आखिर क्यों पिछले 3 सालों से इंदौर के नाम है स्वच्छता का तमगा? सामने आई वजह

इंदौर नगर निगम की आबादी लगभग 35 लाख है और हर रोज तकरीबन 1,200 टन कचरा निकलता है. कचरे का अलग-अलग तरीकों से निपटारा किया जाता है.
indore become number one, आखिर क्यों पिछले 3 सालों से इंदौर के नाम है स्वच्छता का तमगा? सामने आई वजह

जो कचरा देश के बाकी शहरों के लिए बोझा बना हुआ है, वही कचरा मध्य प्रदेश के इंदौर नगर निगम के लिए आमदनी का जरिया बन गया है. यहां कचरे से हर साल चार-पांच करोड़ रुपये की कमाई हो रही है. साथ ही यह तीन सालों से देश के सबसे साफ-सुथरे शहर का तमगा भी हासिल कर रहा है.

इंदौर कभी आम शहरों की तरह हुआ करता था, मगर आज वह देश में एक खास पहचान बना चुका है. बीते तीन सालों से देश का सबसे स्वच्छ शहर बना हुआ है. चौथे साल की पहली दो तिमाही में भी इंदौर अपनी स्थिति को बनाए हुए है. इंदौर में यह अचानक नहीं हुआ है.

नगर निगम के सलाहकार असद वारसी बताते हैं कि इंदौर के लोगों ने दिल और दिमाग से स्वच्छता को अपनाया है और उसका नतीजा सबके सामने है.

वारसी बताते हैं कि शहर को स्वच्छ बनाने के लिए नगर निगम ने तमाम नवाचारों का सहारा लिया, उसे स्थानीय लोगों का साथ मिला और इंदौर ने अपना नया मुकाम बनाया. संयुक्त प्रयासों का नतीजा है कि एक तरफ इंदौर स्वच्छ शहर बना है तो कई आवासीय बस्तियां कचराविहीन बन गई हैं. जिलाधिकारी कार्यालय तो पहला ऐसा कार्यालय बन गया है, जो कचराविहीन है.

नगर निगम ने शहर से निकलने वाले कचरे का उपयोग करने के लिए सबसे पहले पृथक-पृथक (सेग्रीगेट) इकट्ठा करने की दिशा में काम किया. गीला-सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा किया जाने लगा. जब यह मुहिम सफल हुई तो निगम ने कचरे को लेकर निविदाएं जारी कीं. इस पर कई कंपनियों ने रुचि दिखाई. निगम ने अपने स्तर पर जैविक कचरे से खाद बनाई, जिसकी किसानों के बीच बहुत मांग है. मांग इतनी कि उसे पूरा करना कठिन हो गया है.

इंदौर नगर निगम की आबादी लगभग 35 लाख है और हर रोज तकरीबन 1,200 टन कचरा निकलता है. कचरे का अलग-अलग तरीकों से निपटारा किया जाता है. हर रोज निकलने वाले कचरे में 550 टन गीला कचरा और 650 टन सूखा कचरा होता है.

वारसी बताते हैं, “निगम की सारी परियोजनाएं पीपीपी मोड (सार्वजनिक निजी भागीदारी) पर काम कर रही हैं. जैविक कचरे के विक्रय से नगर निगम को दो करोड़ रुपये की वार्षिक आमदनी होती है. इसी तरह एक कंपनी ने 300 टन सूखे कचरे के प्रतिदिन निष्पादन का एक संयंत्र लगाया है. यह संयंत्र कचरे को अलग-अलग करता है. इसमें बारह तरह के कचरे को अलग-अलग किया जाता है. यह ऑटोमेटिक सेंसर आधारित संयंत्र है. इस कंपनी को निगम ने सिर्फ जमीन दी है. यह कंपनी नगर निगम को हर साल एक करोड़ 41 लाख रुपये देता है.”

निगम को कचरे से होने वाली आय का ब्यौरा देते हुए वारसी ने बताया, “चौइथराम मंडी से निकलने वाले जैविक कचरे के निष्पादन के लिए एक संयंत्र लगाया गया है, जिससे बायो सीएनजी बनाई जाती है. इससे निगम को एक करोड़ रुपये की आमदनी होती है. इस तरह निगम को हर साल कचरे के निष्पादन से साढ़े चार करोड़ रुपये की आमदनी हो रही है.”

वारसी बताते हैं कि गैर सरकारी संगठन घरों से सूखा कचरा भी ढाई रुपये किलो की दर से खरीदते हैं. इसके एवज में यह संगठन निगम को वार्षिक प्रीमियम भी देते हैं. इस प्रयोग का सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि नगर निगम को कचरा इकट्ठा करने पर होने वाले खर्च से भी मुक्ति मिली है.

देश के सबसे साफ-सुथरे शहर के तौर पर पहचाना जाने वाला इंदौर साल-दर-साल बदला है. अपने को सुधारा है, उसी का नतीजा है कि आज इस शहर की पहचान ही स्वच्छता के तौर पर है. पिछले सालों की स्थिति पर गौर करें तो साल 2015 के स्वच्छता सर्वेक्षण में 25वें स्थान और 2011-12 में इंदौर सफाई के मामले में 61वें स्थान पर था. धीरे-धीरे इसे बदलने की कोशिश हुई और अब यह शहर देश का सबसे साफ शहर बन गया है.

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