Vikas Dubey Encounter पर सवाल उठाने वालों पर शिवसेना का तंज- कोई संत-महात्मा नहीं था गैंगस्टर

विकास दुबे (Vikas Dubey) के एनकाउंटर के कारण दुखी-त्रस्त लोगों को चाहिए कि वे विवेक दुबे और उसकी टोली द्वारा मारे गए आठ पुलिसकमिर्यों के परिजनों से मिलकर उनका दुख भी समझें.
notorious criminal Vikas Dubey, Vikas Dubey Encounter पर सवाल उठाने वालों पर शिवसेना का तंज- कोई संत-महात्मा नहीं था गैंगस्टर

गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) के एनकाउंटर (Encounter) पर सवाल उठाने वालों पर शिवसेना (Shiv Sena) ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए तंज कसा है. सामना में लिखा है कि आठ पुलिसकर्मियों के क्रूरतम हत्याकांड को अंजाम देनेवाले कुख्यात अपराधी विकास दुबे का नामोनिशान उत्तर की पुलिस ने हमेशा के लिए मिटा दिया है. एक अपराधी का, गैंगस्टर का, माफिया का जिस प्रकार से अंत होना चाहिए, वैसा ही खात्मा विकास दुबे का हुआ. इसे कोई कथा कहे, पटकथा कहे या कुछ और लेकिन सच यह है कि विकास दुबे नाम का एक कर्दनकाल खत्म हो गया. इस पर इतना शोक क्यों?

विकास दुबे के एनकाउंटर के बारे में कुछ सवाल उठाए जा रहे हैं. उसमें सच्चाई होगी भी. लेकिन उसकी मौत के बाद मानवाधिकारवादी जिस प्रकार से गला फाड़ कर आक्रोश कर रहे हैं, वह समझ से बाहर है.

‘निर्ममता से हत्या कर देनेवाला अपराधी’

सामना में आगे लिखा है कि विकास दुबे कोई संत-महात्मा या समाजसेवक नहीं था, वह किसी की सुपारी लेकर उनकी कीड़े-मकोड़ों की तरह निर्ममता से हत्या कर देनेवाला अपराधी था. इसलिए मुठभेड़ में मारे गए दुबे की मौत पर इतने कोलाहल की आवश्यकता नहीं है.

विश्वास हो या न हो लेकिन पुलिस ने विकास दुबे के एनकाउंटर की जो कहानी बताई, वो इस प्रकार है. गुरुवार को मध्य प्रदेश में आत्मसमर्पण के बाद विकास दुबे को उज्जैन में उत्तर प्रदेश पुलिस के हवाले कर दिया गया.

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स्पेशल टास्क फोर्स का दल, कानपुर पुलिस दस्ते और पुलिस की गाड़ियों के साथ कड़े बंदोबस्त में दुबे को लेकर निकला. कानपुर के पास दुबे जिस गाड़ी में था, उस गाड़ी का अपघात हो गया. दुबे पलटी हुई गाड़ी से बाहर निकला. जख्मी पुलिसकर्मी की पिस्तौल छीनकर भागने लगा. पीछा करनेवाले पुलिसकमिर्यों पर उसने गोलीबारी की और आखिरकार वह पुलिस एनकाउंटर में मारा गया.

इस मुठभेड़ में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए. सीने और कमर में चार-पांच गोलियां घुसने के कारण विकास दुबे नामक आतंक खून से लथपथ होकर निष्प्राण हो गया. एक अपराधी खत्म हुआ या खत्म कर दिया गया, इससे क्या फर्क पड़ता है? अपराधी के प्रति सहानुभूति दिखाकर उसे किस प्रकार से मारा गया और कमियां गिनाकर उसकी मृत्यु पर दुख क्यों व्यक्त किया जाए?

‘दुखी-त्रस्त लोगों को चाहिए कि…’

सामना के लेख के अनुसार, विकास दुबे के एनकाउंटर के कारण दुखी-त्रस्त लोगों को चाहिए कि वे विवेक दुबे और उसकी टोली द्वारा मारे गए आठ पुलिसकमिर्यों के परिजनों से मिलकर उनका दुख भी समझें.

3 जुलाई को पुलिस अधीक्षक देवेंद्र मिश्रा तीन पुलिस थानों के दस्तों के साथ बिकरू गांव में विकास दुबे पर दबिश देने पहुंचे थे. हालांकि रास्ते में ही जेसीबी खड़ी करके दुबे ने पुलिस दस्ते का रास्ता रोक दिया और अपने किलेनुमा बंगले की छत पर से पुलिस दस्ते पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी.

जिस डीएसपी मिश्रा ने दुबे की दहशत खत्म करने के लिए उसकी टांगें तोड़ने की कसम खाई थी, उसी अधिकारी के पैर को उस क्रूरकर्मा ने कुल्हाड़ी से काट डाला. आठ पुलिसकर्मियों के हत्याकांड के बाद उन पर डीजल डालकर उन्हें जला डालने का क्रूर प्रयास भी दुबे ने किया.

पुलिसकर्मियों की जान लेते समय जरा भी दया न दिखानेवाले विकास दुबे के प्रति पुलिसवाले भी दया दिखाएं, ऐसी अपेक्षा करना ही नादानी है. विकास दुबे के एनकाउंटर के पश्चात उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश भर की जनता ने चैन की सांस ली है. मानवतावादी और लोकतंत्र के संरक्षक चाहे जो कहें, लेकिन जनता ने इस एनकाउंटर का स्वागत किया है.

‘भाग ही जाना था तो आत्मसमर्पण क्यों करता?’

कुछ तर्कवादियों का कहना है कि अगर विकास दुबे को भाग ही जाना था तो वह आत्मसमर्पण क्यों करता? लोकतंत्र में इस प्रकार के सवाल उठाने की छूट भले ही हो लेकिन ऐसी भी बात नहीं करनी चाहिए, जिससे पुलिस बल का मनोबल कमजोर हो.

सामना में लिखा है कि विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद पुलिस पर कीचड़ उछालने की बजाय यह खतरनाक अपराधी 8 पुलिसकर्मियों के हत्याकांड के बाद उत्तर प्रदेश से मध्य प्रदेश कैसे पहुंचा, हर नाके पर वाहनों को रोककर दुबे उज्जैन तक कैसे पहुंचा, उसकी किन-किन लोगों ने मदद की? इसका पता लगाया जाना चाहिए.

राज्यमंत्री दर्जा प्राप्त नेता की पुलिस थाने में घुसकर हत्या करनेवाला ये नामचीन अपराधी इतने दिन बाहर कैसे रहा? लगभग 20 पुलिसकर्मियों ने उस खून को अपनी नंगी आंखों से देखा और उसमें से एक भी पुलिसकर्मी कोर्ट में दुबे के खिलाफ गवाही नहीं देता.

दुबे और लाशें गिराने के लिए छूट जाता है और कई लोगों का खून करता है. इसके बावजूद कानपुर के मोस्ट वांटेड टॉप 10 अपराधियों की सूची में विकास दुबे का नाम नहीं दिखता. दुबे के एनकाउंटर पर शोक करनेवालों को सवाल उठाना ही है तो इस सड़ी हुई व्यवस्था पर उठाएं.

‘सैकड़ों अपराधियों को पुलिसकर्मियों ने मार डाला’

सामना में छपे लेख के अनुसार, योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद को स्वीकार करने के बाद सैकड़ों अपराधियों को पुलिसकर्मियों ने मार डाला. इसका स्वागत भी हुआ लेकिन कुल मृत अपराधियों की सूची में उसी समय विकास दुबे का नाम आ गया होता तो 8 पुलिसकर्मियों का हत्याकांड नहीं होता.

विकास दुबे कोई साधारण पॉकेटमार नहीं था, बल्कि वह एक गैंगस्टर और आतंकवादी था. वह पुलिस एनकाउंटर में मारा गया. इस एनकाउंटर पर सवाल क्यों? इस पर सवाल करना मतलब दुबे द्वारा किए गए हत्याकांड में 8 पुलिसकर्मियों की शहादत का अपमान है.

अपराधियों की कमर तोड़ने के लिए कानून का दबदबा बनाए रखने के लिए पुलिस को कभी-कभी कठोर बनना पड़ता है. महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्यों में ऐसे कई एनकाउंटर हुए हैं.

तेलंगाना में पुलिसकमिर्‍यों द्वारा चार अपराधियों का एनकाउंटर इसी प्रकार चर्चा में आया था. उस समय पूरे देश ने उसका स्वागत किया था. विकास दुबे के एनकाउंटर पर सवाल करनेवालों को ये पूछना चाहिए कि विकास दुबे जैसे गैंगस्टर निर्माण करनेवाली यंत्रणा का ‘एनकाउंटर’ कभी होगा क्या?

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