क्या ठीक होगा EVM को छोड़ बैलेट पेपर के युग में वापस जाना?

BJP के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ईवीएम के ज़रिए वोटों का 'होलसेल फ्रॉड' करने का आरोप लगाया था.

चुनाव का वक्त जैसे ही नजदीक आता है EVM (इलेक्ट्रानिंग वोटिंग मशीन) को लेकर चर्चा तेज़ हो जाती है. हर बार सत्ता से बेदखल हुई पार्टी ही EVM मशीन में टैम्परिंग का आरोप लगाती है. हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समेत कई अन्य दलों ने EVM मशीन को हटाकर बैलेट पेपर से मतदान कराने की मांग की है.

लाल कृष्ण आडवाणी ने पहली बार EVM पर उठाया था सवाल

हालांकि एक सच यह है कि साल 2009 में बीजेपी को मिली हार के बाद नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ईवीएम पर सबसे पहले सवाल खड़े किए थे. 2010 में इसी अभियान के तहत भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा प्रवक्ता और चुनावी मामलों के विशेषज्ञ जीवीएल नरसिम्हा राव ने एक किताब लिखी- ‘डेमोक्रेसी एट रिस्क, कैन वी ट्रस्ट ऑर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन?’

इस पुस्तक में वोटिंग सिस्टम के एक्सपर्ट स्टैनफ़र्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर डेविड डिल ने भी माना कि ईवीएम का इस्तेमाल पूरी तरह से सुरक्षित नहीं है.

BJP प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा ने किताब की शुरुआत में लिखा- “मशीनों के साथ छेड़छाड़ हो सकती है, भारत में इस्तेमाल होने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन इसका अपवाद नहीं है. ऐसे कई उदाहरण हैं जब एक उम्मीदवार को दिया वोट दूसरे उम्मीदवार को मिल गया है या फिर उम्मीदवारों को वो मत भी मिले हैं जो कभी डाले ही नहीं गए.”

BJP के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ईवीएम के ज़रिए वोटों का ‘होलसेल फ्रॉड’ करने का आरोप लगाया था. सुब्रमण्यम स्वामी के मुताबिक 2009 के चुनाव में 90 ऐसी सीटों पर कांग्रेस को जीत मिली जो संभव नहीं था.

वहीं 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी को जीत मिलने के बाद कांग्रेस नेता और असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने भी ईवीएम पर सवाल उठाए.

यानी कि जब-जब पार्टी हारती है तो EVM को लेकर सवाल खड़े करती हैं.

EVM कैसे करता है काम?

ईवीएम का इस्तेमाल शुरू करने के पीछे मुख्य मकसद वोटिंग और मतगणना की प्रक्रिया को तेज़ और आसान बनाना था.

साल 1999 में गोवा चुनाव में इसका पहली बार प्रयोग किया गया था वहीं 2004 में पहली बार लोकसभा चुनाव में भी इसका प्रयोग किया गया.

ईवीएम में एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेट यूनिट और 5 मीटर की एक केबल होती है. यह मशीन बैटरी से चलती है. इसका कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होता है जबकि बैलेट यूनिट का प्रयोग मतदाता करते हैं.

मतदान अधिकारी द्वारा कंट्रोल यूनिट से बैलेट बटन प्रेस करने के बाद ही बैलेट यूनिट से वोट डाल पाना मुमकिन है.

अगर किसी ने बैलेट यूनिट से एक बार वोट डाल दिया तो फिर दोबारा बटन दबाने से कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि आपका वोट लॉक हो जाता है.

क्या हैक हो सकती है EVM मशीन?

कई देशों ने माना है कि ईवीएम मशीन न केवल हैक की जा सकती हैं बल्कि नतीजों में फेरबदल भी किया जा सकता है. ईवीएम मशीन किसी इंसान द्वारा बदली भी जा सकती है.

इन देशों में EVM पर है बैन?

आयरलैंड ने तीन साल तक रिसर्च के बाद सुरक्षा और पारदर्शिता का हवाला देते हुए इसे बंद करा दिया. इतना ही नहीं नीदरलैंड, इटली और जर्मनी का भी यही हाल है.

इटली का मानना है कि इस मशीन से नतीजों को बदला जा सकता है. वहीं अमेरिका के कैलिफोर्निया और अन्य राज्यों ने ईवीएम का बिना पेपर ट्रेल के इस्तेमाल बंद कर दिया.

इसके अलावा वेनेजुएला, मैसिडोनिया और यूक्रेन में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में कई तरह की गड़बड़ियां सामने आई और इसे बंद कर दिया गया.

भारत में इस्तेमाल होने वाली EVM अन्य देशों से अलग

भारत में इस्तेमाल होने वाली ईवीएम मशीन पूरी तरह से ऑफलाइन चलती हैं. ईवीएम के नेटवर्क से जुड़े होने के कारण उसमें छेड़छाड़ की संभावना लगभग ख़त्म हो जाती है. भारत में ईवीएम ‘भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड’ और ‘इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया’ नाम की कंपनी बनाती हैं. मशीन में लगने वाली माइक्रोचिप सॉफ्टवेयर भी यही कंपनी बनाती है.

बैलेट पेपर की क्या है समस्या ?

बैलेट पेपर की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें मतगणना की प्रक्रिया काफी धीमी है. इतना ही नहीं बैलेट पेर को ले जाने औऱ इकट्ठा करने की प्रक्रिया भी काफी मुश्किल है. हालांकि इसमें वोट करने के बाद व्यक्ति विशेष को इस बात की संतुष्टि रहती है कि उसने अमुख पार्टी या व्यक्ति को वोट किया है लेकिन इस बार वीवीपेट का इस्तेमाल के बाद लोगों को यहां भी इस बात की जानकारी मिल जाएगी.

इसके अलावा पेपर की खपत भी काफी ज़्यादा बढ़ जाएगी.

भारत में चुनावों के इतिहास को देखें तो आप पाएंगे कि यहां भी कई बार गड़बड़ी के आरोप लगे हैं.

बैलेट पेपर का इतिहास

इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया की पांचवी जनरल रिपोर्ट (1971-72) के मुताबिक 20 मार्च, 1971 को ब्लिट्ज टेब्लॉयड के बॉम्बे (अब मुंबई) एडिशन में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, जिसमें दावा किया गया था कि बैलेट पेपर पर केमिकल का इस्तेमाल करके चुनाव को प्रभावित किया गया है. इतना ही नहीं अख़बार में इसकी पूरी प्रक्रिया का ब्योरा भी दिया गया था.

इस थ्योरी के हिसाब से 518 में से 200 से 250 सीटों पर चुनाव में जाने वाले कुल लोगों में से कुछ परसेंट बैलेट पेपर को पहले से ही केमिकल का इस्तेमाल किया गया.

एक न दिखाई देने वाली स्याही से उस पर पहले से ही मुहर लगा दी गई थी. जो मुहर लगाए जाने का दावा किया गया था, उसमें गाय और बछड़ा बना हुआ था, ये गाय और बछड़ा उस वक्त की इंदिरा गांधी की इंडियन नेशनल कांग्रेस (आर) का चुनाव चिन्ह थे.

आरोप लगाया गया था कि 72 घंटे बाद ये न दिखने वाली स्याही दिखने लगी और मतदाताओं ने जो असली मुहरें लगाई थीं, वे गायब हो गए.

इसके अलावा आप अगर बिहार में नब्बे के दशक क वोटिंग प्रक्रिया को याद करें तो वहां बूथ कैप्चरिंग और फर्ज़ी वोटिंग के क़िस्से काफी आम थे. कई बार तो बैलेट पेपर से भरा बॉक्स ही नदी में फेंक दिया जाता था. ऐसे में चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने आगे बढ़कर बिना किसी राजनीतिक दबाव की परवाह करते हुए चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.