लोकसभा चुनाव 2019 हो चुका है राक्षसों के नाम, जानें कैसे?

लोकसभा चुनाव 2019 राक्षसों के नाम हो चुका. हर तरफ राक्षस- राक्षस का शोर है. उत्तर प्रदेश हो या मध्य प्रदेश हर सूबे का नेता राक्षसों को याद कर रहा है, जानिए क्यों.

लोकसभा चुनाव 2019 में ‘राक्षस’ सिर चढ़कर बोल रहा है. कहां तो चर्चा में सड़क, पानी, बिजली होना चाहिए था और कहां नेताओं की ज़ुबान से राक्षस-राक्षस निकल रहा है. यूपी से लेकर मध्यप्रदेश तक के नेताओं के बयान पढ़ें-सुनें तो लग रहा है मानो चुनाव नहीं पौराणिक युद्ध चल रहा है. कुछ उदाहरणों से आप खुद ही समझ लीजिए कि ऐसा लगने की वजह क्या हैं.

रामपुर में बीजेपी प्रत्याशी जयाप्रदा और गठबंधन उम्मीदवार आज़म खान के बीच सीधी टक्कर में अमर सिंह कूदे हैं. सब जानते हैं कि भाषा के मामले में वो ज्ञानी पुरुष हैं. इस ज्ञान का प्रदर्शन वो किसी की तारीफ और किसी की निंदा दोनों में कायदे से करते हैं. उनकी आज़म से अदावत पुरानी है मगर चुनावी आग में ये दुश्मनी और गर्मा गई है. अब अमर सिंह औपचारिक चुनाव प्रचार खत्म होने तक रामपुर में डेरा डालकर बैठ गए हैं. इस बीच उन्होंने अपने शब्दों के तीर तेज़ी से चलाने शुरू कर दिए हैं और आज़म खान को राक्षस कहना शुरू कर दिया है. अमर सिंह ने आज़म खान को दुर्योधन और दुशासन से भी जोड़ दिया. अमर सिंह ने कहा कि –  अगर ये आज़म खान जैसा राक्षस जीतता है तो रावण जीतता है, दुर्योधन और दुशासन जीतता है. हम भारतीय और हमारा शास्त्र कहता है जहां नारी का सम्मान नहीं होता वहां देव का वास नहीं होता. इस सामान्य सी बात को ना जाननेवाला इस राक्षस का चुनावी मुद्दा विकास नहीं सिर्फ जाति-पाति, कुत्सित विचार और नारी के अंत: वस्त्र हैं.

चुनाव के दिनों में राक्षसों को याद करनेवाले नेताओं में अमर सिंह अकेले नहीं, बल्कि भोपाल से बीजेपी उम्मीदवार प्रज्ञा ठाकुर ने भी दिग्विजय सिंह को इसी श्रेणी में खड़ा कर दिया है. उन्होंने दिग्विजय को कालनेमि करार दिया. कालनेमि रामायणकालीन राक्षस था जो रावण का मामा था और रूप बदलने में माहिर था. प्रज्ञा ने दिग्गी राजा के मंदिर-मंदिर डोलने पर ये तंज कसा. उन्होंने कहा कि दिग्विजय निश्चित रूप से कालनेमि हैं जो समय-समय पर कई रूप धारण करते हैं.

वैसे इससे पहले भी प्रज्ञा ने मुंबई हमले में शहीद हुए हेमंत करकरे को लेकर भी विवादित बात कही थी. उन्होंने एक चुनावी सभा में दावा ठोक दिया था कि ये उनका ही शाप था जिसकी वजह से हेमंत करकरे की मौत हुई. ज़ाहिर है बाद में प्रज्ञा की काफी फज़ीहत हुई और उन्होंने बयान से होनेवाले अनुमानित नुकसान को देखते हुए अपने शब्द वापस ले लिए.

लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकनेवाली थी. एक और मिलता जुलता बयान आया. बयानवीर थे बीजेपी के ही उन्नाव प्रत्याशी डॉ सच्चिदानंद हरि उर्फ साक्षी महाराज. उल्टे-सीधे बयान देने में महारत रखनेवाले साक्षी महाराज ने अपने भगवा चोले को ही वोट मांगने का हथियार बना लिया. साक्षी महाराज ने अपने चोले और हिंदू शास्त्रों का जैसा सहारा लिया उसने सबको चौंका दिया. वो बोले – मैं संन्यासी हूं, आपके दरवाज़े पर भीख मांगने आया हूं. अगर एक संन्यासी को मना किया तो आपकी गृहस्थी के पुण्य ले जाऊंगा. अपने पाप दे जाऊंगा.

इसके बाद साक्षी महाराज पर शास्त्रों के नाम पर कथित तौर पर लोगों को धमका कर वोट मांगने का मामला सोहरामऊ पुलिस थाने में दर्ज हुआ. कोई नहीं जानता कि साक्षी महाराज का चुनाव जीतने पर आशीर्वाद और हारने पर शाप फलीभूत होता है या नहीं मगर उन्होंने बयान देकर साबित कर दिया कि ये चुनाव सिर्फ मुद्दों के बूते कम लड़ा जा रहा है. नेताओं की भाषा सेे प्रतीत हो रहा है कि चुनाव कम बल्कि पौराणिक युद्ध ज्यादा चल रहा है. उनके शब्द तो ऐसा ही आभास दे रहे हैं.