चार फेज के चुनाव बाद मायावती के लिए आखिर क्यों नरम हुए पीएम नरेंद्र मोदी?

पीएम मोदी ने मायावती को लेकर जैसा नर्म रुख दिखाना शुरू किया है उसने सियासी पंडितों को सोचने पर मजबूर कर दिया है. चुनावी नतीजे अभी आए नहीं और इतनी जल्दी गठजोड़ों के बनने-बिगड़ने के लक्षण दिख रहे हैं.

लोकसभा चुनाव बीच में ही है लेकिन नतीजा आने से भी पहले एक नया समीकरण उभरता दिखने लगा है. यूपी में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की ताल बिगड़ती देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राग दोस्ती छेड़ा है.

अचानक ही मोदी मायावती पर नर्म दिखने लगे हैं. उन्होंने प्रतापगढ़ की चुनावी जनसभा में कहा कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी मिलकर बहनजी (मायावती) का फायदा उठा रहे हैं. ज़ाहिर है मोदी अपने बयानों के ज़रिए संदेश दे रहे हैं कि वो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की तुलना में बसपा के प्रति नर्म हैं.

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इसके अलावा मोदी ने ये भी कहा कि मायावती खुलेआम कांग्रेस की आलोचना करती हैं, कांग्रेस को कोसती हैं लेकिन सपा खुद कांग्रेस पर नर्मी दिखाती है. अब ये साफ हो चुका है कि समाजवादी पार्टी ने गठबंधन के बहाने बहन मायावती की पीठ में छुरा भोंका है. पिछले दरवाजे से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक हो गए हैं.

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सपा-बसपा उत्तर प्रदेश की 38-38 सीटों पर मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ रही हैं.

दरअसल इससे पहले मायावती ने कुछ ऐसा कहा था जिसने गठबंधन की दरार नुमायां कर दी थी. आशंका पहले ही थी कि जो सपा और बसपा एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे उनके वोटर्स आखिर कैसे एक-दूसरे के प्रत्याशी को समर्थन देंगे. अब ये बात खुद मायावती ना सिर्फ भांप रही हैं बल्कि ज़ाहिर भी कर रही हैं.

1 मई को बाराबंकी की एक रैली में उन्‍होंने दोनों पार्टियों के कैडर को वोट ट्रांसफर का तरीका समझाया भी था. उन्‍होंने साफ कहा कि अगर वोट ट्रांसफर हुए तो यूपी की अधिकांश सीटें हम ही जीतेंगे. मायावती ने जब यह बात कही तो मंच पर अखिलेश भी मौजूद थे.

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एक बात ये भी अहम है कि सपा-बसपा गठबंधन का एलान करते हुए मायावती ने कांग्रेस को शामिल न करने की वजह वोट ट्रांसफर ही बताई थी. तब मायावती ने कहा था- पिछले चुनाव दिखाते हैं कि सपा और बसपा ने तो कांग्रेस के पक्ष में वोट ट्रांसफर किए, पर इसका उल्‍टा नहीं हुआ. हमें कांग्रेस के साथ गठबंधन से कोई फायदा नहीं हुआ, जबकि सपा-बसपा गठबंधन में वोट ट्रांसफर परफेक्‍ट है.

लगता है प्रधानमंत्री ने मायावती की असुरक्षा को भांप लिया है. इसी असुरक्षा को वो चुनाव बाद किसी गठजोड़ में तब्दील कर लेने का आधार भी बना सकते हैं. संभव है कि चुनाव के बाद यदि मायावती को अपेक्षित सीटें ना मिलीं तो वो समाजवादी पार्टी पर भी वोट ट्रांसफर ना करने का आरोप लगा सकती हैं. ऐसे आरोपों की आड़ में उनका बीजेपी के करीब जाना अनुमान से यथार्थ में बदल सकता है. हो सकता है बीजेपी के चुनावी चाणक्य यूपी में गठबंधन के किले को गिराने के लिए मायावती का साथ लेने की भूमिका बना रहे हों.

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