प्रत्याशियों के चयन में कांग्रेस की तेजी, 2019 लोकसभा चुनाव के लिए राह करेगी आसान?

सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर कांग्रेस को सवर्ण वोट बैंक से आस है, लेकिन अभी तक जिन नामों की सूचियां जारी की गई है, उसमें सोनिया और राहुल गांधी को छोड़कर सिर्फ 3 ब्राह्मण प्रत्याशी ही मैदान में उतारे गए हैं.

नई दिल्ली: लोकसभा चुनाव में प्रत्याशियों के नामों पर देश के तमाम दल विचार कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस अपने प्रत्याशियों के चयन में तेज़ी से काम कर रही है. कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों की दूसरी सूची भी जारी कर दी है.

इस सूची में 21 प्रत्याशियों के नाम हैं, जिनमें गठबंधन से मुक़ाबला करने के लिए 16 नाम उत्तर प्रदेश के हैं, तो वहीं 5 नाम महाराष्ट्र के प्रत्याशियों के हैं.

महाराष्ट्र में हालांकि कांग्रेस का मुक़ाबला सीधे तौर पर बीजेपी और शिवसेना के गठबंधन से है, लेकिन यूपी में कांग्रेस की डगर चुनौतियों से भरी है.

यूपी में कांग्रेस की बागडोर प्रियंका के हाथ में मानी जा रही है, फिर भी यहां गठबंधन और बीजेपी से मुक़ाबला करके अपने आधार को मज़बूत करना कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा.

सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले पर कांग्रेस को सवर्ण वोट बैंक से आस है, लेकिन अभी तक जिन नामों की सूचियां जारी की गई है.

उसमें सोनिया और राहुल गांधी को छोड़कर सिर्फ 3 ब्राह्मण प्रत्याशी ही मैदान में उतारे गए हैं, जिससे सवर्ण वोट बैंक में पुराना विश्वास जगाना किसी मुश्किल के कम नहीं होगा.

मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव:

यूपी का गठबंधन बीजेपी की हिंदुत्व वाली छवि से मुक़ाबला करने के लिए मुस्लिम प्रत्याशियों पर दांव लगाने से परहेज़ कर रहा है, तो कांग्रेस मुस्लिमों को अपने पाले में लाने की पूरी कोशिश कर रही है.

कांग्रेस ने अपनी लिस्ट में 7 मुस्लिम प्रत्याशियों के नाम शामिल किए हैं, इनमें इमरान मसूद, सलमान ख़ुर्शीद, सलीम शेरवानी, ज़फ़र अली, केशर जहां, मंज़र राही और परवेज़ ख़ान जैसे नाम शामिल किए गए हैं.

हालांकि गठबंधन के पास क़रीब 40 फ़ीसदी वोट बैंक है, इसलिए मुस्लिम वोट कांग्रेस के खेमे में जाने पर संशय है, लेकिन मुस्लिम प्रत्याशी इस वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं.

कांग्रेस ने छोड़ा अति पिछड़ा वर्ग:

अब तक की कवायद में अति पिछड़े जैसे तबके को साधने के लिए कांग्रेस कोई कोशिश करते नज़र नहीं आ रही है, हालांकि जातीय समीकरण के बहुसंख्यक वोट यादव और कुर्मी, गठबंधन और बीजेपी से जुड़ने की वजह से ओबीसी की बाकी जातियों के लिए कांग्रेस विकल्प बन सकती है.

इसलिए राजभर, मौर्या, कश्यप, निषाद, बांध, प्रजापति जैसी जातियों के नेताओं पर दांव लगाना कांग्रेस के लिए फ़ायदेमंद हो सकता है.

यूपी में कांग्रेस का प्लान बी:

शिवपाल यादव की पार्टी से गठबंधन की संभावना को देखते हुए राज बब्बर को कांग्रेस ने फिरोज़ाबाद सीट की बजाय मुरादाबाद सीट से उम्मीदवार बनाया है, मुस्लिम बहुल मुरादाबाद सीट 2009 में कांग्रेस के पास थी.

अब भले ही राज बब्बर के लिए ये सीट नई हो, लेकिन अज़हरुद्दीन इसे कांग्रेस की झोली में ला चुके हैं, इसलिए कांग्रेस उम्मीद के सहारे इस सीट पर एक्सपेरिमेंट कर रही है.

इसके अलावा समाजवादी पार्टी और बीजेपी के असंतुष्ट नेताओं को भी टिकट देकर कांग्रेस ने दूसरी पार्टी के असंतुष्टों के लिए दरवाज़े खोल दिए हैं.

बात फतेहपुर सीट की हो तो यहां पर राकेश सचान का आधार मज़बूत है, लेकिन यहां एसपी से अलग होकर कांग्रेस की जड़ें जमाने में उन्हें मुश्किल आ सकती है.

वहीं दलित बहुल बहराइच सीट से सावित्री बाई फुले को टिकट देने का फ़ैसला कांग्रेस का रणनीतिक कदम है, इससे आसपास की सीटों पर भी दलित वोटबैंक पर असर पड़ेगा.

कांग्रेस का सियासी समीकरण:

कांग्रेस ने अभी तक 27 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दी है, इनमें 9 नाम पूर्व सांसदों के हैं, पार्टी पूर्व सांसदों के पुराने वजूद को भुनाने की भी कोशिश करेगी. इसके अलावा मुस्लिम और दलित समीकरण को भी अब तक तवज्जो दी गई है, लेकिन छोटे दलों के साथ कांग्रेस की साझेदारी और बाकी सीटों पर उम्मदीवारों का चयन ही कांग्रेस की सियासी राह यूपी में आस कर सकता है.

वहीं गठबंधन के रुख को देखते हुए प्रियंका गांधी वाड्रा का दायरा भी अमेठी और रायबरेली से आगे बढ़ाना पड़ेगा.

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