मैंने सत्ता के लिए ही गठबंधन किया, शिवसैनिक को बनाऊंगा मुख्यमंत्री, ये मेरा वचन है: उद्धव ठाकरे

शिवसेना का मुखपत्र सामना को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने सारे सवालों का बेबाकी से जवाब दिया है.
Uddhav Thackeray interview, मैंने सत्ता के लिए ही गठबंधन किया, शिवसैनिक को बनाऊंगा मुख्यमंत्री, ये मेरा वचन है: उद्धव ठाकरे

शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे के चुनाव लड़ने की ख़बर जैसे ही सामने आई, लोगों के बीच यह चर्चा होने लगी कि क्या वो मुख्यमंत्री के उम्मीदवार भी हो सकते हैं? क्योंकि उद्धव ठाकरे ने बीजेपी के साथ सीटों के बंटवारे से पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि शिवसैनिक मुख्यमंत्री बनेगा. आदित्य, ठाकरे परिवार से चुनाव लड़ने वाले पहले सदस्य हैं.

उद्धव ठाकरे के इस बयान के बाद लोगों के मन में कई सारे सवाल हैं. जैसे कि आदित्य का राजनीति में आना क्या उद्धव ठाकरे के संन्यास की घोषणा है? शिवसेना का मुखपत्र सामना को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने सारे सवालों का बेबाकी से जवाब दिया है.

शिवसेना प्रमुख ने राजनीति से संन्यास वाले सवाल पर कहा, ‘आदित्य ने चुनाव लड़ने का निर्णय लिया, मतलब मैंने राजनीति से संन्यास ले लिया है, ऐसा नहीं है. मैं खेती करने भी नहीं जाऊंगा. मैं हूं! और रहूंगा!!’

उद्धव ठाकरे गठबंध पर बोले और शिवसेना की आगामी रणनीतियों पर भी खुलकर बोलते रहे. ’24 तारीख के बाद दोबारा बोलूंगा. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद पर शिवसैनिक को बैठाकर दिखाऊंगा, ये मेरा शिवसेना प्रमुख का वचन है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘2014 के चुनाव की तरह ये चुनाव अलग है.संपूर्ण दृश्य बदला है.’

सवाल: शिवसेना गाजे-बाजे के साथ मैदान में उतरी है लेकिन 2014 की तरह की गर्जना नहीं दिखाई दे रही.

जवाब: क्या है गर्जना मतलब? शिवसेना की पहचान बाघ है और वो बाघ ही रहता है. उसे केवल गर्जना और हुंकार करने की जरूरत नहीं रहती. मैं ‘सामना’ से बोल रहा हूं. मतलब मन की बोल रहा हूं… और ‘सामना’ करते हुए मन का ही बोलना चाहिए.

सवाल: मतलब आपके ‘मन की बात’…?

जवाब: आप कोई भी शब्द इस्तेमाल करो लेकिन एक बात ध्यान में रखो. पिछले समय युति (गठबंधन) नहीं थी. युति क्यों टूटी, किसके चलते टूटी? इन बातों को दोहराते रहने का कोई अर्थ ही नहीं. वो एक युद्ध था. हमने देश भर में उठी एक लहर को महाराष्ट्र पर थोपा. गर्जना, हुंकार, इस युद्ध में या जैसा विरोधी सामने हो, उसी तरह करनी पड़ती है. पिछले 5 वर्षों से हम सत्ता में हैं. सत्ता में रहते हुए भी हम हमेशा जनता की आवाज बने. अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते रहे. न्याय के लिए लड़ते रहे.

सवाल: हां, लेकिन लोकसभा में जब आपने युति की, उस समय तस्वीर अलग थी.
जवाब: सही है. लोकसभा में हमने युति की, उस समय स्वयं अमित भाई मेरे पास आए थे. फिर मैं, वो और देवेंद्र जी फडणवीस तीनों ने मिलकर ‘ब्लू सी’ में पत्रकार परिषद को संबोधित किया. हर संघर्ष के लिए एक कारण होता है उसी तरह युति के लिए भी कारण लगता है. वैसे देखा जाए तो शिवसेना और बीजेपी ये एक विचारधारा की पार्टी है. मुझे आज भी याद है कि सन् 1987 ये अपने देश की राजनीति को दिशा देनेवाला और मोड़ देनेवाला साल था. उस समय पार्ले में जो उपचुनाव हुआ उस चुनाव में हिंदुत्व का महत्व दिखाया गया.

पत्रकार: हां, हिंदुत्व की वो लहर थी.
जवाब: आप जो कह रहे हैं वो सही है. उस चुनाव ने दिखा दिया कि हिंदुत्व का विचार देश के लिए कितना आवश्यक है और हिंदुत्व का यह विचार जीत दिला सकता है. फिर बीजेपी को भी ये ध्यान में आया. माननीय आडवाणी जी ने रथ यात्रा निकाली, फिर प्रमोद जी आए और गोपीनाथ जी आए. युति का पर्व शुरू हो गया. ये सब इतिहास बन गया. थोड़े में कहूं तो एक ही विचार के दो दलों का आपस में लड़कर समविचार मतों में बंटवारा न होने देना, यही उद्देश्य था. 2014 तक ये विचार और युति बनी रही. 2014 में युति टूटी और हम एक-दूसरे के खिलाफ लड़े. इसके बाद दोबारा हमें एक साथ आना पड़ा. अब भी हम एक साथ हैं. फिर आगे वैसे बढ़ना है, क्या करना है, इसका विचार करने के बाद ही कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं. वैसे वो निर्णय लिया गया. इसका मतलब गर्जना कम हुई है, ऐसा मैं नहीं कहूंगा.

सवाल: मतलब जहां उचित लगा वहां गर्जना की?
जवाब: जहां अन्याय दिखेगा वहां शिवसेना की गर्जना होगी ही. फिर वो किसानों के कर्ज की बात हो, फसल बीमा की बात हो या फिर कोई भी समस्या हो. अन्याय दिखाई देगा तो हमारी गर्जना होगी. न्याय व अधिकारों के आंदोलन के लिए ही शिवसेना का जन्म हुआ है, न कि सत्ता प्राप्ति के लिए.
2011 के लोकसभा चुनाव में स्वयं अमित शाह ‘मातोश्री’ पर आए थे. सीटों के बंटवारे में उनकी सहभागिता थी. वो दृश्य विधानसभा में नहीं दिखाई दिया. इन सीटों के बंटवारे में अथवा शिवसेना को संभालकर लेने की सहभागिता में कमी दिखाई दी. अमित भाई की प्रत्यक्ष सहभागिता कम दिखाई दी. लेकिन उनका और मेरा हमेशा संपर्क बना रहा. उस समय वे यहां आए थे क्योंकि उस समय युति नहीं थी. उसी युति के लिए वे आए और बाद में उन्होंने गृहमंत्री पद जैसी बड़ी जिम्मेदारी स्वीकार की. उनका और मेरा संपर्क आज भी अच्छा है इसलिए उनकी सहभागिता नहीं थी, ऐसा कुछ कह नहीं सकते.
अब रणसंग्राम शुरू हो गया है…

सवाल: हां… रणसंग्राम शुरू हो गया है. आप तैयार हैं क्या?
जवाब: तैयार नहीं होता तो इस साक्षात्कार के लिए आया ही नहीं होता. शिवसेना हमेशा तैयार रहती है. किसी भी परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए जिद और हिम्मत से शिवसेना तैयार रहती है.

सवाल: हमारे चंद्रयान की चांद पर उतरते समय हार्ड लैंडिंग हो गई. युति के संदर्भ में आपको भी हार्ड लैंडिंग की संभावना भविष्य में लग रही है क्या?
जवाब: बिल्कुल नहीं क्योंकि युति एक संकल्प से की है. पिछले 5 वर्ष में आत्म परीक्षण हुआ. चिंतन भी हुआ. युति थी तो क्या हो सकता था और क्या नहीं हो सकता था, इसका अनुभव दोनों दलों और महाराष्ट्र ने किया है. आप देश का विचार करके देखो. दो राज्यों में क्या हुआ? उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन हुआ और महाराष्ट्र में शिवसेना-बीजेपी की युति हुई. सपा-बसपा की युति लोगों ने नहीं स्वीकारी लेकिन महाराष्ट्र में लोगों ने शिवसेना-बीजेपी की युति स्वीकारी.

सवाल: आप विचारों से एक साथ आए?
जवाब: वही तो मेरा कहना है.

सवाल: लेकिन जो घटा है या जो घट रहा है पर्दे के पीछे हो… उसे आप युति मानते हो क्या?
जवाब: मुझे एक बात बताइए, चुनाव को आप कौन सी उपमा देंगे? लोकतंत्र का युद्ध कहेंगे, रणसंग्राम कहेंगे, कोई महाभारत कहता है और अगर महाभारत कहते हैं तो ये महाराष्ट्र है और उस महाराष्ट्र का धृतराष्ट्र नहीं हुआ है. यह महत्वपूर्ण है. महाराष्ट्र, महाराष्ट्र ही है, जो घट रहा है उसे वो खुली आंख से देख रहा है. कौन कैसा बर्ताव करता है, कौन स्वार्थी है, कौन महाराष्ट्र का विचार करता है, यह सब वो देख रहा है.

सवाल: मेरा प्रश्न वो नहीं…
जवाब: आपके सवालों का मतलब मुझे समझ में आया है. उस पर मेरा यही कहना है. हां! मैंने युति की है. युति के लिए जोड़-तोड़ की है. किसके लिए की, क्यों की तो मेरे महाराष्ट्र के लिए की. एक बार वचन देने के बाद महाराष्ट्र का हित न देखने की बजाय मैं तेरा-मेरा करते हुए खींचतान नहीं करता रहा. ऐसी तनातनी किसलिए? अगर लड़ना है तो अकेले कभी भी लड़ सकते हैं.

सवाल: 124 सीटों पर आपने जोड़-तोड़ की…?
जवाब: जोड़-तोड़ नहीं की. बीजेपी की ओर से देवेंद्र जी, चंद्रकांत दादा हमेशा कहते थे कि हमारी अड़चन उद्धव जी ने समझी है. वो अड़चन मैंने समझी है.

सवाल: शिवसेना के इतिहास में ये सबसे कम आंकड़ा है…
जवाब: शिवसेना के जीवन का ये आंकड़ा आज भले ही कम हो उसी के साथ ही शिवसेना के ज्यादा-से-ज्यादा विधायकों की संख्या शुरुआत करनेवाला ये पहला आंकड़ा होगा. ज्यादा-से-ज्यादा विधायक जीतने की जब शुरुआत होती है, तो ये पहला चरण होगा.

सवाल: आप उस दिशा में प्रयत्न कर रहे हैं क्या?
जवाब: मैं निश्चित ही वैसा प्रयत्न कर रहा हूं. शिवसेनाप्रमुख कहते थे, तूफान के समय शांत रहना चाहिए. तूफान में सबकुछ तिनके की तरह उड़ जाता है. मैं तूफान में मेरी शिवसेना बढ़ाकर दिखाऊंगा और तूफान में जब अन्य पार्टियां उखड़ रही होंगी तब मैं अपनी शिवसेना की जड़ों को गहराई तक मजबूत करके दिखाऊंगा.

सवाल: फिफ्टी-फिफ्टी का करार टूट गया है, ऐसा आपको लगता है क्या?
जवाब: मैंने कहा न, महाराष्ट्र, धृतराष्ट्र नहीं है. हमने समझदारी दिखाई है अर्थात ‘ब्लू सी’ के उस पत्रकार परिषद में जिम्मेदारी और अधिकार का सम-समान वितरण अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा था. 24 तारीख को विधानसभा का परिणाम घोषित होगा. इसके बाद 8-10 दिनों में मंत्रिमंडल की स्थापना होगी. उस समय सम-समान वितरण का मतलब क्या है? ये लोगों की समझ में आएगा.

सवाल: इतना आत्मविश्वास है?
जवाब: मेरा उस पर विश्वास है. कारण आखिरकार अयोध्या में राम मंदिर हमें क्यों चाहिए? राम का ही मंदिर क्यों चाहिए? राम सत्य वचनी थे. एकवचनी थे. वचन निभाने की हमारी नीति या वृत्ति नहीं है तो राम मंदिर मुद्दा खोखला है. फिर तो वो एक डींग मात्र है. लेकिन हम रामभक्त हैं. हम हिंदुत्ववादी हैं. दिए गए वचन को निभानेवाले हम ही रामभक्त हैं इसलिए मुझे विश्वास है.

सवाल: आप बार-बार अयोध्या में जाकर सत्य वचन की याद दिलाते हैं…
जवाब: एक बात पक्की है कि 1989-90 से राम मंदिर का मुद्दा देश की राजनीति में चरम पर आया. कोई माने या न माने लेकिन पिछले वर्ष शिव जन्मस्थान यानी शिवनेरी की मुट्ठी भर मिट्टी अयोध्या में ले गए, उसके बाद से देशभर में एक तूफान उठा. सभी को ये मुद्दा प्राथमिकता से लेना पड़ा. कोर्ट को स्वयं इस पर रोज सुनवाई करनी पड़ी और महीने-डेढ़ महीने में इसका परिणाम आना अपेक्षित है, ऐसा कहा जाता है. ये अपने महाराष्ट्र के शिवनेरी और उस मिट्टी का कमाल या चमत्कार है.

सवाल: राम मंदिर बनेगा क्या, आपको ऐसा अभी भी लगता है?
जवाब: बनेगा मतलब क्या? करना ही पड़ेगा. मैं वही तो पूछ रहा हूं… बनेगा मतलब बरसात होगी क्या? पेड़ पर फल लगेंगे क्या? ऐसा नहीं है. राम मंदिर बनेगा ही. बनेगा! बनाएंगे ही!!
अयोध्या में शिवसेना के कदम रखने के बाद से ही राम मंदिर के मुद्दे को गति मिली है. केंद्र की आंखें खुल गईं. जो संस्था, संगठन आंदोलन कर रहे थे, वे हड़बड़ाकर जाग उठे और इसका श्रेय शिवसेना को न मिले इसके लिए राम मंदिर का मुद्दा हमें हाथ में लेना चाहिए इस प्रकार के…

मुझे इस संदर्भ में कुछ नहीं कहना है. कौन क्या करे, ये बताने के लिए मैं इतना बड़ा नहीं हूं. लेकिन शिवसेना को क्या करना चाहिए, मुझे क्या करना है, ये तय कर सकता हूं और मैंने तय किया है. इसीलिए ही मैं अयोध्या गया. इसके बाद लोकसभा जीतने के बाद मैं दोबारा अयोध्या गया. इसका मतलब चुनाव के बाद भी हमने यह मुद्दा थामे रखा. आज भी यह मुद्दा हमारे एजेंडे में है. माननीय प्रधानमंत्री ने कहा है कि थोड़ा रुको! फिर थोड़ा रुकेंगे. देखते हैं क्या होता है?

सवाल: शिवसेना 124 सीटों पर लड़ रही है. उम्मीदवार चयन करते समय आपका क्या मापदंड था?
जवाब: बहुत कठिन होता है ये समय. मैंने परसों ही रंगशारदा में अपनी भावना व्यक्त की थी. सभी को ऐसा लगता है कि पक्षप्रमुख मतलब सर्वोच्च पद है. निश्चित ही है. लेकिन वो एक यातना देनेवाला पद है. हर जिला, तालुका, गांवों में शिवसैनिक तैयार हैं. हर कोई मेहनत से काम करता है. बीच के दिनों में मैं कइयों से निजी तौर पर मिला. जिन शिवसैनिकों की मेहनत पर शिवसेना है उनकी मेहनत के दम पर ही मैं पक्षप्रमुख के रूप में बैठा हूं. उनसे 6 महीने में एक बार मिलता हूं. एक-एक से बातचीत करता हूं. उनकी सुनता हूं. यह सब मैं करता हूं. उम्मीदवारी दें तो किसे? एक से बढ़कर एक शिवसैनिक सामने रहते हुए आखिरकार न चाहते हुए भी एक समय में एक ही को उम्मीदवारी देनी पड़ती है.

सवाल: मतलब ये ‘थैंकलेस जॉब’ है. वेदनादायी काम है…
जवाब: जाने-अनजाने किसी पर तो अन्याय होता है. उस अन्याय के लिए मैं जिम्मेदार हूं. मैं किसी पर उसे टालता नहीं. उम्मीदवारी देना मतलब न्याय देना नहीं. उम्मीदवारी देने के बाद जब ये उम्मीदवार जीतकर आएंगे, सत्ता आएगी. अगर मैं कुछ मांगने जाता हूं तो बर्तन क्यों छुपाऊं? सत्ता के लिए हम लड़ते हैं. जब सत्ता आने के बाद मेरे जुझारू शिवसैनिकों को जिस-जिसको जो कुछ देना संभव है, उसे मैं वो दूंगा ही.

सवाल: 124 सीटों पर शिवसेना लड़ रही है मतलब 164 सीटों पर शिवसेना के उम्मीदवार नहीं हैं. वहां जो कार्यकर्ता कार्य कर रहे थे, जिन्होंने पार्टी के लिए तैयारी की थी लड़ने की, उन पर भी अन्याय हुआ ऐसा आपको लगता है क्या?
जवाब: अब ऐसा है कि 164 सीटों पर शिवसेना के कार्यकर्ता तैयार हैं. वैसे ही 124 जगहों पर बीजेपी के भी हैं. मतलब युति में कुछ हासिल करने के लिए कुछ गंवाना भी पड़ता है. लेकिन आखिर में एक साथ परिणाम देखने के बाद हम कहां हैं, ये पता चलता है. मैंने कहा न सत्ता हमें चाहिए ही. हां, मैंने सत्ता के लिए ही युति की. उसमें छुपाने जैसा कुछ नहीं है. ये सत्ता रहेगी तो उन 164 निर्वाचन क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को भी मैं कुछ-न-कुछ दे सकता हूं इसलिए मैंने युति की.

सवाल: अभी तक ठाकरे थे… चुनाव नहीं लड़ते थे… हां, दूसरों को उम्मीदवारी देते थे. उन्होंने कइयों को विधायक बनाया, सांसद बनाया, मंत्री बनाया, मुख्यमंत्री बनाया, लोकसभा का अध्यक्ष बनाया, केंद्रीय मंत्री बनाया… लेकिन आज आप शिवसेना पक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे ने एक ठाकरे को उम्मीदवारी दी… क्या लगता है?

जवाब: शिवसेना प्रमुख ने मुझसे कहा था, उद्धव एक बात ध्यान में रखो. तुम मेरे बेटे हो इसलिए मैं तुमको शिवसैनिकों पर नहीं थोपूंगा और तुम मेरे बेटे हो इसलिए मैं तुम्हें रोकूंगा भी नहीं. तुम अपना काम करो. शिवसैनिकों ने अगर तुम्हें स्वीकारा तो मैं कहीं भी तुम्हारे आड़े नहीं आऊंगा. लेकिन अगर उनके मन में नहीं है तो मैं तुम्हें नहीं थोपूंगा. उसी तरह की नीति मैंने आदित्य के संदर्भ में रखी है. ईमानदारी से कहूं तो आदित्य मेरे से भी ज्यादा, कई गुना ज्यादा मेहनत करता है. मेरा ढेर सारा भार उसने हल्का किया है.

सवाल: आपसे ज्यादा युवा आयु में आदित्य ने काम शुरू किया…
जवाब: आपकी ही फिल्म थी ‘बालकडू’. तो यह बालकडू उसे शिवसेनाप्रमुख के पास से ही मिला है. मैंने जब कार्य शुरू किया तब आदित्य बहुत छोटा था. वो हमेशा अपने दादा के साथ रहता था. उनके पास बैठकर बालासाहेब किससे क्या कहते थे, कैसे बोलते थे, वो सुनता था. ये सब देखते-सुनते हुए वो बड़ा हुआ. पांच से छह वर्ष की उम्र से ही वो मेरे साथ और बालासाहेब के साथ दौरे पर भी आने लगा. उसने मेरे साथ ग्रामीण इलाकों को देखा है. अभी भी उसने ‘जनआशीर्वाद’ के माध्यम से सौ-सवा सौ निर्वाचन क्षेत्रों का दौरा किया.

सवाल: प्रचंड प्रतिसाद मिल रहा है…
जवाब: हां, प्रचंड प्रतिसाद मिल रहा है. मेरा भी यही कहना है. हम युवा युवा कहते हैं… ये युवाशक्ति असल में है क्या? फिर उन्हें आप कब मौका दोगे? केवल मेरा बेटा है इसलिए मैं ये नहीं कह रहा हूं. हातकलंगणे के सांसद धैर्यशील माने का उदाहरण लो. कितना अच्छा लगता है, अच्छा बोलता है, जोरदार है, युवा है… राहुल शेवाले है, भावना गवली है. ये उस समय के छोटे बच्चे आज बड़े हो रहे हैं, डेवलप हो रहे हैं.

सवाल: मतलब आप युवाशक्ति के आगे झुक गए क्या?
जवाब: नहीं, मैं नहीं झुका. मैं आशीर्वाद देता हूं और मेरी तीव्र इच्छा है कि युवाओं को अब आगे आना चाहिए. आपको परसों की एक बात बताता हूं. मैं गडकरी रंगायतन में एक कार्यक्रम में गया था. मेरे पहले ही कुछ वरिष्ठ लोग बैठे थे. एकनाथ शिंदे ने कहा ये यहां के सीनियर सिटिजन हैं. उनकी कुछ मांगें हैं. मैंने उनकी मांग पढ़ी. 60 वर्षों के नागरिकों को अमुक दो-तमुक दो. मैंने एकनाथ से कहा, तुरंत इनकी मांगों को पूरा करो क्योंकि ये सुविधा मुझे भी आगामी वर्षों से लागू होगी.
ये बहुत महत्वपूर्ण है… हमें पता नहीं चलता कि हम युवा से वरिष्ठ नागरिक कब बन गए? हम केवल सपना ही देखते हैं. हमारे सपने हमें कोई दिखा रहा है और उन सपनों को देखकर हम उसका पीछा करते हुए आ रहे हैं. केवल पीछा करते हैं. बाकी हाथ में कब आएगा? मुझे पता नहीं. मेरा एक मुद्दा है. युवाशक्ति को हम देश का भावी शिल्पकार कहते हैं. भावी क्यों? ये युवा अभी आगे आएं और अपने हाथों में सूत्र थाम लें.

सवाल: शिवसेना युवाओं का संगठन है…
जवाब: है, ही? शिवसेनाप्रमुख बालासाहेब ठाकरे भी उम्र के 84वें वर्ष में भी युवाओं के ही नेता थे. मेरे दादा कहते थे, उम्र सभी की होती है लेकिन विचारों से थकते ही आप बूढ़े हो जाते हैं…

सवाल: मतलब किंगमेकर की भूमिका जो आपने अभी तक निभाई, उसकी बजाय आपकी भूमिका अलग है?
जवाब: यह एक नई पीढ़ी आगे आ रही है. ठाकरे बोले तो किंगमेकर, वे विभिन्न पदों पर लोगों को बिठाते थे… मैं बैठा हूं न अभी तक. मैं खेती-वेती नहीं करूंगा. बिल्कुल नहीं. मैं राजनीति से संन्यास भी नहीं लूंगा. शिवसेनाप्रमुख को दिया गया वचन मैं जब तक पूरा नहीं करूंगा तब तक चुप नहीं बैठूंगा. मैं उनके शिवसैनिक को मुख्यमंत्री बनाऊंगा मतलब बनाऊंगा ही. ये जब तक नहीं होता तब तक मैं राजनीति नहीं छोड़ूंगा.

सवाल: आदित्य कौन-सी जिम्मेदारी लेगा?
जवाब: रुको. अभी तो वो इस राजनीति में आया है. जल्दी ही आदित्य आया है मतलब वो मुख्यमंत्री होगा, ऐसा नहीं. रुको न जरा, ये उसका पहला चुनाव है. उसकी संसदीय कामकाज में रुचि है. फिर चाहे विधानसभा हो, लोकसभा हो या राज्यसभा हो. आपने भी देखा, लोकसभा में जब बजट लाया जाता है, कोई अलग बिल आता है तब वो उत्सुकता के साथ वहां आता है. विधान भवन में भी वो उत्सुकता के साथ वहां की गैलरी में बैठता है. उसे इंट्रेस्ट है. यह क्षेत्र बुरा नहीं. बल्कि अच्छे युवक-युवतियां भी इस क्षेत्र में आएं. वे भी राज्य व देश का कामकाज हाथों में लें. ऐसा मेरा मानना है.

सवाल: आपने अभी ऐसा कहा कि, शिवसैनिक को मुख्यमंत्री पद के तख्त पर बिठाने का वचन आपने बालासाहेब को दिया था…?
जवाब: निश्चित ही बिठाऊंगा, लेकिन बीजेपी सुनेगी क्या? मेरा वचन है और उसे मैं पूरा करूंगा. क्योंकि हमेशा उनका निवेदन ऐसा आता है कि हम मुख्यमंत्री पद देंगे… कोई सुने या न सुने, ये वचन मैंने किसी से पूछकर नहीं दिया. ये वचन मैंने मेरे सर्वस्व अर्थात मेरे गुरु, मेरे पिता, मेरे नेता… जो कुछ भी मैं मानता हूं, उन्हें दिया गया ये वचन है और इसे मैंने किसी की अनुमति से नहीं दिया है. किसी की अनुमति के कारण ये नहीं रुकेगा. किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है.

सवाल: मतलब महाराष्ट्र को शिवसेना का मुख्यमंत्री मिलेगा…?
जवाब: मिलेगा, निश्चित ही मिलेगा.

सवाल: आप अब प्रचार के लिए महाराष्ट्र में घूमेंगे. 2014 में प्रचार का मुद्दा अलग था. इस बार आपके प्रचार का मुद्दा क्या है?
जवाब: मतलब एक ही साक्षात्कार में मेरे सभी कार्य हो जाएंगे. बाहर घूमना नहीं.

सवाल: शिवसेना को मतदान क्यों करें?
जवाब: बताता हूं. दोनों सवालों का जवाब देता हूं. प्रचार के मुद्दे अर्थात हमारा वचननामा तैयार हो रहा है. यह वचननामा मतलब हमारा वचन होता है. उसे हम पूरा करते हैं. इसीलिए हम उसे वचननामा कहते हैं. वो आश्वासनों की खैरात नहीं होती, जो हम पूरा कर सकते हैं, उसी का ही वचन हम देते हैं. मुंबई मनपा चुनाव में हमने जो वचन दिया था, उसमें से करीब 90-95 प्रतिशत वचनों को पूरा किया गया. झूठा वचन देकर मुझे एक भी वोट नहीं चाहिए. ये मेरी नीति है और ये बालासाहेब ने मुझे सिखाया है.

आपका दूसरा सवाल था शिवसेना को मतदान क्यों करे? मैं हमेशा कहता हूं कि शिवसेना सत्ता में और विधान भवन में आपकी आवाज है. आपने पहले गर्जना कहा था न… लोकसभा में हमारा नारा था- ‘मेरी गर्जना, मेरी शिवसेना’. इसलिए नाणार का मामला हो, किसानों की कर्जमुक्ति का मुद्दा हो, कर्जमाफी नहीं चाहिए मुझे किसानों को कर्जमुक्त करना ही है. उन्हें कर्जमुक्त करने के साथ-साथ चिंता मुक्त भी करना है. इसके लिए मैं बहुत कुछ कर रहा हूं.

सवाल: आपने फसल बीमा का मुद्दा भी जोरदार तरीके से उठाया था?
जवाब: हां, सही है वो. फसल बीमा का मुद्दा हमने उठाया. खुद को जो कृषि विशेषज्ञ मानते हैं उनमें से कितनों को ये मुद्दा ध्यान में आया? कितनों ने इसे उठाया? आज मुझे एक बात की संतुष्टि है. पात्र होने के बाद भी किसानों की भाग-दौड़ शुरू थी. उन्हें कोई तवज्जो नहीं दे रहा था. उन पात्र किसानों को न्याय व उनका अधिकार शिवसेना ने दिलाया. पिछले महीने का आंकड़ा बताता हूं. करीब हजार से ग्यारह सौ रुपए दस लाख किसानों को शिवसेना ने दिलाए हैं. ये सभी किसान पात्र हैं. उन्होंने 90 लाख किसानों को अपात्र किया, वो हिस्सा अलग है. लेकिन जो पात्र हुए हैं, उन्हें भी दौड़ाना मतलब दौड़ने से किसान थकता है.

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