कांग्रेस का गढ़ रहा है रायबरेली, क्या इस बार सोनिया गांधी के लिए बड़ी होगी जीत?

1971 लोकसभा चुनाव में जब राजनारायण को हार का सामना करना पड़ा तो उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा की जीत को चुनौती दी. राजनारायण की दलील थी कि चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया इसलिए चुनाव को निरस्त किया जाए.

नई दिल्ली: रायबरेली लोकसभा सीट पर पिछले 15 सालों से सांसद चुनी जाने वाली यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी इस बार भी जीत को लेकर काफी आश्वस्त दिख रही हैं. ज़ाहिर है इसबार स्वास्थ्य कारणों की वजह से सोनिया प्रचार में भी काफी कम दिखी हैं. उनकी बेटी प्रियंका गांधी इस बार उनके लिए इस संसदीय क्षेत्र में प्रचार का ज़िम्मा संभाल रहीं हैं.

सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ बीजेपी की तरफ से दिनेश प्रताप सिंह चुनावी मैदान में हैं. दिलचस्प यह है कि दिनेश प्रताप सिंह पहले कांग्रेस पार्टी से ही एमएलसी (विधान परिषद के सदस्य) थे. वहीं सपा-बसपा गठबंधन ने इनके ख़िलाफ़ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि दिनेश प्रताप सिंह का राजनीतिक क़द छोटा होने की वजह से ही सोनिया गांधी को फ़ायदा मिलेगा. स्थानीय लोगों का मानना है कि रायबरेली के लोग गांधी परिवार के साथ भावनात्मक रूप से तो जुड़े ही हैं. इसके साथ ही सोनिया गांधी ने इलाक़े के विकास के लिए भी काफी काम किया है. वहीं गठबंधन उम्मीदवार नहीं होने की वजह से भी कांग्रेस को फ़ायदा मिलेगा.

रायबरेली सीट पर कांग्रेस का इतिहास

रायबरेली लोकसभा सीट का अस्तित्व पहली बार 1957 में आया. इससे पहले यह इलाक़ा प्रतापगढ़ उत्तर और रायबरेली पूर्व लोकसभा सीट के अंतर्गत आता था. 1952 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की तरफ से पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पति फिरोज़ गांधी और बैजनाथ कुरील यहां से चुनकर आए.

इसके बाद 1957 में एक बार फिर से दोनों इस सीट से चुनकर आए. हालांकि 8 सितम्बर 1960 को फ़िरोज़ गांधी की हार्ट अटैक से हुई आकस्मिक मौत की वजह से यहां पर उपचुनाव कराया गया जिसमें कांग्रेस उम्मीदवार आरपी सिंह ने विजय दर्ज़ की.

साल 1962 में यह सीट दलित वर्ग के लिए सुरक्षित कर दिया गया. इस वजह से यहां से तीसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तरफ़ से बैजनाथ कुरील बतौर उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे और मात्र 14 हज़ार वोटों के अंतर से जीत दर्ज़ कराने में सफल रहे.

अगले लोकसभा चुनाव यानी कि 1967 में एक बार फिर से यह सीट सामान्य कर दिया गया. जिसके बाद पहली बार इंदिरा गांधी लोकसभा चुनाव में उतरीं. इंदिरा गांधी उस समय देश की प्रधानमंत्री थी और राज्यसभा से सांसद हुआ करती थीं. इंदिरा गांधी पहली बार चुनाव लड़ीं और 92,000 वोटों के विशाल अंतर से जीत दर्ज़ कराने में सफल हुई.

इसके बाद एक बार फिर से 1971 में जब लोकसभा चुनाव संपन्न हुआ तो इंदिरा गांधी ने सोशलिस्ट पार्टी के नेता राजनारायण को 1,11,000 वोटों से हराया.

इमरजेंसी के बाद से रायबरेली में कैसे बदला राजनीतिक समीकरण

हालांकि इस चुनाव के बाद काफी विवाद हुआ और कहा जा सकता है कि इमरजेंसी की बुनियाद यहीं पड़ी थी. दरअसल 1971 के लोकसभा चुनाव में जब राजनारायण को हार का सामना करना पड़ा तो उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इंदिरा की जीत को चुनौती दी.

राजनारायण की दलील थी कि चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किया गया इसलिए चुनाव को निरस्त किया जाए. हाईकोर्ट ने इंदिरा के ख़िलाफ़ फ़ैसला सुनाया लेकिन इंदिरा इसे चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले पर स्थगन के आदेश दे दिए हालांकि यह तय किया गया कि वो लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा तो ले सकती हैं लेकिन वोट करने का आधिकार उनके पास नहीं होगा. फिर क्या था विपक्ष इंदिरा गांधी पर हमलावर हो गई.

जयप्रकाश नारायण ने 25 मई 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में रैली की और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को घेरा. इसके परिणामस्वरूप देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई.

1977 में जब फिर से लोकसभा चुनाव हुआ तो इंदिरा गांधी को रायबरेली सीट पर भारी हार का सामना करना पड़ा और इस सीट से जनता पार्टी के नेता राजनारायण को 55,000 वोटों से जीत मिली.

साल 1980 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो इंदिरा गांधी के हिस्से में कांग्रेस (आई) आई. इंदिरा ने इस सीट पर राजमाता विजयाराजे सिंधिया को हराया जो जनता पार्टी की उम्मीदवार थीं. इस साल इंदिरा गांधी आंध्र प्रदेश के मेडक लोकसभा सीट पर भी चुनाव जीती थी. इंदिरा ने रायबरेली सीट छोड़ दिया. इसके बाद यहां पर हुए उपचुनाव में एक बार फिर से नेहरू परिवार के सदस्य अरूण नेहरू जीतकर दिल्ली पहुंचे.

1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद एक बार फिर से लोकसभा चुनाव हुआ और अरूण नेहरू फिर से लोकसभा सांसद बने. इसके बाद 1989 और 1991 में इंदिरा गांधी की मामी शीला कौल कांग्रेस पार्टी से चुनकर लोकसभा पहुंची.

1996 में पहली बार बीजेपी ने रायबरेली सीट पर खाता खोला और कांग्रेस उम्मीदवार दीपक कौल (शीला कौल के बेटे) को हराया. यहां से अशोक सिंह जीतकर लोकसभा पहुंचे. इतना ही नहीं 1998 में एक बार फिर से अशोक सिंह ने शीला कौल की बेटी दीपा कौल को पटखनी दी.
हालांकि 1999 में कांग्रेस ने एक बार फिर से वापसी की और अमेठी से सांसद कैप्टन सतीश शर्मा यहां से चुनकर आए. उन्होंने अरूण नेहरू को हराया था जो इस बार बीजेपी से चुनाव लड़ रहे थे.

मतदाताओं की संख्या

इसके बाद जब साल 2004 में लोकसभा चुनाव हुआ तो सोनिया गांधी यहां से लोकसभा सांसद चुनी गई. तब से लेकर अब तक वो लगातार वहां से चुनकर आती रही हैं. हालांकि इस बीच 2006 में ‘लाभ पद’ के विवाद को लेकर उन्होंने सांसद पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.

रायबरेली लोकसभा सीट पर कुल 16 लाख 97 हजार 902 वोटर हैं. जिनमें से 08 लाख 91 हजार 978 पुरुष मतदाता हैं जबकि 08 लाख 5 हजार 874 महिला मतदाता हैं. रायारेली संसदीय क्षेत्र में कुल पांच विधानसभा हैं, जिनमें रायबरेली सदर, हरचंदपुर, ऊंचाहार, सरेनी और बछरावां (सुरक्षित) विधानसभा सीटे हैं.