23 बार सांसद देनेवाले सिंधिया परिवार की परीक्षा आज, गुना में ज्योतिरादित्य का फिर चलेगा सिक्का?

सिंधिया परिवार देश की सियासत में हमेशा दखल रखता रहा है. इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना से पांचवीं बार किस्मत आज़मा कर रहे हैं. उन पर अपनी सीट जीतने का ज़िम्मा तो है ही, पश्चिमी यूपी की सभी सीटें जिताने का भी दबाव है.
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सिंधिया राजघराना ब्रिटिश काल से पहले, ब्रिटिश काल के दौरान और ब्रिटिश काल के बाद भी सुर्खियों में रहा है. आज ज्योतारादित्य सिंधिया इसके प्रमुख चेहरे हैं और अपने परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने में जुटे हैं. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उन्हें मध्यप्रदेश के गुना से टिकट तो दिया ही, साथ में राष्ट्रीय महासचिव बनाकर पश्चिमी यूपी को जीतने भी भेजा. उनका ये प्रमोशन प्रियंका गांधी के साथ हुआ.

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गुना है सिंधिया का अभेद्य किला
गुना लोकसभा सीट सिंधिया परिवार की पारंपरिक लोकसभा सीट है. आज़ादी के बाद परिवार के ही सदस्यों ने इस सीट से जीत हासिल करके संसद में प्रवेश किया. खुद ज्योतिरादित्य सिंधिया 2002, 2004, 2009, 2014 में इसी सीट से सांसद रहे. उनसे पहले 1999 में ज्योतिरादित्य के पिता माधवराव सिंधिया ने इस सीट से जीत दर्ज की थी लेकिन एक हवाई हादसे में उनकी मौत हो गई जिसके बाद उपचुनाव कराना पड़ा.

अगर गुना लोकसभा सीट के इतिहास की बात करें तो मालूम चलेगा कि 1952 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने यहां परचम लहराया था, लेकिन 1957 में विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस को इस सीट पर जीत दिलाई.  इसके बाद 1967 में विजयाराजे ने स्वतंत्र पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर गुना की सीट जीती. 1971 में विजयाराजे सिंधिया के बेटे माधवराव सिंधिया ने भारतीय जनसंघ के टिकट से जीत हासिल की और अगली बार 1977 में वो निर्दलीय जीते. 1980 का चुनाव उन्होंने इंदिरा कांग्रेस के झंडे पर जीता लेकिन 1984 में उनकी सीट बदलकर ग्वालियर कर दी गई. 1989, 1991, 1996, 1998 में गुना की सीट राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने बीजेपी के निशान पर जीती.

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आज़ादी के बाद से ही राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने सियासत में कदम रख दिए थे

क्या इस बार सिंधिया की जीत मुश्किल?
आपको बता दें कि गुना संसदीय सीट में 8 विधानसभा क्षेत्र हैं जिसमें 4 पर बीजेपी और 4 पर कांग्रेस का कब्ज़ा है. क्षेत्र में 14 लाख मतदाता हैं.  राजस्थान से महज़ 35 किलोमीटर दूर गुना को मालवा का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. इसके पूर्व में छत्तीसगढ़, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में महाराष्ट्र स्थित है. 18 फीसदी लोग अनुसूचित जाति और 13 फीसदी लोग अनुसूचित जनजाति के हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो गुना की लोकसभा सीट जीतना ज्योतिरादित्य के लिए अब भी मुश्किल नहीं लग रहा. उनके खिलाफ बीजेपी ने केपी यादव को उतारा है जो सिंधिया परिवार के करीबी और कभी उनके सांसद प्रतिनिधि थे. बीजेपी ने अनुमान लगाया है कि केपी यादव क्षेत्र के ओबीसी वोट के सहारे कांग्रेस को टक्कर दे सकेंगे, फिर भी इस सीट के ऐतिहासिक रिकॉर्ड को देखकर नतीजे के अनुमान लगाए जा रहे हैं. यदि ज्योतिरादित्य चुनाव हारे तो वाकई ये बड़ा उलटफेर तो होगा ही, इसे ऐतिहासिक भी कहा जाएगा.

ज्योतिरादित्य का रिपोर्ट कार्ड कैसा?
ज्योतिरादित्य सिंधिया ने पहली बार चुनाव तब लड़ा था जब उनके पिता की आकस्मिक मौत हुई. 2001 में मैनपुरी में उनका जहाज क्रैश हो गया था. गुना में उपचुनाव हुआ तो ज्योतिरादित्य भारी मतों से जीते और मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय मंत्री बने.

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2001 में एक हवाई हादसे के दौरान माधवराव सिंधिया की दुखद मौत हो गई

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन और स्टैनफर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए की पढ़ाई करने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने की रेस में भी थे लेकिन राहुल ने उन्हें चुनावी तैयारियों में लगाया.

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सांसद निधि के 25 करोड़ रुपए में से 81.53 फीसदी तक क्षेत्र के विकास कार्य में खर्च किया. उनका करीब 4.97 करोड़ रुपये का फंड बिना खर्च किए रह गया. संसद में उनकी हाजिरी 76 फीसदी रही जहां उन्होंने 48 बहस में हिस्सा लिया. संसद में उनके पूछे गए सवालों की संख्या 825 थी. उनके सवाल, आरटीआई, वायु प्रदूषण, सौभाग्य योजना, एससीएसटी के खिलाफ क्राइम, भारतमाला परियोजना से संबंधित रहे.

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