‘गरीबी से ज्यादा लोकतंत्र पर गुमान’, असम की 104 वर्षीय बुजुर्ग लोगों से कह रही हैं करो मतदान

104 साल की उम्र ने लखी पाल को चलने-फिरने से विवश कर रखा है, लेकिन इस विवशता के कारण उन्होंने हार कभी नहीं मानी.

दिसपुर: आजकल देखने को मिलता है कि कुछ युवा मतदान के अधिकार का उपयोग नहीं करते और इस प्रक्रिया को वे समय की बर्बादी भी समझते हैं. वहीं असम की एक बूढ़ी महिला हैं, जो कि न केवल हर चुनाव में मतदान करती है, बल्कि वोट देने के लिए लोगों के पास जा-जाकर उनसे अपील भी करती हैं. मोरानहाट रेलवे स्टेशन से चंद मीटर की दूरी पर शांतिपुर में रहने वाली 104 वर्षीय लखी पाल में वोट डालने को लेकर गजब का उत्साह है.

लखी पाल वोट डालना कभी नहीं भूलती और अपने बच्चों को भी यही सिखाती रही है कि मतदान करना राष्ट्र गौरव है और वोट डालना राष्ट्र की सेवा है. इस बार लोकसभा चुनाव में लखी पाल को मतदान केंद्र तक ले जाने का जिम्मा जिला प्रशासन ने उठाया है. 104 साल की उम्र ने लखी पाल को चलने-फिरने से विवश कर रखा है, लेकिन इस विवशता के कारण उन्होंने हार कभी नहीं मानी.

लखी पाल कहती हैं कि कुछ भी हो जाए लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में वे वोट डालने जरूर जाएंगी. कुछ दिन पहले ही चराईदेव जिले के डीसी, डी. के. संदिके ने लखी पाल के घर जाकर उनसे मुलाकात की और पोलिंग बूथ तक उन्हें ले जाने की व्यवस्था के बारे में बातचीत की. मोरानहाट नगर पालिका क्षेत्र के वार्ड नंबर 4 में दो कमरों की झोपड़ी में रहने वाली लखी पाल ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश हुकूमत तक से लोहा लिया है. इस साधारण से घर में लखी पाल समेत कुल 3 लोग रहते हैं.

लखी पाल का बेटा मजदूरी करता है और बेटी बूढ़ी मां की देखभाल करती है. शहर में रहने के बावजूद लखी पाल के घर अब तक ना तो बिजली पहुंची, ना घर मिल पाया और ना ही उज्जवला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिल पाया. लखी पाल लोकतंत्र में इन मौलिक सुविधाओं का हक तो रखती हैं. डीसी साहब को लखी पाल के घर का पता तो मालूम है लेकिन सुविधाएं इस बूढी महिला के घर से कोसों दूर हैं.

लखी पाल ने अपनी बेटी को गरीबी से ज्यादा लोकतंत्र पर गुमान करना सिखाया है. हम युवा वोटरों को लखी पाल जैसे जागरूक वोटरों से सीखने की जरूरत है और लोकतंत्र मे बढ़-चढ़कर मतदान करना जरूरी है.