Exclusive: ढांचे पर चढ़कर उसे तोड़ा था, अयोध्या विवाद पर TV9 भारतवर्ष से प्रज्ञा ठाकुर ने कही यह बात

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को साम्प्रदायिक सद्भाव और गंगा-जमुनी तहजीब के लिए पहचाना जाता है, मगर बीजेपी द्वारा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद 'हिंदुत्व' चुनावी मुद्दा बनने लगा है.

प्रज्ञा ठाकुर को बीजेपी ने जब से लोकसभा चुनाव के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया है तब से वो अपने बयानों को लेकर विवादों में हैं. शनिवार को TV9 भारतवर्ष से बातचीत के दौरान ठाकुर ने कहा कि उन्होंने बाबरी ढांचे पे चढ़कर उसे तोड़ा था. उन्होंने बातचीत में कहा, ‘हमने देश का कलंक मिटाया था हम ढांचा तोड़ने गए थे. मुझे भयंकर गर्व है ईश्वर ने मुझे अवसर दिया था, शक्ति दी थी और मैंने ये काम कर दिया. अब वहीं राम मंदिर बनाएंगे.’

प्रज्ञा ठाकुर ने इससे पहले मुंबई एटीएस के प्रमुख रहे 26/11 के शहीद हेमंत करकरे पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए कहा था कि उन्होंने करकरे को ‘श्राप दिया था, इसलिए वह आतंकवादियों का शिकार बने.

प्रज्ञा के इस बयान की चौतरफा निंदा हो रही है, हालांकि बीजेपी इसे भावनात्मक बयान बताकर मामला निपटाने की कोशिश में है.

मालेगांव बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तारी और उन पर हुई कार्रवाई के बारे में प्रज्ञा ने कोलार क्षेत्र के कार्यकर्ताओं से बात करते हुए कहा कि उन दिनों वह मुंबई जेल में थीं. जांच आयोग ने सुनवाई के दौरान एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे को बुलाया और कहा कि जब प्रज्ञा के खिलाफ कोई सबूत नहीं है तो उन्हें छोड़ क्यों नहीं देते. तब हेमंत ने उनसे कई तरह के सवाल पूछे, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि “यह भगवान जाने.” इस पर करकरे ने कहा था कि “तो, क्या मुझे भगवान के पास जाना होगा?”

प्रज्ञा ने कहा, “उस समय मैंने करकरे से कहा था कि तेरा सर्वनाश होगा, उसी दिन से उस पर सूतक लग गया था और सवा माह के भीतर ही आतंकवादियों ने उसे मार दिया था. हिदू मान्यता है कि परिवार में किसी का जन्म या मृत्यु होने पर सवा माह का सूतक लगता है. जिस दिन करकरे ने सवाल किए, उसी दिन से उस पर सूतक लग गया था, जिसका अंत आतंकवादियों द्वारा मारे जाने से हुआ.”

26 नवंबर, 2008 को मुंबई में आतंकवादियों ने हमला किया था. इन आतंकवादियों का मुकाबला करते हुए हेमंत करकरे शहीद हुए थे.

प्रज्ञा के बयान पर राज्य के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने शुक्रवार को ट्वीट कर बगैर किसी का नाम लिए कहा, “जिन लोगों ने आतंकवाद से लड़ते हुए अपने देश की रक्षा के लिए शहादत दी है, सीने पर गोलियां खाई हैं, उनकी शहादत का अपमान करने का हक देश में किसी को नहीं है. एक तरफ आतंकवाद व शहीदों के नाम का अपने राजनैतिक फायदे के लिए उपयोग और दूसरी ओर ऐसे बयान? यह दोहरा चरित्र नहीं चलेगा.”

भोपाल में ‘हिंदुत्व’ बनने लगा है चुनावी मुद्दा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को साम्प्रदायिक सद्भाव और गंगा-जमुनी तहजीब के लिए पहचाना जाता है, मगर बीजेपी द्वारा प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद ‘हिंदुत्व’ चुनावी मुद्दा बनने लगा है. भोपाल संसदीय क्षेत्र से लगभग एक माह पहले कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को उम्मीदवार घोषित कर दिया था. सिंह बीते 25 दिनों से राजधानी के विभिन्न हिस्सों और वर्गो से संवाद कर रहे हैं, अपनी आगामी योजनाओं का भी ब्योरा दे रहे हैं.

सिंह लगातार संभलकर और सधे हुए कदम बढ़ाए जा रहे हैं, यही कारण है कि उनकी ओर से एक भी विवादित बयान नहीं आया है. बीजेपीने बुधवार को मालेगांव विस्फोट की आरोपी प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर सियासी फिजा में बड़ा बदलाव लाने का संकेत दे दिया है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शिव अनुराग पटेरिया ने कहा, “बीजेपीध्रुवीकरण चाहती है, इसी के चलते उसने भगवा वस्त्रधारी प्रज्ञा ठाकुर को मैदान में उतारा है. बीजेपीवास्तव में प्रज्ञा ठाकुर के जरिए पूरे देश में यह संदेश देना चाहती है कि दिग्विजय सिंह अल्पसंख्यक समर्थक हैं, कांग्रेस हिंदू विरोधी है. प्रज्ञा को हिंदुत्व पीड़ित बताने की भी कोशिश होगी और बीजेपी भोपाल में इस चुनाव को अन्य मुद्दों की बजाय ध्रुवीकरण करके लड़ना चाहती है. प्रज्ञा के उम्मीदवार बनते ही बीजेपी की रणनीति के संकेत मिलने लगे हैं.”

भोपाल संसदीय क्षेत्र के इतिहास पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि वर्ष 1984 के बाद से यहां बीजेपी का कब्जा है. भोपाल संसदीय क्षेत्र में अब तक हुए 16 चुनाव में कांग्रेस को छह बार जीत हासिल हुई है. भोपाल में 12 मई को मतदान होने वाला है.

भोपाल संसदीय क्षेत्र में साढ़े 19 लाख मतदाता है, जिसमें चार लाख मुस्लिम, साढ़े तीन लाख ब्राह्मण, साढ़े चार लाख पिछड़ा वर्ग, दो लाख कायस्थ, सवा लाख क्षत्रिय वर्ग से हैं. मतदाताओं के इसी गणित को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को मैदान में उतारा था, मगर बीजेपीने प्रज्ञा ठाकुर को उम्मीदवार बनाकर ध्रुवीकरण का दांव खेला है.

भोपाल संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की आठ सीटें आती हैं. लगभग चार माह पहले हुए विधानसभा के चुनाव में बीजेपीने आठ में से पांच और कांग्रेस ने तीन सीटें जीती. लिहाजा सरकार में बदलाव के बाद भी भोपाल संसदीय क्षेत्र के विधानसभा क्षेत्रों में बीजेपीको कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा सफलता मिली थी.

दिग्विजय सिंह भी प्रज्ञा की उपस्थिति से सियासी माहौल में आने वाले बदलाव को पहले ही भांप गए थे, यही कारण है कि उन्होंने प्रज्ञा का स्वागत करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया था. सिंह स्वयं जहां खुलकर प्रज्ञा पर हमला करने से बच रहे हैं, वहीं कार्यकर्ताओं को भी इसी तरह की हिदायतें दे रहे हैं.

सिंह को यह अहसास है कि मालेगांव बम धमाके और प्रज्ञा पर सीधे तौर पर कोई हमला होता है तो चुनावी दिशा बदल सकती है. सिंह भोपाल के विकास का रोड मैप और अपने कार्यकाल में किए गए कामों का ब्योरा दे रहे हैं.

उम्मीदवारी घोषित होने के बाद प्रज्ञा के मिजाज तल्ख होने लगे हैं और मतदाताओं को भावनात्मक तौर पर लुभाने में जुट गई है. उन्होंने कांग्रेस पर हिंदू विरोधी होने का आरोप तो लगाया ही साथ में हिंदुत्व आतंकवाद और भगवा आतंकवाद का जिक्र छेड़ा और मालेगांव बम विस्फोट का आरोपी बनाए जाने के बाद पुलिस की प्रताड़ना का ब्योरा देना शुरू कर दिया. वे लोगों के बीच भावुक भी हो रही हैं.

एक तरफ प्रज्ञा ने अपने अभियान को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया है तो दूसरी ओर कांग्रेस नेता भी अपने तरह से जवाब देने लगे हैं.

राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी ने दिग्विजय सिंह को राजनीतिक संत बताते हुए कहा, “दिग्विजय सिंह ने हिदुत्व को जीया है, मानवता की सेवा की है, नर्मदा नदी की परिक्रमा की है. वे वास्तव में राजनीति के संत हैं.”

जानकारों की मानें तो भोपाल के चुनाव में ध्रुवीकरण की संभावना को नकारा नहीं जा सकता. कांग्रेस की हर संभव कोशिश होगी कि ध्रुवीकरण को किसी तरह रोका जाए, दिग्विजय सिंह स्वयं धार्मिक स्थलों पर जाकर अपनी छवि बनाने में लगे हैं तो दूसरी तरफ बीजेपी दिग्विजय सिंह को मुस्लिम परस्त और हिंदू विरोधी बताने में लग गई है. वहीं प्रज्ञा को कांग्रेस द्वारा सताई गई हिंदू महिला के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है.