महाराष्ट्र: क्या फ्लोर टेस्ट करा सकता है सुप्रीम कोर्ट? पढ़ें ये तीन ऐतिहासिक मामले

अदालत इसी तरह के मामलों को लेकर पिछले आदेशों में 24 से 48 घंटों में विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए आदेश दे चुका है.
maharashtra government supreme court, महाराष्ट्र: क्या फ्लोर टेस्ट करा सकता है सुप्रीम कोर्ट? पढ़ें ये तीन ऐतिहासिक मामले

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को सदन में बहुमत साबित करने के लिए भले ही राजभवन से 30 नवंबर तक का समय मिला हो, लेकिन ऐसे मसलों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश जल्द फ्लोर टेस्ट करा सकता है.

मौजूदा मामले में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस ने भी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. पिछले आदेशों के मद्देनजर यह संभव है कि महाराष्ट्र विधानसभा में अगले 24 से 48 घंटों के भीतर मुख्यमंत्री फडणवीस को सदन में बहुमत साबित करना पड़े.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ऐसे मामलों में दिए गए आदेशों से पता चलता है कि फ्लोर टेस्ट जल्द कराया जाना चाहिए. शपथ ग्रहण के 24 से 48 घंटों के भीतर फ्लोर टेस्ट कि प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले मामलों में कराया है. ताकि विधानसभा में वास्तविक संख्या स्पष्ट हो जाए और राजनीतिक चयन संदेह के घेरे में नहीं रहे.

24 फरवरी 1998 मामला उत्तर प्रदेश विधानसभा

याद रहे कि ऐसे मामले में अदालत ने कहा था कि सत्ता में आने और फ्लोर टेस्ट के बीच लंबे अंतराल से हॉर्स-ट्रेडिंग और भ्रष्टाचार का खतरा बढ़ जाता है.
ध्यान रहे कि 24 फरवरी, 1998 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में 48 घंटे के भीतर एक समग्र फ्लोर टेस्ट आयोजित करने का आदेश दिया. तब यह निर्धारित होना था कि क्या जगदंबिका पाल या कल्याण सिंह के पास बहुमत है.

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11 मार्च 2005 मामला झारखंड विधानसभा

इसके बाद 9 मार्च, 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड विधानसभा में 11 मार्च, 2005 को फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश दिया था जो यह स्पष्ट करने वाला था कि राजनीतिक गठबंधनों के पास बीच सदन में बहुमत है या नहीं.

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18 मई 2018 मामला कर्नाटक विधानसभा

गतवर्ष 18 मई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अगले दिन शाम 4 बजे एक फ्लोर टेस्ट का आदेश दिया था. इस मामले में भी मुश्किल से 24 घंटे पहले बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी.

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सरकार का गठन संख्या बल पर आधारित

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व में दिए गए आदेशों में साफ किया है कि सरकार का गठन संख्या बल पर आधारित है. यह संख्या पर आधारित है जिसका प्रमाण फ्लोर टेस्ट में होता है. मौजूदा मामले में शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस ने अदालत से तत्काल फ्लोर टेस्ट के लिए आग्रह किया है, क्योंकि सरकार बनाने के लिए किसी पार्टी या गठबंधन को राज्यपाल द्वारा मंजूरी समर्थन पत्रों के आधार दिया जाता है.

जबकि राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत एक मुख्यमंत्री को नियुक्त करने से पहले हरेक सदस्य के समर्थन के बारे स्पष्ट तौर पर नहीं जान सकता है. ऐसे में फ्लोर टेस्ट सदन में संख्याओं का निर्णायक प्रमाण है.

अनुच्छेद 164 (2) का उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 1994 में एसआर बोम्मई मामले ने फ्लोर टेस्ट की अवधारणा को पेश किया था. अदालत कि संविधान पीठ ने अनुच्छेद 164 (2) का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है कि मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से राज्य की विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होगी. पीठ ने व्याख्या की है कि बहुमत का अंतिम परीक्षण राजभवन में नहीं, बल्कि सदन के पटल पर होता है.

उल्लेखनीय है कि बोम्मई फैसले का तर्क था अगर केवल एक व्यक्ति संविधान और इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए लोकतांत्रिक सिद्धांत को ध्यान में रखता है कि यह विधानसभा है जो लोगों की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है, राज्यपाल की नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने सालों से कई मौकों पर विभिन्न राज्यों में गतिरोधों को दूर करने के लिए फ्लोर टेस्ट का आदेश देने के लिए हस्तक्षेप किया है. अदालत ने एक विशेष सत्र में फ्लोर टेस्ट कराने को संचालन की सुविधा के लिए विधानसभा के वरिष्ठतम सदस्य को प्रोटैम स्पीकर के रूप में नियुक्त करने का आदेश दिया था.

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