व्यंग्य: संजय राउत जी, राजनीति में साथ जीने-मरने की कसमें खाते ही क्यों हो?

संजय राउत ने कहा 'बीजेपी इंद्र का सिंहासन भी दे तो शिवसेना साथ नहीं आएगी.' चुनाव से पहले का भरत मिलाप बाद में प्रलाप कैसे बन गया?
alliance of Shiv Sena and BJP, व्यंग्य: संजय राउत जी, राजनीति में साथ जीने-मरने की कसमें खाते ही क्यों हो?

आइए थोड़ी देर के लिए आपको ठगा हुआ महसूस कराते हैं. याद कीजिए कि पॉलिटिकल आइडियोलजी के चलते आपने कितने दोस्त और रिश्तेदार खोए हैं. शाहजहांपुर वाले मौसा ने तीन साल पहले आपसे बात करनी छोड़ दी थी क्योंकि आपने कांग्रेस को चोर कह दिया था. या आप भाईसाब, आपके बचपन का लंगोटिया यार आपको वामपंथी बोलकर निकल लिया. लौटकर नहीं आया. ऐसे ही कितनों के अपने राजनैतिक बहसों में बह गए.

अब थोड़ा जख्मों पर नमक मलने की इजाजत चाहता हूं. महाराष्ट्र में कांग्रेस, एनसीपी के सहयोग से शिवसेना सरकार बनाने जा रही है. सारी प्लानिंग सेट हो चुकी है. बयानों से तो लग रहा है कि विभाग तक बंट चुके हैं बस शपथ लेना बाकी है. महाराष्ट्र वालों को उम्मीद है कि इस महीने के अंत तक उन्हें सरकार के दर्शन हो जाएंगे.

कभी कांग्रेस को देश की दुश्मन कहने वाली शिवसेना उससे हाथ मिला सकती है. कभी देश को तोड़ने वाली शिवसेना से कांग्रेस गले मिल सकती है लेकिन आपके दोस्त-रिश्तेदार वापस नहीं आ सकते. इस मौके पर शिवसेना नेता संजय राउत ने गजब का बयान दिया है जिसे जानकर आपके मन को सुकून मिलेगा. उन्होंने कहा है कि बीजेपी इंद्र का सिंहासन भी दे तब भी शिवसेना साथ नहीं आएगी. अब आपको अपने दोस्तों-रिश्तेदारों के लिए कम बुरा लग रहा होगा.

संजय राउत जी के बारे में कहा जा रहा है कि वह इस सरकार में मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं. तब वे और बिजी हो जाएंगे, उससे पहले उनसे एक सवाल बनता है. भले वे इसका जवाब सुबह उठकर ट्विटर पर शेर की शक्ल में दे दें. पूछना ये है कि साथ जीने-मरने की कसमें क्यों खाई थी? ये रिश्ता तो कच्चे धागे से भी कमजोर निकला.

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चलिए, गठबंधन को वणक्कम

विधानसभा चुनाव से पहले जो राम-भरत वाली जोड़ी थी वो टूट कैसे गई? उद्धव ठाकरे ने ऐलान किया था कि शिवसेना और बीजेपी साथ मिलकर हिंदुत्व के एजेंडे पर लड़ेंगे. इसके लिए अयोध्या की यात्रा भी की थी, वो भी सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले. लेकिन हाय रे कुर्सी, उसने हिंदुत्व के दो समर्पित सिपाहियों को एक होने से रोक दिया.

जनता की सेवा का ऐसा जुनून था कि न देवेंद्र फड़नवीस मुख्यमंत्री पद से हटने को तैयार थे न ही शिवसेना. किसी पुराने गुप्त समझौते के तहत 50-50 का फॉर्मूला शिवसेना बार बार याद दिलाती रही लेकिन बीजेपी गजनी का आमिर खान बनी रही. उसी चक्कर में चमन उजड़ गया. बहरहाल महाराष्ट्र वालों को बधाई, उन्हें फुल टाइम मुख्यमंत्री मिलने वाला है.

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