चुनाव आयोग ने नहीं मानी अशोक लवासा की बात, आदेश में नहीं बताएंगे कैसे हुआ फैसला

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आयोग के आखिरी निर्णयों में अल्पमत को शामिल नहीं किए जाने के विरोध में आचार संहिता उल्लंघन (MCC) मामलों की बैठकों से खुद को दूर रखा है.
अशोक लवासा, चुनाव आयोग ने नहीं मानी अशोक लवासा की बात, आदेश में नहीं बताएंगे कैसे हुआ फैसला

नई दिल्ली.  चुनाव आयोग ने मंगलवार को आचार संहिता उल्लंघन के मामलों को सार्वजानिक करने निर्वाचन आयुक्त अशोक लवासा की मांग को खारिज कर दिया है. लवासा ने आदर्श आचार संहिता (MCC) पर अल्पमत का निर्णय रिकॉर्ड करने और इसे सार्वजनिक करने की मांग की थी.

तीन सदस्यीय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) सुनील अरोड़ा और आयुक्त लवासा और सुशील चंद्र शामिल हैं.

चुनाव आयोग ने एक बयान में कहा, “आदर्श आचार संहिता के मुद्दे के बारे में आज आयोजित चुनाव आयोग की बैठक में, यह आपसी सहमती से तय किया गया कि आयोग की बैठकों की कार्यवाही तैयार की जाएगी, जिसमें सभी आयोग सदस्यों के विचार भी शामिल होंगे. इसके बाद, इस आशय के औपचारिक निर्देश मौजूदा कानूनों / नियमों, आदि के अनुरूप जारी किए जाएंगे.”

चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आयोग के आखिरी निर्णयों में अल्पमत को शामिल नहीं किए जाने के विरोध में आचार संहिता उल्लंघन (MCC) मामलों की बैठकों से खुद को दूर रखा है. लवासा ने 4 मई को ये सुझाव दिया था कि, उनके मत को आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में चुनाव आयोग के निर्णय में शामिल किया जाए. इसके बाद उन्होंने 10 और 14 मई को इस मांग को दोबारा याद भी दिलाया. लेकिन, जब उनकी मांग नहीं सुनी गई तब लवासा ने अरोड़ा को चुनाव आयोग की बैठक में नहीं शामिल होने के अपने निर्णय से 16 मई को अवगत कराया.

लवासा के नोट को चुनाव आयोग ने बताया था ‘आंतरिक मामला’

चुनाव आयुक्‍त का नोट सामने आने के बाद आयोग ने सफाई देते हुए कहा था कि ’14 मई को ईसी की पिछली बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया था कि लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान सामने आए मुद्दों से निपटने के लिए कुछ समूह गठित किए जाएंगे, जैसा कि 2014 के लोकसभा चुनाव बाद किया गया था. बयान में कहा गया, “पहचाने गए 13 मुद्दों में आदर्श आचार संहिता (एमसीसी) भी शामिल था.”

मतभेद सामने आने के बाद सीईसी सुनील अरोड़ा ने कहा था कि MCC पर लवासा का पत्र आयोग का आंतरिक मामला है. अरोड़ा ने कहा था कि अतीत में भी निर्वाचन आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद रहे हैं, लेकिन वह मानते हैं कि बेकार का विवाद पैदा करने से बेहतर है कि शांत रहा जाए. बयान में कहा गया, “निर्वाचन आयोग के तीनों सदस्यों से एक-दूसरे का क्लोन या टेम्पलेट होने की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। पहले भी कई बार मतभेद रहा है, जो हो सकता है और होना भी चाहिए.”

ये भी पढ़ें: एयरफोर्स मिसाइल ने लॉन्‍च के 12 सेकेंड में ही उड़ा दिया था अपना Mi-17, जानें कहां हुई चूक

लवासा ने पीएम को क्लीन चिट मिलने पर आपत्ति जताई थी

लवासा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को लोकसभा चुनाव के दौरान आचार संहिता उल्लंघन के पांच मामलों में क्लीन चिट दिए जाने पर आपत्ति जताई थी. इन मामलों में चुनाव आयोग ने दी थी क्लीन चिट-

चुनाव आयोग ने चार मई को कहा था कि मोदी ने गुजरात के पाटन में 21 अप्रैल को दिए अपने भाषण में आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया था. प्रधानमंत्री ने कहा था कि उनकी सरकार ने भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्थमान की सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान को मजबूर कर दिया था.

आयोग ने महाराष्ट्र के नांदेड़ में मोदी के उस भाषण में भी कुछ गलत नहीं पाया जिसमें उन्होंने कथित रूप से कांग्रेस को डूबता जहाज बताया था.

इससे पहले चुनाव आयोग ने वर्धा में एक अप्रैल को मोदी के उस भाषण को भी क्लीन चिट दे दी थी जिसमें उन्होंने केरल की अल्पसंख्यकों की बहुलता वाली सीट से चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर हमला बोला था.

चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को लातूर में पहली बार वोट डालने जा रहे मतदाताओं से पुलवामा के शहीदों के नाम अपना वोट समर्पित करने की उनकी अपील पर भी उन्हें क्लीन चिट दे दी थी.

ये भी पढ़ें: भारतीय सैनिकों के लिए इस बार जरूर जीतेंगे वर्ल्ड कप: विराट कोहली

16 मई को बैठक से अलग हुए थे लवासा

15 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रचार के दौरान कथित रूप से भड़काऊ भाषणों पर कार्रवाई का ब्‍योरा मांगा था. उसी दिन EC ने बसपा प्रमुख मायावती, सपा नेता आजम खान, यूपी सीएम योगी आदित्‍यनाथ और केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके तीन दिन बाद लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़ी शिकायतों पर कार्रवाई की प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए नोट लिखा था. जब उनके सुझावों पर कोई अमल नहीं हुआ और आयोग के अंतिम आदेशों में उनके फैसलों को रिकॉर्ड नहीं किया गया तो 16 मई को उन्‍होंने आयोग की बैठक से खुद को अलग कर लिया था. लवासा ने अखबार से सोमवार शाम कहा, “अगर चुनाव आयोग के फैसले बहुमत से होते हैं और आप (अंतिम आदेश में) अल्‍पमत की राय नहीं शामिल करते तो अल्‍पमत की राय का मतलब क्‍या है?”

Related Posts