‘सरकारें आती-जाती रहेंगी, चुनाव आयोग की साख बरकरार रहनी चाहिए’, पूर्व CEC की राय

पूर्व मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त एस.वाई. कुरैशी ने पिछले दो महीनों में आयोग की कार्यप्रणाली पर चिंता जताई है.

नई दिल्‍ली: भारत के 17वें मुख्‍य चुनाव आयुक्‍त (CEC) रहे एस.वाई. कुरैशी ने चुनाव आयोग (EC) की घटती साख पर चिंता जाहिर की है. कुरैशी का कहना है कि यह देखना दुर्भाग्‍यपूर्ण है कि अब नेताओं के असंवैधानिक व्‍यव‍हार के बजाय चुनाव EC को लेकर चर्चा हो रही है. कुरैशी ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखा है कि वे चुनाव आयोग के ‘स्‍व-नियुक्‍त प्रवक्‍ता’ की तरह काम करते रहे हैं. उन्‍होंने लिखा कि हाल की घटनाओं को लेकर कई मौकों पर उनसे मीडिया ने टिप्‍पणी मांगी तो वह सही शब्‍द नहीं चुन पाए.

पूर्व CEC ने लिखा है कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार फटकारे जाने के बाद चुनाव आयोग सख्‍त हुआ. उन्‍होंने लिखा कि यह देखकर तरस आता है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को उन शक्तियों का एहसास करा रहा है, जो उसके पास पहले से थीं. 15 अप्रैल को प्रधान न्‍यायाधीश रंजन गोगोई की अध्‍यक्षता वाली एक पीठ ने चुनाव आायोग को फटकारते हुए कहा था कि उसे नफरती बयानों और धार्मिक आधार पर दिए गए बयानों पर कार्रवाई करनी चाहिए.

कुरैशी ने आगे लिखा है कि चुनाव आयोग ने अदालत में कहा कि ‘हम शक्तिहीन हैं. हम नोटिस जारी करते हैं, फिर एडवाजयरी. बार-बार उल्‍लंघन पर हम शिकायत करते हैं.’ सुप्रीम कोर्ट EC के इस जवाब से बेहद नाखुश दिखा.

1977 में सुप्रीम कोर्ट ने क्‍या कहा था

कुरैशी ने 1977 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्‍पणी भी याद दिलाई. इसमें कहा गया था कि “मुख्य चुनाव आयुक्‍त को अपनी शक्तियों का इस्‍तेमाल करने के लिए हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करने की जरूरत नहीं है. उसे स्‍वतंत्र होकर अपनी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए ताकि चुनाव प्रक्रिया निष्‍पक्ष ढंग से पूरी हो सके.” पूर्व CEC ने इसे ‘चुनाव आयोग की बाइबिल’ की संज्ञा दी है.

अपने लेख में कुरैशी कहते हैं “EC ने करीब एक महीने तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और BJP अध्‍यक्ष अमित शाह के खिलाफ शिकायतों पर एक्‍शन नहीं लिया. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि 6 मई से पहले इन्‍हें निपटाओ. फिर चुनाव आयोग से दोनों नेताओं को हर मामले में क्‍लीन चिट दे दी. आयोग लगभग खत्‍म ही हो चला था कि हमें एक अच्‍छी खबर मिली कि कम से कम एक चुनाव आयुक्‍त ने आयोग के पांच फैसलों से असहमति जताई है. उनके अल्‍पसंख्‍यक वोट ने भले ही फैसला न बदला हो, लेकिन असहमति विमर्श के लिए अच्‍छा संकेत है, आशा की किरण है.”

देश में लागू हों चुनावी सुधार : कुरैशी

पूर्व CEC का मानना है कि इस समस्‍या की जड़ चुनाव आयुक्‍तों की नियुक्ति के सिस्‍टम में गड़बड़ी होना है. उन्‍हें पूरी तरह वर्तमान सरकार के जरिए नियुक्‍त किया जाता है. दूसरे देशों की तरह, यहां भी नियुक्तियों को राजनीति से दूर रखने के लिए अलग बोर्ड बनाने की मांग उठती रही है. कुरैशी ने लिखा है कि चुनाव आयुक्‍तों को हटाने की प्रक्रिया में भी थोड़ा बदलाव होना चाहिए.

कुरैशी ने लिखा है कि ‘दो दशकों से 40 से ज्‍यादा चुनावी सुधार लंबित पड़े हैं. राजनैतिक नेतृत्‍व से कोई उम्‍मीद करना बेमानी लगता है, ऐसे में चुनाव आयोग को संविधान के तहत मिले अधिकारों का खुलकर प्रयोग करना चाहिए. उसके पास सुप्रीम कोर्ट का समर्थन है ही. चुनाव आयोग को सख्‍ती बरतनी ही होगी. सरकारें आती और जाती रहेंगी, लेकिन चुनाव आयोग की साख बनी रहनी चाहिए.’

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