज़ में बिहार के गरीब गुरबों के बीच मसीहाई ईमेज बना लेने वाले लालू साढ़े तीन दशक बाद पहली बार 2019 के महासमर में नेपथ्य में हैं. इसकी कमी न सिर्फ उनके बेटे तेजस्वी यादव और राष्ट्रीय जनता दल को खलेगी बल्कि पूरा देश एक करिश्माई नेता को मिस करेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को लालू की जमानत याचिका खारिज कर दी. 70 की उम्र में कई सारी बीमारियों से जूझ रहे लालू के भीतर लड़ने का जज्बा बरकरार है. इसीलिए बिना किसी हिचक के उन्होंने याचिका में इस बात का जिक्र किया कि वो लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए प्रचार करना चाहते हैं. इसकी अनुमति दी जाए. हालांकि कोर्ट ने दलील नहीं मानी. चारा घोटाले में सजा काट रहे लालू रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में भर्ती हैं. तेजस्वी हों या शरद यादव, महागठबंधन के सारे नेता टिप्स लेने रिम्स में उनके प्राइवेट वार्ड में आ-जा रहे हैं.

lalu prasad yadav लालू प्रसाद यादव, मंच सजे हैं, माइक लगे हैं, शोर भी बेतहाशा, पर ‘ठेठ बिहारी’ के न होने की कसक
लालू प्रसाद यादव के समर्थक अभी भी पार्टी के साथ हैं.

लेकिन मंच पर मौजूदगी और बंद कमरे में टिप्स देने में जमीन-आसमान का अंतर है. कानून चुनाव लड़ने पर बैन के बावजूद लालू एक मास लीडर रहे हैं. इसकी बानगी अब भी उनके ट्वीट से मिल जाती है. हाल ही में पीएम मोदी और नीतीश की रैली जब पटना में हुई तो लालू ने लिखा … नरेंद्र मोदी, नीतीश और पासवान जी ने महीनों ज़ोर लगा सरकारी तंत्र का उपयोग कर गांधी मैदान में उतनी भीड़ जुटाई है जितनी हम पान खाने अगर पान की गुमटी पर गाड़ी रोक देते है तो इकट्ठा हो जाती है. जाओ रे मर्दों, और जतन करो, कैमरा थोड़ा और ज़ूम करवाओ.

मंडल से कमंडल को नकारा

ये सच है कि अगर लालू की आहट मिल जाए तो उन्हें वोट करने वाले और नहीं करने वाले दोनों उनसे संवाद करना चाहते हैं. भीड़ जुट जाती है. 90 के दशक से ही जनसंचार का उनका तरीका निराला रहा है. जब राम मंदिर आंदोलन जोड़ पर था तब कमंडल को मंडल से कुंद करने वालों में लालू आगे रहे. 1990 में अश्वमेघ की तरह आडवाणी के बढ़ रहे रथ को समस्तीपुर में रोक कर अरेस्ट करवा दिया. चर्चा और आशंका हर ओर थी. लेकिन लालू ने अपने गंवई अंदाज में ही इसे हैंडल किया. बिहार में कहीं भी फसाद नहीं हुआ. सामाजिक न्याय के हथियार से पिछड़े वर्गों और दलितों में नई चेतना आई. मुसलमानों में लालू के सेक्युलर छवि की छाप अब भी बाकी है. हां ये ज़रूर है कि सिर्फ जातीय गोलबंदी पर राज करने की लालू की रणनीति 2005 में ही फेल हो चुकी.

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पर लालू की लोकप्रियता जस की तस है. 90 में सीएम की कुर्सी पर काबिज हुए लालू की तूती हर लोकसभा चुनाव में दिल्ली तक बोलती रही. 1996 में तो लालू की नज़र पीएम की कुर्सी पर थी. जब वो प्रचार करने निकले तो हर जगह इसका खुला इजहार भी करते.

लालू कहीं भी काफिला रोक देते और अपनी कार से उतर चिल्लाते … ओ गाय चराने वालों, ओ बकरी चराने वालों, ओ ताड़ी पीने वालों, वोट देना सीखो.

मजबूत सामाजिक गठजोड़ बनाने वाले लालू ने नारा दिया … बिहार चला दिल्ली की ओर. लालू ने अपने हेलीकॉप्टर का नाम भी रानी रखा था. गरीबी के नाम पर अय्याशी का इल्जाम लगाने वालों को लालू अपने अंदाज में ही जवाब देते. उनका कहना था गरीब को कुर्सी मिलने के कारण ये साजिश चल रही है. लालू के वोटर उनसे इत्तेफाक भी रखते हैं. 18 मार्च , 1996 में लालू ने पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में गरीब रैली का आयोजन किया. इसके बाद दस दिनों में ही 54 लोकसभा क्षेत्रों का ताबड़तोड़ दौरा वो कर चुके थे.

पीएम पद पर खुद की नजर को लालू पूरे बिहार के जनमानस की भावना में तब्दील कर चुके थे. तभी तो लालू मंच से ललकारते – कोई माई का लाल आपको दिल्ली पर कब्जा करने से नहीं रोक सकता.. एक भोजपुरी गाने के बोल भी पढ़ लीजिए.. अब दिल्ली तोहे बुलावे, चढ़ईया करबा न..

तब एक जुमला आम हो गया था.. जब तक रहेगा समोसे में आलू.. तब तक रहेगा बिहार में लालू

जब बैलट बॉक्स से निकलता था जिन्न

नाटकीयता, भोजपुरी लोकगीतों और चुटकुलों से समां बांधने वाले लालू अक्सर मंच से ही किसी बजुर्ग गरीब को अपने पास बुलाते. उनकी भाषा में बात करते जिसकी आवाज माइक के जरिए भीड़ तक पहुंचती थी. दरअसल ये आवाज़ नहीं बल्कि लालू के समर्थन हासिल करने की कवायद होती थी. तब ईवीएम का जमाना नहीं था. 90 के दशक में बैलट पेपर से वोट डाले जाते थे. एक बार लालू ने एक महिला को मंच पर बुलाया और कहा… ये मेरे जिन्न हैं जो बैलट बॉक्स खुलने के बाद निकलेंगे.

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ये वो दौर था जब बिहार में लड़ाई लालू बनाम अन्य को बीच मानी जाती थी. 1996 के लोकसभा चुनाव में लालू के जनता दल को 22 सीटें मिली. अटल की 13 दिन वाली सरकार के जाने के बाद लालू ने हाथ पैड़ तो मारे लेकिन दिल्ली का तख्त पहुंच से बाहर रहा. एचडी देवगौड़ा पीएम बन गए. एक साल बाद ही संयुक्त मोर्चे की सरकार डगमगाई तो कांग्रेस ने आईके गुजराल को पीएम बना दिया.

लालू सीएम की कुर्सी पर काबिज रहे. हालांकि उसी साल चारा घोटाले का जाल उनकी तरफ बढ़ने लगा था. इस बीच 1997 में गुजराल ने जब राज्यपाल से लालू के खिलाफ चार्जशीट दायर करने की अनुमति देने पर हामी भर दी तो लालू भड़क उठे. जनता दल दो फाड़ हुआ और लालू ने राष्ट्रीय जनता दल का गठन किया. बीवी राबड़ी देवी को अपनी कुर्सी दे दी. आंगन की दहलीज पार करते ही राबड़ी देवी विधानसभा में सीधे बतौर सीएम दाखिल हो गईं. देश भर में लालू की आलोचना शुरू हुई लेकिन राजनीतिशास्त्र के छात्र रहे लालू ने न केवल पार्टी को साध लिया बल्कि अपने वोटरों को भी फैसले से सहमत कराने में कामयाब रहे.

1998 में जब गुजराल सरकार गिरने के बाद चुनाव हुए तब लालू मधेपुरा से लोकसभा पहुंचे. आज के मित्र शरद यादव से उनकी टक्कर मधेपुरा सीट पर होती आई है. इस साल आरजेडी को 17 सीटें मिली लेकिन अटल जी सरकार बनाने में कामयाब रहे. राबड़ी सीएम पद पर काबिज थीं और लालू मौके की ताक में थे. 13 महीने बाद अटल सरकार गिर गई और मौका फिर सामने था. लालू का करिश्मा बरकार था. आरजेडी ने अपने बूते 51 में 21 सीटें हासिल की. लालू मधेपुरा से चुनाव हार गए.

पराभव में भी जीत का भाव

हालांकि वो राज्यसभा में पहुंचे और संसद उनके चुटीले व्यंग्य सांसदों को अक्सर लोट-पोट करते रहे. 2004 में एक बार फिर आरजेडी ने 21 सीटें हासिल की. लालू छपरा और मधेपुरा दोनों सीटों से जीते और मनमोहन सरकार में रेल मंत्री बने. सब्जी के लिए ट्रेन चलाने से लेकर कुल्हड़ में चाय तक की योजना लालू ने शुरू की. इस बीच 2005 में बिहार से आरजेडी का सफाया हो गया जब नीतीश कुमार की अगुआई में एनडीए ने विधानसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया. यहीं से लालू की पार्टी पीछे होती गई. नए सामाजिक गठजोड़ की गुंजाइश नहीं थी. सामाजिक चेतना के बाद वोटर नीतीश के विकास के एजेंडे की तरफ बढ़ गया.

lalu prasad yadav लालू प्रसाद यादव, मंच सजे हैं, माइक लगे हैं, शोर भी बेतहाशा, पर ‘ठेठ बिहारी’ के न होने की कसक

लेकिन लालू के अंदाज़ में कोई बदलाव नहीं आया. न ही लालू के चेहरे पर कभी कोई शिकन दिखी. 2009 में लालू की पार्टी चार सीटों पर सिमट गई और लालू केंद्र सरकार से भी बाहर हो गए. 2010 में नीतीश प्रचंड बहुमत से वापस लौटे. लालू की राजनीति को सबने मानो अंतिम विदाई दे दी. 2014 में मोदी लहर के आगे आरजेडी फिर नहीं टिक पाई. पर किस्मत ने पासा पलटा. लालू जिस नीतीश को कहा करते थे कि उनके पेट में दांत है और 76 फुट की अंतरी है, वही अब बीजेपी से अलग हो उनके साथ था. फिर क्या.. 2015 के विधानसभा चुनाव में लालू की पार्टी सत्ता में आ गई.

लेकिन इस बीच 2013 में चारा घोटाले में सजा मिलने के बाद लालू चुनाव लड़ने से दूर हो गए. पर चुनाव प्रबंधन से लेकर रणनीति बनाने तक की भूमिका उन्होंने ही निभाई. इस दौरान वो मोदी को लगातार निशाने पर लेते रहे. कांग्रेस के साथ उनकी साझीदारी जारी रही. राहुल और तेजस्वी की केमिस्ट्री में तड़का लगाने की उनकी सारी कोशिशों पर तब पानी फिर गया जब रांची की विशेष अदालत ने एक के बाद एक चारा घोटाले से संबंधित लगातार चार फैसले उनके खिलाफ दिए और अलग-अलग 27 साल की सजा सुनाई गई.

आरजेडी को अंतिम उम्मीद सुप्रीम कोर्ट से थी लेकिन जमानत याचिका खारिज होने के बाद ये तय हो गया है कि बिहार में 2019 का चुनाव बिना लालू प्रसाद यादव के होगा.

अंत में आपको लालू यादव के एक ऐसे ही निराले अंदाज से रू-ब-रू कराते हैं..