SPECIAL STORY: 2019 लोकसभा चुनाव से पहले मूकदर्शक बन गया मार्गदर्शक मंडल!

भाजपा के मार्गदर्शक मंडल में शामिल नेताओं के बारे में यह दावा किया गया था कि खराब वक्त में ये नेता पार्टी को दिशा दिखाएंगे लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा है.

नई दिल्ली: साल था 2014 और अगस्त का महीना था. भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत से सत्ता में आ चुकी थी. अब बारी थी एक नई टीम की और जिम्मा सौंपा गया अमित शाह को. अमित शाह ने पार्टी की संसदीय बोर्ड की टीम से सबसे पहले जिन तीन सदस्यों के नाम काटे वे नाम थे कभी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी का. हालांकि खराब सेहत की वजह से वाजपेयी जी पहले ही सक्रिय राजनीति से बाहर हो चुके थे. और यहीं से शुरूआत हुई भारतीय जनता पार्टी में एक नए दौर की.

डैमेज कंट्रोल करने के लिए बीजेपी ने इन तीनों नेताओं को महत्वपूर्ण बताते हुए मार्गदर्शक मंडल नाम का झुनझुना पकड़ा दिया. इस झुनझुने का वजन बढ़ाने के लिए पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री राजनाथ सिंह को भी इस मंडल का सदस्य बना दिया गया. बाद में यशवंत सिन्‍हा को भी इसी मार्गदर्शक मंडल में शामिल कर दिया गया.

पार्टी प्रवक्ताओं और नेताओं की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि मार्गदर्शक मंडल मुश्किल वक्त में हमारा मार्गदर्शन करेगा और वो दिन था और आज का दिन है मार्गदर्शक मंडल सिर्फ मूकमंडल बनकर रह गया है. समय की मार ऐसी पड़ी की यशवंत सिन्हा ने खुले तौर पर पार्टी के खिलाफ बगावत कर दी लेकिन अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी आंसू पी गए. कभी रथ यात्रा से देश भर में बीजेपी का परचम लहराने वाले जोशी और अडवाणी बस शो-पीस बनकर रह गए.

शुरू हुआ पतन का दौर
कभी राष्ट्रपति की कुर्सी के प्रबल दावेदार माने जाने वाले अडवाणी को कुर्सी छिनने के बाद लोकसभा चुनावों से ही थोड़ी बहुत उम्मीद थी लेकिन जब भारतीय जनता पार्टी ने 2019 लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की तो गांधीनगर सीट से अडवाणी की जगह अमित शाह को टिकट दिया गया. अडवाणी 1998 से लगातार चुनाव जीतते रहे थे लेकिन पार्टी ने इस बार इस पर विराम लगा दिया. इसे अब अडवाणी युग के अंत की तरह भी देखा जा सकता है.

जोशी को भी दिखा दिया बाहर का रास्ता
बीजेपी ने मंगलवार को लोकसभा चुनाव के लिए 39 उम्मीदवारों की सूची जारी की जिसमें कानपुर से मुरली मनोहर जोशी का टिकट काट दिया गया. 2014 में मुरली मनोहर जोशी ने कानपुर सीट से चुनाव जीता था. 2009 में जोशी ने वाराणसी सीट से जीत हासिल की थी. 1977 से 6 बार लोकसभा सासंद रह चुके जोशी 1996 की NDA की 13 दिन की में गृहमंत्री भी रहे थे. 2014 में उन्होंने वाराणसी सीट नरेन्द्र मोदी के लिए खाली कर दी थी.

सरकार में टिकट कटने के बाद 85 साल के जोशी ने एक पत्र जारी करके कानपुर के मतदाताओं से कहा कि बीजेपी महासचिव (संगठन) राम लाल जोशी ने मुझे कानपुर या किसी अन्य सीट से चुनाव न लड़ने की सलाह दी है. इससे जोशी की खीझ साफ पता चलती है. बीजेपी की स्टार प्रचारकों की लिस्ट में भी मुरली मनोहर जोशी और अडवाणी का नाम शामिल नहीं किया गया था. जोशी

क्यों शुरू हुआ पतन का दौर
2009 के बाद से ऐसे संकेत मिलने लगे थे कि पार्टी के पुराने नामों का अंत समय आ गया है. इसका सबसे प्रमुख कारण इन नेताओं की उम्र थी, अडवाणी 90 की दहलीज पर खड़े थे तो जोशी 85 की उम्र पर पहुंचने वाले थे और इसी का हवाला देते हुए एक-एक करके इन नेताओं को दहलीज पर लाकर खड़ा कर दिया गया और शायद अब ये वही वक्त है जब पार्टी के दरवाजे इनके लिए बंद होने वाले हैं.