विद्यार्थियों के आंदोलन को कुचलना ठीक नहीं, JNU विवाद पर शिवसेना ने बीजेपी को घेरा

शिवसेना ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स के साथ हुई मारपीट की कड़ी निंदा करते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है.

महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और शिवसेना के बीच होड़ मची हुई है. एक तरफ तो बीजेपी का कहना है कि राज्य में उन्हीं की सरकार बनेगी, तो वहीं दूसरी ओर शिवसेना, कांग्रेस और नेशनल कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ गठबंधन कर सरकार बनाने की तैयारियों में लगी हैं.

इसी बीच शिवसेना बीजेपी पर लगातार अपने मुखपत्र सामना के जरिए किसी न किसी मुद्दे को लेकर हमला किए जा रही है. अब शिवसेना ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के स्टूडेंट्स के साथ हुई मारपीट की कड़ी निंदा करते हुए बीजेपी पर निशाना साधा है.  शिवसेना ने अपने मुखपत्र में लिखा है कि सरकार कहीं शिक्षकों को पीट रही है तो कहीं विद्यार्थियों को कुचल रही है.

विद्यार्थियों के मोर्चे पर अमानवीय लाठीचार्ज

बीजेपी पर हमला बोलते हुए शिवसेना ने कहा, “दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है इसलिए वहां के कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की ही है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के मोर्चे पर दिल्ली में अमानवीय लाठीचार्ज हुआ. सैकड़ों विद्यार्थियों के सिर फूट गए, हड्डियां टूट गईं और खून बहा. हजारों गिरफ्तारियां हुईं. संसद अधिवेशन के शुरू होने के पहले दिन ही विद्यार्थियों ने मोर्चा निकाला. आंदोलनकारियों पर जिस प्रकार से लाठीचार्ज हुआ, देशभर से उस पर प्रतिक्रियाएं आने लगीं.”

“विधानसभा या संसद का अधिवेशन जब शुरू रहता है तो ऐसे में कई मोर्चे और आंदोलन होते रहते हैं. कुछ मामले आवश्यक और गंभीर होते हैं और सरकार को तुरंत निर्णय लेकर उसका रास्ता निकालना पड़ता है. कुछ दिनों से दिल्ली में ऐसे मोर्चों और आंदोलनों पर बैन लगा दिया गया है. जंतर-मंतर और संसद मार्ग परिसर से कई आंदोलन देशभर में पहुंचे हैं.”

विद्यार्थियों के आंदोलन को रौंदना ठीक नहीं

“लगभग 7 साल पहले अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार के विरोध में बड़ा आंदोलन किया और जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के आंदोलन को समर्थन देने की कतार में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता उपस्थित थे. मोदी की आज की सरकार और भाजपा का स्थान इस आंदोलन से ही बना था, इसलिए आज जब दिल्ली में भाजपा का शासन है तो विद्यार्थियों के आंदोलन को रक्तरंजित करके कुचलना ठीक नहीं.”

कहीं शिक्षक पिट रहे तो कहीं विद्यार्थी

“विद्यार्थियों को अनुशासन का पालन करना ही चाहिए. पुलिस द्वारा सुरक्षा के लिए बनाए गए ‘बैरिकेड्स’ को तोड़कर विद्यार्थी आगे जा रहे थेय इसका समर्थन कोई नहीं करेगा, लेकिन विद्यार्थियों की मांगें क्या थीं और सरकार ने उन मांगों के संबंध में क्या किया? ये सवाल है. ‘जेएनयू’ के हॉस्टल की फीस बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई. गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के विद्यार्थियों के लिए ये फीस बहुत महंगी है. इसका विरोध करने वालों के आंदोलन को इस प्रकार कुचलने की आवश्यकता नहीं थी. संबंधित विभाग के मंत्री को विद्यार्थियों की बात सुननी चाहिए थी, लेकिन सरकार कहीं शिक्षकों को पीट रही है तो कहीं विद्यार्थियों को कुचल रही है.”

“मांग करते हुए अपनी आवाज उठाने वाले कोई भी हों, उन्हें इस प्रकार नेस्तनाबूद करना कहां का न्याय है? ये एक प्रकार की दबंगई है, ऐसा शब्द प्रयोग किया तो उस पर देशद्रोह और राजद्रोह का मुकदमा दायर हो सकता है. वर्तमान नेताओं को एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि आपातकाल के कालखंड को आज भी काले पर्व के रूप में जाना जाता है. उस आपातकाल में ‘दबंगई’ के खिलाफ विद्यार्थी रास्ते पर उतरे थे.”

दमन चक्र देश के लिए घातक

“समय-समय पर विद्यार्थी वर्ग आजादी और लोकतंत्र के लिए रास्ते पर उतरा है तथा उसका राजनैतिक लाभ कई लोगों ने उठाया है. इसमें आज की भाजपा भी शामिल है. देश में कानून का राज होना चाहिए. इसके लिए अगर कोई दमन चक्र शुरू करने की सोच रहा होगा तो ये देश के लिए घातक है.”

“जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय पर सरकार का गुस्सा हो सकता है. कन्हैया कुमार इसी विश्वविद्यालय की देन है. बहुत कुछ करने के बावजूद ‘जेएनयू’ पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद अपना झंडा नहीं लहरा पाई. इसके लिए प्रयोग किया गया सरकारी तंत्र भी फेल हो गया.”

विद्यार्थियों से सरकार न करें खूनी झगड़ा

“‘नेहरू’ नाम से वर्तमान सरकार का झगड़ा है लेकिन फीस के विरोध में सड़कों पर उतरे विद्यार्थियों से सरकार ऐसा खूनी झगड़ा न करे. ‘जेएनयू’ एक नक्सलवादी और वामपंथी विचारों वाले लोगों का अड्डा है, ऐसा ‘दक्षिणपंथी’ विचार वालों का कहना है.”

“इसी विश्वविद्यालय से निकले डॉ. अभिजीत बनर्जी इस बार के नोबेल पुरस्कार विजेता घोषित हुए और इससे देश की प्रतिष्ठा दुनियाभर में बढ़ी. इस विश्वविद्यालय ने कई अच्छे नेता और विशेषज्ञ देश को दिए हैं, लेकिन उसमें से कोई ‘दक्षिणपंथी’ विचारों वाला नहीं था, इसलिए इस विश्वविद्यालय से अधिकारों के लिए उठने वाली आवाज को दबाना ही चाहिए, ऐसा सोचकर कानून-व्यवस्था की आड़ में आंदोलनकारी विद्यार्थियों पर अमानवीय लाठीचार्ज करने की नीति दुर्भाग्यपूर्ण है.”

“दिल्ली के रास्तों पर कानून-व्यवस्था के नाम पर अति कर दी गई. यही कांग्रेस के राज में होता तो भाजपा वाले संसद को सिर पर उठा लेते और ‘अ.भा.वि.प.’ जैसे संगठन देश को बंद करने की घोषणा करते. दिल्ली की सड़कों पर अपनी मांगों के लिए आंदोलन करनेवाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के नेत्रहीन, विकलांग विद्यार्थियों को जिस प्रकार से बंधक बनाया गया वो चिंताजनक है. नेत्रहीनों को मारने वाली पुलिस जनता की सेवक और कानून की रक्षक हो ही नहीं सकती. विद्यार्थियों को मत कुचलो. सरकार इतनी लापरवाह न हो.”

 

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