यूपी की एक-एक सीट बेहद अहम, वोट ट्रांसफर का गणित क्‍यों दे रहा है मायावती को सिरदर्द

2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने यूपी में 73 सीटें जीती थीं. सपा को पांच सीटें मिली थीं, बसपा को एक भी नहीं.

उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी साथ आए हैं. नरेंद्र मोदी से चुनौती लेने को मायावती और अखिलेश यादव ने हाथ मिला लिया. दोनों ने कांग्रेस से दूरी ही बनाए रखी. गठबंधन के विचार को तब और बल मिला जब अजीत सिंह की पार्टी राष्‍ट्रीय लोक दल भी पाले में आ गई. कभी एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे दो दल आज चुनाव में साथ ताल ठोंक रहे हैं तो अंदरखाने चिंता जमीन पर पर्याप्‍त समर्थन न मिलने की भी है.

गठबंधन के सामने जो चुनौती मुंह बाए खड़ी है, वो है सपा-बसपा के कोर वोटर्स का एक-दूसरे को समर्थन सुनिश्चित करना. मायावती शायद इस बात को भांप रही हैं. तभी 1 मई को बाराबंकी की एक रैली में उन्‍होंने दोनों पार्टियों के कैडर को वोट ट्रांसफर का तरीका समझाया. उन्‍होंने साफ कहा कि अगर वोट ट्रांसफर हुए तो यूपी की अधिकांश सीटें हम ही जीतेंगे. मायावती ने जब यह बात कही तो मंच पर अखिलेश मौजूद थे.

मायावती ने सपा-बसपा समर्थकों से कहा कि जहां-जहां बसपा चुनाव लड़ रही है, वहां हाथी के सामने वाला बटन दबाकर उनको जिताएंगे. जहां-जहां सपा लड़ रही है, वहां साइकिल का बटन दबा कर गठबंधन को जिताइए. उन्‍होंने कहा, “एक-एक सीट को जीतना बहुत जरूरी है. यह तभी संभव हो सकता है जब सपा-बसपा के लोग दोनों पार्टियों के उम्‍मीदवारों को ट्रांसफर करवा दें. ऐसा होता है तो हमारा गठबंधन अधिकांश सीटें जीत जाएगा.

कहीं बिगड़ न जाए यादव-दलित-मुस्लिम वोट का गणित

2014 में बीजेपी का वोट शेयर 42.63 फीसदी था. सपा और बसपा को मिले वोट जोड़ थे तो उन्‍हें कुल 42.12 प्रतिशत वोट मिले थे. यानी मोदी लहर के बावजूद सपा-बसपा के कोर वोटर साथ बने रहे. जब मायावती और अखिलेश ने हाथ मिलाए तब यही सोचा गया था कि अगर दोनों के पक्‍के वोटर्स समर्थन करते हैं तो 2019 में बीजेपी को आसानी से हराया जा सकता है.

2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने यूपी में 73 सीटें जीती थीं. सपा को पांच सीटें मिली थीं, कांग्रेस दो पर सिमटी रही जबकि बसपा को एक भी सीट हासिल न हो सकी.

उत्‍तर प्रदेश की लगभग 80 आबादी हिंदू है. इनमें से 9% यादव सपा के कोर वोटर, जाटव और चमार बसपा के कोर वोटर (12 फीसदी) हैं. 21 फीसदी आबादी पर सपा-बसपा की पकड़ मजबूत है. बीजेपी को हाल ही में गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव अनुसूचित जातियों का समर्थन मिला है. अगड़ी जातियां भाजपा का कोर वोटबैंक रही हैं. 2014 में सपा-बसपा ने जो उम्‍मीदवार उतारे, उनमें से अधिकतर गैर-यादव और गैर-जाटव थे. इस बार भी यही दांव खेला गया है.

2014 के चुनावी आंकड़े दिखाते हैं यूपी की 80 में से करीब 30 सीटों पर सपा और बसपा का वोट शेयर लगभग बराबर था. जमीनी स्‍तर पर कितना वोट ट्रांसफर होगा, यही चिंता की बात बनी हुई है. यूपी की राजनीति ऐसी उथल-पुथल वाली है कि यह भी हो सकता है कि गैर-यादव और गैर-दलित हिंदू वोटर साथ आकर यादव-दलित-मुस्लिम वोट का मुकाबला करें.

अगर 2014 जैसा ही रहा वोटिंग पैटर्न तो…

2014 लोकसभा चुनाव को आधार मानें तो सपा-बसपा गठबंधन को यूपी में 41 सीटें मिल सकती हैं, जबकि उतने ही वोटों के साथ एनडीए 37 सीटें जीत पाएगा. अगर सपा और बसपा गठबंधन के बाद अपने वोट शेयर का 20 फीसदी हिस्‍सा भी गंवा देते हैं तो उन्‍हें तगड़ा नुकसान होगा. ऐसी सूरत में गठबंधन को सिर्फ 19 सीटें मिलेंगी और एनडीए 60 सीटों के साथ यूपी में पहले नंबर पर पहुंच जाएगा.

सपा-बसपा गठबंधन का ऐलान करते हुए मायावती ने कांग्रेस को शामिल न करने की जो वजह बताई थी, वह भी वोट ट्रांसफर ही थी. हालांकि तब मायावती को लग रहा था कि सपा-बसपा का वोट ट्रांसफर ‘परफेक्‍ट’ रहेगा. तब मायावती ने कहा था, ‘पिछले चुनाव दिखाते हैं कि सपा और बसपा ने तो कांग्रेस के पक्ष में वोट ट्रांसफर किए, पर इसका उल्‍टा नहीं हुआ. हमें कांग्रेस के साथ गठबंधन से कोई फायदा नहीं हुआ, जबकि सपा-बसपा गठबंधन में वोट ट्रासफर परफेक्‍ट है.

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