शत्रुघ्न सिन्हा जिन्ना और कांग्रेस कनेक्शन पर सही तो थे, लेकिन किस खास तथ्य से चूक गए सभी लोग?

शत्रुघ्न सिन्हा ने जिन्ना को कांग्रेस का नेता बताया तो सियासी कोहराम मच गया लेकिन एक तरह शत्रुघ्न सही बात ही कह रहे थे. वहीं इस पूरे हो-हल्ले में एक अहम तथ्य छिपा रह गया जिसे आपको जानना भी ज़रूरी है और कांग्रेसियों को भी.

बीजेपी से बगावत करके कांग्रेस खेमे में शामिल हुए शत्रुघ्न सिन्हा के मुंह से जिन्ना का नाम क्या निकला, एक बार फिर आडवाणी से लेकर जसवंत प्रकरण याद आने लगा. मोहम्मद अली जिन्ना का नाम ही कुछ ऐसा है जो भारतीय नेताओं के लिए ग्रहण साबित होता है. आडवाणी उनकी मज़ार पर गए तो अपनी पार्टी की अध्यक्षी खो बैठे, जसवंत ने किताब लिखी तो पार्टी से ही निकाल दिए गए.

अब शत्रुघ्न सिन्हा तीसरे ऐसे नेता हैं जिसने अपने बयान में जिन्ना का ज़िक्र किया तो अचानक राडार पर आ गए. वैसे शत्रुघ्न का कहना है कि उनके मुंह से जिन्ना का नाम गलती से निकला क्योंकि वो नाम तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का लेना चाहता थे, फिर भी अब विरोधी जिन्ना नाम का पीछा छोड़ ही नहीं रहे.

आइए तो जिन्ना के बहाने ही सही लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा के बयान की जल्द पड़ताल कर डालते हैं.

अनजाने में ही सही मगर सही थे शत्रुघ्न सिन्हा
शत्रुघ्न सिन्हा ने अपने बयान में कांग्रेस पार्टी के तमाम नेताओं का नाम लिया. बताना वो ये चाहते थे कि वो जिस कांग्रेस में चले आए उसे बनाने में भारत का संघर्षशील नेतृत्व लगा था. भाषण के वेग में उन्होंने गांधी, नेहरू और सुभाष के साथ जिन्ना को भी तौल दिया. दरअसल अनजाने में ही सही लेकिन शत्रुघ्न गलत नहीं थे. जिन्ना एक वक्त कांग्रेस में ही थे. ना सिर्फ थे बल्कि काफी ऊंची हैसियत के नेता थे. इतिहास इसकी पुष्टि करता है, मगर जिन्ना के राजनीतिक इतिहास का उत्तरार्ध किसी भी कांग्रेसी को इस तथ्य से असहज ज़रूर करेगा.

जिन्ना बॉम्बे के सफल वकील थे लेकिन अपने शहर में आयोजित कांग्रेस के बीसवें अधिवेशन (1904) से उन्होंने सक्रियता के साथ राजनीति करनी शुरू की. वो हिंदू-मुस्लिम एकता के हामी नेता के तौर पर पहचाने जाते थे जिसे सियासत में मज़हबी दखल कतई पसंद नहीं था. एक मुस्लिम के तौर पर भी उनकी जीवनशैली बेहद प्रगतिशील थी. हिंदू-मुस्लिम एकता को लेकर उनका आग्रह इतना तीव्र था कि सरोजिनी नायडू से लेकर गांधी के राजनीतिक गुरू गोखले तक उनके प्रशंसक थे. ये साल 1913 था जब जिन्ना ने सैयद वज़ीर हसन और मोहम्मद अली के इसरार पर मुस्लिम लीग से जुड़ना मंज़ूर कर लिया, हालांकि लीग की स्थापना तो 1906 में ही हो चुकी थी. ये भी याद रहे कि उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता से त्यागपत्र नहीं दिया था. आगे चलकर साल 1917 में उन्होंने एनी बेसेंट की होमरूल लीग भी ज्वाइन की और 1918 में इसके अध्यक्ष बने.

धीमे-धीमे कांग्रेस से दूर, लीग के पास
इस बीच साल 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट आए और कांग्रेस पर उनका प्रभाव छाने लगा. खिलाफत आंदोलन का समर्थन करके गांधी ने हिंदुस्तानी मुसलमानों में अपनी छवि स्थापित कर ली. इसका लाभ उन्हें भविष्य के राष्ट्रीय आंदोलनों में भी मिला लेकिन जिन्ना कभी भी धर्म और राजनीति के घालमेल के समर्थन में नहीं थे, दूसरी तरफ गांधी जी के लिए बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए हर किसी का साथ ज़रूरी था. जिन्ना ने ना सिर्फ खिलाफत के समर्थन पर विरोधी विचार ज़ाहिर किए बल्कि वो गांधी के सत्याग्रह को भी ठीक नहीं समझते थे. उनके लिए स्वराज की स्थापना करने का एकमात्र रास्ता कानूनी था, ना कि आंदोलन. दूसरी तरफ अधिकांश कांग्रेस गांधी के जादू में बंधकर उनका अनुसरण कर रही थी.

साल 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में जब जिन्ना गांधी के असहयोग आंदोलन प्रस्ताव के विरोध में बोल रहे थे, तो उन्हें उपस्थित प्रतिनिधियों का ज़ोरदार विरोध झेलना पड़ा. उसी दिन शहर के दूसरे कोने में मुस्लिम लीग भी देश की आज़ादी तक आंदोलन करने का एक प्रस्ताव पास कर रही थी. वो वहां नहीं गए. हताशा में उन्होंने दोनों ही पार्टियों के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया. गांधी एक साल के भीतर स्वराज का वादा कर रहे थे लेकिन असफल रहे, वहीं जिन्ना अहिंसा के सिद्धांत की सफलता पर संदेह कर रहे थे लेकिन गलत साबित हुए. इस मोड़ से दोनों की राहें साफ-साफ अलग हो गईं. नागपुर अधिवेशन में एक दिलचस्प वाकया और हुआ था. जिन्ना ने अपने भाषण में गांधी जी को महात्मा ना कह कर गांधी कहा जिस पर हंगामा खड़ा हो गया. ये सब जिन्ना को अपने घटते प्रभाव और गांधी नाम के चमत्कार के दर्शन करा रहा था.

बाद के दिनों में जिन्ना के अधिकतर राजनीतिक फैसले कांग्रेस के उलट ही रहे. 1930 से 1934 के बीच का अधिकांश समय उन्होंने लंदन में बिताया. तीन गोलमेज कॉन्फ्रेंस में से दो में उन्होंने भी हिस्सा लिया था.

हिंदू-मुस्लिम एकता के अग्रदूत से पाकिस्तान के निर्माता
1933 के तीसरे गोलमेज सम्मेलन में चौधरी रहमत अली का लिखा और प्रकाशित कराया गया एक पैम्फलेट ‘पाकिस्तान डिक्लेरेशन’ बांटा गया. ये पहली बार था जब पाकिस्तान नाम का शब्द सामने आया. कहा जाता है कि आगे चलकर रहमत अली ने भारतीय उपमहाद्वीप में बंगिस्तान और उस्मानिस्तान नाम के दूसरे मुस्लिम राज्यों की धारणा भी आगे बढ़ाई. कमाल की बात है कि जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ तो रहमत अली ने जिन्ना की खूब आलोचना की. रहमत अली उम्मीद से छोटे पाकिस्तान को देखकर नाखुश थे. उन्होंने अपने प्रस्तावित पाकिस्तान के सामने ब्रिटिश प्लान वाले पाकिस्तान को कभी नहीं स्वीकारा लेकिन फिर भी जब वो वहां बसने के लिए लाहौर पहुंचे तो प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने उनकी संपत्ति जब्त करा के देश निकाला दे दिया. खाली हाथ रहमत अली इंग्लैंड लौट आए. 1948 से लेकर 1951 में अपनी मौत तक रहमत अली अकेले रहे. कुछ जानकार बताते हैं कि बाद में उनके अंतिम संस्कार का खर्च लंदन स्थित पाकिस्तानी हाई कमिशन ने उठाया क्योंकि वो दिवालिया हो चुके थे.

पाकिस्तान की अवधारणा जिसने सबसे पहले दी वो दिवालिया होकर गुज़रा

उधर लंदन में रह रहे जिन्ना को मुस्लिम लीग के नेता वापस लौटने के लिए मनाने लगे. 1934 में जिन्ना के बॉम्बे में ना होने के बावजूद उन्हें केंद्रीय एसेंबली के लिए चुना गया. साल 1937 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस के सामने मुस्लिम लीग को करारी हार का सामना करना पड़ा. जिन्ना को तो इस हार ने झटका दिया ही लेकिन उनकी राजनीतिक शैली भी बदल गई. पूरी ताकत बटोरकर जिन्ना अब मुस्लिम लीग के विस्तार में जुट गए और दो साल तक ये चलता रहा. रहमत अली के पाकिस्तान की अवधारणा वाले परचे के आने से पहले 1930 में ही शायर इकबाल ब्रिटिश भारत में मुस्लिमों के अलग प्रदेश पर बोल चुके थे. 1936 से 1937 के बीच पाकिस्तान के मुद्दे पर जिन्ना के साथ उनका खासा पत्राचार हुआ. जिन्ना पहले से इकबाल की दृष्टि के कायल रहे थे. 1937 में यूनाइटेड प्रोविंस (वर्तमान यूपी) के चुनाव के बाद मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को मिलजुलकर सरकार बनाने का प्रस्ताव दिया लेकिन कांग्रेस ने उल्टा मुस्लिम लीग को विलय करने का प्रस्ताव दे दिया. कांग्रेस भूल रही थी कि सामान्य सीटों पर भले ही उसने जीत हासिल की थी लेकिन मुस्लिमों के लिए आरक्षित सीटों पर वो कहीं नहीं जीती थी. उसने मुस्लिम लीग की जीत का सम्मान नहीं किया और यहीं से जिन्ना का भरोसा कांग्रस का सहयोग करने की किसी भी नीति से उठ गया. आगे चलकर जिन्ना ने अपना हठ कायम रखा और तमाम प्रस्तावों को खारिज कर पाकिस्तान के निर्माण तक अड़े रहे.

.. लेकिन क्या ये वो कांग्रेस है जिसमें जिन्ना थे?
अब तक आपने पढ़ा कि कैसे शत्रुघ्न सिन्हा की बात अनजाने में सही थी लेकिन यहां एक अहम तथ्य सामने लाना और ज़रूरी है. जिस कांग्रेस की बात शत्रुघ्न कर रहे थे उसका नाम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस था. भारत की आज़ादी के समय सारे बड़े नेता उसी पार्टी में थे. स्वतंत्रता के बाद 1969 में  पार्टी के भीतर दो गुट बन गए और बुजुर्गों से भरे सिंडिकेट ने इंदिरा गांधी को बेदखल कर दिया. इंदिरा ने अपनी अलग पार्टी बनाई जिसे लोगों ने कांग्रेस (R) के नाम से जाना, इंदिरा के नाम से इसे कांग्रेस (I) भी कहा गया. पुरानी कांग्रेस का नाम कांग्रेस (O) पड़ा. साल 1971 में हुए चुनाव में पुरानी कांग्रेस ने महज़ 16 सीटें हासिल कीं जबकि इंदिरा की कांग्रेस ने 352 सीटें जीत लीं.

साफ हो गया कि लोग किसे असली कांग्रेस मान रहे हैं. आनेवाले दिनों में इंदिरा के कई विरोधियों ने भी नई कांग्रेस ज्वाइन कर ली और लोग भूलते चले गए कि देश की आज़ादी जिस कांग्रेस के नेतृत्व में मिली वो नेपथ्य में जा चुकी है. दरअसल मोहम्मद अली जिन्ना तो काल के गाल में समा गई उस कांग्रेस का हिस्सा थे, ना कि इंदिरा की कांग्रेस के जिसके उत्तराधिकारी आज राहुल गांधी हैं. 

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