व्यापम घोटाले में मुख्य दोषी को 10 साल, 30 को 7 साल की सजा

सूत्रों के अनुसार, जिन आरोपियों को सजा सुनाई गई है, उनमें 12 परीक्षार्थी, 12 फर्जी परीक्षार्थी और सात दलाल हैं.

मध्यप्रदेश में व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) द्वारा वर्ष 2013 में आयोजित आरक्षक भर्ती परीक्षा में हुई गड़बड़ी के मामले में CBI की विशेष अदालत के जस्टिस एस.बी. साहू ने सोमवार को 31 दोषियों के लिए सजा का ऐलान किया. मुख्य दोषी को 10 साल कैद और 30 दोषियों को सात-सात साल कैद की सजा सुनाई गई है.

CBI के विशेष लोक अभियोजक सतीश दिनकर ने बताया कि जस्टिस साहू ने 21 नवंबर को 31 आरोपियों को दोषी ठहराया था. मुख्य आरोपी प्रदीप त्यागी को 10 साल जेल और 10 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है, जबकि अन्य 30 दोषियों को सात-सात साल जेल और एक से तीन हजार रुपये तक जुर्माने की सजा सुनाई गई है.

सूत्रों के अनुसार, जिन आरोपियों को सजा सुनाई गई है, उनमें 12 परीक्षार्थी, 12 फर्जी परीक्षार्थी और सात दलाल हैं.

आरक्षक भर्ती मामले की प्राथमिकी इंदौर के राजेंद्र नगर थाने में दर्ज की गई थी. मामले की जांच एसटीएफ कर रही थी. इस मामले से जुड़े कई लोगों की रहस्यमय ढंग से मौत हो जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर यह मामला CBI को सौंपा गया. CBI ने इस परीक्षा में धांधली के मामले में 31 लोगों को आरोपी बनाया था. इस मामले में वर्ष 2014 से गवाही शुरू हुई, जो पांच साल तक चली.

गौरतलब है कि व्यापम घोटाले का खुलासा 7 जुलाई, 2013 को पीएमटी परीक्षा के दौरान तब हुआ, जब एक गिरोह इंदौर की अपराध शाखा की गिरफ्त में आया. यह गिरोह पीएमटी परीक्षा में फर्जी विद्यार्थियों को बैठाने का काम करता था. तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस मामले की जांच अगस्त, 2013 में एसटीएफ को सौंपा था.

बाद में हाई कोर्ट ने मामले का संज्ञान लिया और उसने उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त जस्टिस, न्यायमूर्ति चंद्रेश भूषण की अध्यक्षता में अप्रैल, 2014 में एसआईटी गठित की, जिसकी देखरेख में एसटीएफ जांच करता रहा.

9 जुलाई, 2015 को मामला CBI को सौंपने का फैसला हुआ और 15 जुलाई से CBI ने जांच शुरू की.

इस चर्चित मामले में लगभग ढाई हजार लोगों को आरोपी बनाया गया, इनमें से कुल 2100 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. शिवराज सरकार के एक मंत्री तक को जेल जाना पड़ा था. इससे जुड़े 50 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है. रहस्यमय ढंग से एक के बाद एक मौत होने का राज जानने के लिए एक निजी समाचार चैनल ने अपने खोजी पत्रकार अक्षय सिंह को दिल्ली से भेजा था. जब अक्षय सिंह की भी रहस्यमय परिस्थिति में मौत हो गई, तब सुप्रीम कोर्ट ने स्वत:संज्ञान लेते हुए यह मामला CBI को सौंपने का निर्देश दिया था.