सिंधिया vs कमलनाथ: मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए संकट, दोनों खेमे के मंत्रियों के बीच हुई तीखी नोकझोंक

लोकसभा चुनावों में सिर्फ कमलनाथ अपना गढ़ छिंदवाड़ा ही बचा सके थे. 29 में से बाकी 28 सीटों पर कांग्रेस को करारी हार मिली. ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी सीट नहीं बचा पाए थे.

भोपाल. मध्यप्रदेश सरकार में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. बुधवार को वल्लभ भवन में कैबिनेट की बैठक के दौरान ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ समर्थक मंत्रियों में तीखी नोकझोंक हुई. सूत्रों की मानें तो बात इतनी बढ़ गई कि सिंधिया समर्थक मंत्रियों ने कमलनाथ से भी काफी देर बहस की. आलम ये था कि कमलनाथ के समर्थक मंत्री सुखदेव पांसे को सिंधिया समर्थक मंत्रियों को मर्यादा में रहने की हिदायत तक देनी पड़ी.

क्या है पूरा मामला ?

दरअसल इस पूरे मामले की जड़ एक चिट्ठी है. सोशल मीडिया पर वायरल हुई एक खबर से सिंधिया और दिग्विजय सिंह समर्थक मंत्री परेशान है. खबर की मानें तो कमलनाथ दोनों दिग्गजों को कोटे के 2-2 मंत्री कम करके दूसरे वरिष्ठ विधायकों को मौका देना चाहते हैं. इससे सिंधिया और दिग्विजय सिंह दोनों के ही गुटों में अफरा-तफरी का माहौल है. वहीं सिंधिया समर्थक मंत्रियों को शिकायत ये भी है कि उन्हें अपनी मर्ज़ी के अधिकारी नहीं दिए गए हैं. उनके विभाग के पीएस और अन्य अफसर उनके अनुसार कामकाज नहीं करते. इसी मामले में रविवार को सिंधिया समर्थक मंत्री डिनर के बहाने आपस में मिले और लंबी चर्चा हुई थी.

कौन-कौन है सिंधिया खेमे के मंत्री ?

श्रम मंत्री महेंद्र सिंह सिसोदिया, महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी, राजस्व एवं परिवहन मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट, शिक्षा मंत्री प्रभुराम चौधरी, खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर ज्योतिरादित्य सिंधिया के कट्टर समर्थक माने जाते हैं. माना जा रहा है कि कैबिनेट रिशफल में इनमें से किसी 2 का पत्ता काटा जा सकता है.

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तो क्या प्रदेश में कमज़ोर हो रहे हैं सिंधिया ?

लोकसभा चुनावों में सिर्फ कमलनाथ का गढ़ छिंदवाड़ा ही बच सका. 29 में से बाकी 28 सीटों पर कांग्रेस को करारी हार मिली. इसमें कांग्रेस के गढ़ कहे जाने वाले गुना शिवपुरी से ज्योतिरादित्य सिंधिया की सीट भी शामिल थी. सिंधिया को कभी उन्हीं के समर्थक रहे केपी यादव ने हरा दिया. विधानसभा चुनावों के बाद से लगातार प्रदेश कांग्रेस में सिंधिया का कद घट रहा है। लोकसभा चुनावों में भी वो सिर्फ गुना शिवपुरी तक सीमित रहे. इतना ही नहीं, पड़ोस के ज़िले ग्वालियर में राहुल गांधी की सभा तक में सिंधिया नहीं पहुंचे. 12 मई को शिवपुरी का लोकसभा चुनाव होते ही सिंधिया विदेश चले गए. जबकि 19 मई को चुनाव का आखिरी चरण होना था. वो भी उस मालवा में जहां सिंधिया घराने का सिक्का चलता है. वर्तमान में उन्हें कांग्रेस हाईकमान ने पश्चिमी यूपी का प्रभार दिया हुआ है,जहां पर भी वो ज्यादा कमाल नहीं दिखा पा रहे हैं.

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प्रदेश में क्या है कांग्रेस की स्थिति ?

छिंदवाड़ा का उप चुनाव जीतने के बाद कांग्रेस के पास कुल 114 विधायक हैं. वहीं प्रदीप जायसवाल जो कभी कांग्रेस में थे निर्दलीय चुनाव जीते औक सरकार में मंत्री हैं. वहीं झाबुआ सीट जीएस डामोर के लोकसभा जाने से खाली हो चुकी है. लिहाज़ा वर्तमान में 4 निर्दलीय, 1 समाजवादी पार्टी, 2 बहुजन समाज पार्टी समेत कुल 121 विधायकों के साथ कांग्रेस पार्टी बहुमत में है. लेकिन मध्यप्रदेश में सरकार के टिकने के लिए ज़रुरी है कि सिंधिया समर्थकों को साथ रखा जाए. इससे पूर्व में सिंधिया के 11 समर्थक विधायकों ने उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाने को लेकर आंदोलन छेड़ दिया था. सिंधिया खेमे की नाराज़गी के साथ सरकार चला पाना थोड़ा मुश्किल हो सकता है.

राहुल गांधी की चुप्पी से बढ़ रही है राजनैतिक सरगर्मी

दरअसल लोकसभा चुनावों के बाद कमलनाथ 2 बार दिल्ली गए लेकिन राहुल गांधी से उनकी कोई औपचारिक मुलाकात नहीं होना कई सवाल खड़े कर रहा है. कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ के सांसद बनने के बाद पीएम के साथ उनकी मुलाकात हुई लेकिन राहुल गांधी से मुलाकात की कोई तस्वीर नहीं आई. ज़ाहिर है कि सिंधिया समर्थक भी इसी वजह से कमलनाथ के साथ मुखर होने की हिम्मत कर पा रहे हैं.