लखनऊ लोकसभा सीट पर सिलेब्रिटीज़ का नहीं रहा है जादू, क्या राजनाथ सिंह को टक्कर दे पाएंगी पूनम सिन्हा

इतिहास गवाह है कि लखनऊ के लोगों ने कभी भी सिलेब्रिटी (नामचीन) उम्मीदवार पर दांव नहीं लगाया है. इस कतार में फिल्मकार मुजफ्फर अली, मिस इंडिया नफीसा अली, मशहूर वकील राम जेठमलानी, राजनीतिक दिग्गज डॉ. कर्ण सिंह जैसे नाम लिए जा सकते हैं.

नई दिल्ली: लखनऊ लोकसभा सीट वर्तमान समय में बीजेपी के लिए सबसे सुरक्षित सीटों में से एक माना जा रहा है. 1991 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस सीट से पहली बार चुनकर लोकसभा पहुंचे. तब से लेकर अब तक लगातार यह सीट बीजेपी के पास ही रही है. वर्तमान समय में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह इस सीट से लोकसभा सांसद हैं और 2019 में एक बार फिर से चुनाव लड़ रहे हैं.

राजनाथ सिंह के ख़िलाफ़ सपा-बसपा गठबंधन की तरफ से पूनम सिन्हा चुनौती दे रही हैं जबकि कांग्रेस से प्रमोद कृष्णम. आज़ादी के बाद से 16 बार लोकसभा चुनाव हुआ है जिसमें से 7 बार यहां से बीजेपी के सांसद चुने गए हैं, जबकि 6 बार कांग्रेस के सांसद रहे हैं. वहीं जनता दल, भारतीय लोकदल और निर्दलीय ने एक-एक बार यहां पर जीत दर्ज की है.

सपा-बसपा के साथ आने से मुक़ाबला भले ही चुनौतीपूर्ण हो गया है लेकिन सच्चाई यही है कि इन दोनों पार्टियों को अब तक यहां से कोई सफलता नहीं मिली है. ऐसे में बीजेपी प्रत्याशी राजनाथ सिंह के लिए यहां पर जीत लगभग तय मानी जा रही है.

रायबरेली सीट पर कांग्रेस-BJP का इतिहास

1952 में जब पहली बार लोकसभा चुनाव हुआ तो कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार विजयालक्ष्मी पंडित यहां से जीतकर लोकसभा पहुंची, हालांकि इसी साल वो संयुक्त राष्ट्र में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंच गई. जिसके बाद 1953 में उपचुनाव हुआ और एक बार फिर से शिवराजवती नेहरू कांग्रेस सीट से जीते.

इसके बाद 1957 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार पुलिन बिहारी बनर्जी और 1962 में बीके धांव जीते. 1967 में पहली बार यहां से निर्दलीय उम्मीदवार आनंद नारायण मुल्ला जीतकर लोकसभा पहुंचे. इसके बाद एक बार फिर से शीला कौल ने 1971 में कांग्रेस को इस सीट पर जीत दिलाई. हालांकि 1977 लोकसभा चुनाव में भारतीय लोक दल उम्मीदवार हेमती नंदन बहुगुणा ने एक बार फिर से कांग्रेस से लोकसभा सीट छीन ली.
इसके बाद 1980 और 1984 में लगातार दो बार फिर कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार शीला कौल इस सीट पर जीतीं.

इसके बाद 1989 में एक बार फिर से जनता दल उम्मीदवार मनधाता सिंह लोकसभा चुनाव जीते.
1991 लोकसभा चुनाव में पहली बार बीजेपी पार्टी की तरफ से अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ लोकसभा सीट से चुने गए. अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ में गंगा-जमुनी तहजीब का जीता जागता उदाहरण बन गए. सभी समुदाय के लोगों ने उन्हें काफी पसंद किया.

1991 के बाद 1996,1998,1999 और 2004 के लोकसभा चुनावों में भी इस सीट से वाजपेयी विजयी रहे. 2009 में यहां से लाल जी टंडन जीते और 2014 में राजनाथ सिंह इस सीट से भारी मतों से जीते. इस बार एक बार फिर राजनाथ सिंह यहां से बीजेपी के उम्मीदवार हैं.

लखनऊ के लोगों में सिलेब्रिटीज़ का नहीं रहा है जादू

इतिहास गवाह है कि लखनऊ के लोगों ने कभी भी सिलेब्रिटी (नामचीन) उम्मीदवार पर दांव नहीं लगाया है. इस कतार में फिल्मकार मुजफ्फर अली, मिस इंडिया नफीसा अली, मशहूर वकील राम जेठमलानी, राजनीतिक दिग्गज डॉ. कर्ण सिंह जैसे नाम लिए जा सकते हैं.

2014 लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बॉलिवुड अभिनेता जावेद जाफरी (मशहूर कमीडियन जगदीप के बेटे) को मैदान में उतारा था. उनके समर्थन में कई फिल्मी हस्तियों ने प्रचार भी किया, लेकिन लखनऊ ने उन्हें तवज्जो नहीं दी. जावेद की जमानत जब्त हो गई और उन्हें पांचवें स्थान पर संतोष करना पड़ा.

मिस इंडिया रहीं नफीसा अली 2009 में एसपी के टिकट पर चुनाव में उतरीं तो उनकी सभाओं में खूब भीड़ उमड़ी, लेकिन वोट देते समय लोगों ने अटल जी की खड़ाऊ लेकर उतरे बीजेपी के लालजी टंडन पर भरोसा जताया.

साल 2004 के लोकसभा चुनाव में देश के जाने माने वकील राम जेठमलानी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी को चुनौती देने चुनावी मैदान में उतरे लेकिन उन्हें वाजपेयी से तकरीबन पौने तीन लाख वोट कम मिले.

1999 में कश्मीर के राजशाही घराने से ताल्लुक रखने वाले और दिग्गज कांग्रेसी नेता डॉ. कर्ण सिंह ने राजनीतिक जमीन पर अपनी चुनावी फसल उगाने की कोशिश की, लेकिन लखनऊ के वोटरों ने उनके मुकाबले अटल बिहारी वाजपेयी को ही अपनी पहली पसंद बताया.

उमराव जान जैसी मशहूर फिल्म बनाने वाले और कोटवारा स्टेट के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले मुजफ्फर अली 1998 में समाजवादी पार्टी के झंडे तले लखनऊ से चुनाव लड़ने उतरे तो लखनऊ की जनता ने उन्हें दो लाख से ज्यादा वोट तो दिए, लेकिन जीत का सेहरा एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी के सिर बंधा.

1996 के चुनाव में लखनऊ की जनता ने राज बब्बर के चुनावी इरादों पर पानी फेर दिया था. वह समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे तो उनकी एक झलक पाने के लिए भीड़ टूट पड़ती थी, लेकिन परिणाम में फिर कोई बदलाव नहीं आया. राज बब्बर अटल बिहारी वाजपेयी से तकरीबन सवा लाख वोट से हार गए. यहां यह तथ्य भी गौर करने वाला है कि 1957 और 1962 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी लगातार दो बार कांग्रेस के उम्मीदवारों पुलिन बिहारी बनर्जी और बी के धवन से हारे.

जातीय समीकरण

2011 की जनगणना के मुताबिक लखनऊ जिले की आबादी 45.89 लाख है जिनमे पुरुषों की आबादी 23.94 लाख और महिलाओं की आबादी 21.95 लाख है. 2011 की जनगणना के अनुसार लखनऊ की कुल आबादी की 71.1 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की है. इसके बाद 26.36 प्रतिशत मुस्लिम हैं. इसके बाद बाकी अन्य हैं.

अनुसूचित जाति की आबादी 14.3% है, अनुसूचित जनजाति की 0.2%. इसी तरह ब्राह्मण, राजपूत वोटर भी मिलकर करीब 18 प्रतिशत हैं. ओबीसी मतदाता 28 फीसदी और मुस्लिम मतदाता करीब 18 फ़ीसदी हैं.

लखनऊ लोकसभा सीट के तहत 5 विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें लखनऊ पश्चिम, लखनऊ उत्तर, लखनऊ पूर्व, लखनऊ मध्य और लखनऊ कैंट विधानसभा सीट शामिल है. पांचों विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है.