छुट्टियों पर देश में बने समान नागरिक कानून, ‘सामना’ में शिवसेना ने उठाई मांग

सामना में लिखा, ''दुनियाभर में हमारा देश सबसे ज्यादा छुट्टीबाज देश है. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और राष्ट्र पुरुषों की जयंतियों पर छुट्टियां मिलती रहती हैं. लेकिन इनमें से किसी एक पुण्य दिवस के दिन रविवार हुआ तो हमारे देश के छुट्टीबाज तड़पने लगते हैं.

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली सरकार ने स्टेट गवर्नमेंट के कर्मचारियों को हर हफ्ते 5 दिन काम करने की घोषणा की है. वहीं शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के जरिए देश में समान नागरिक कानून होने की मंशा जताई है.

सामना में लिखा, ”दुनियाभर में हमारा देश सबसे ज्यादा छुट्टीबाज देश है. स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस और राष्ट्र पुरुषों की जयंतियों पर छुट्टियां मिलती रहती हैं. लेकिन इनमें से किसी एक पुण्य दिवस के दिन रविवार हुआ तो हमारे देश के छुट्टीबाज तड़पने लगते हैं. उनकी इच्छा ये रहती है कि कैलेंडर में रविवार को ऐसा दिन आना उनके अधिकारों का हनन है. राष्ट्रीय या धार्मिक छुट्टी शुक्रवार या सोमवार को ही आनी चाहिए.”

‘समान नागरिक कानून हो’

सामना में लिखा, ”देश में लाखों मजदूर, कामगार और किसान बिना छुट्टी लिए प्रतिदिन मेहनत करते हैं. घर की गृहिणी कभी छुट्टी नहीं लेती. रोजगार गारंटी योजना के अनुसार मेहनतकशों को काम करना ही पड़ता है. सैनिक और पुलिस आंखों में तेल डालकर लगातार काम करते हैं. ये उनका कर्तव्य है लेकिन छुट्टियों के मामले में हमारे देश में समान नागरिक कानून हो, ऐसा किसी को क्यों नहीं लगना चाहिए?”

PM मोदी के काम पर सामना में क्या लिखा?

सामना में लिखा, ”प्रधानमंत्री के काम पर निशाना साधते हुए सामना में लिखा, ”अक्सर कहा जाता है कि देश के प्रधानमंत्री 18-19 घंटों तक काम करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने आज तक एक भी छुट्टी नहीं ली, ऐसा प्रचार किया जाता है. लेकिन प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राष्ट्रपति और राज्यपाल भी दिन-रात जनता की सेवा करें यही अपेक्षा की जाती है. प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा पर प्रतिदिन लगभग पौने दो करोड़ रुपए खर्च होते हैं और उनकी विदेश यात्रा का बिल 700-800 करोड़ के ऊपर चला गया है.”

‘उनके घर चूल्हे नहीं जल पाते…’

सामना में लिखा, ”देश के सत्ताधीश दूसरे देश के सत्ताधीशों की तरह ट्रेन, मेट्रो, ट्रॉम और बसों से यात्रा नहीं करते. इसलिए बिना छुट्टी लिए काम करने में क्या खास है. आम लोगों के लिए छुट्टी आनंददायी होती है लेकिन कारखानों, सड़कों और खेतों में मजदूरी करनेवालों के लिए ‘आठ दिन’ भी कम पड़ते हैं. रोज बिना काम किए उनके घर चूल्हे नहीं जल पाते.

इस वर्ग के लिए भी सरकार को कुछ करना चाहिए. इस वर्ग को सातवां वेतन आयोग नहीं मिलेगा. उन्हें घंटे-दो घंटे आराम भी नहीं मिलता. सरकार उन्होंने ही चुनी है. लेकिन सप्ताह में कितने दिन? पांच कि सात दिन, उन्हें ये भी नहीं मालूम. गरीबी में जन्म लेना और गरीबी में ही मर जाना सरकारी कर्मचारियों को ऐसे लोगों के बारे में जरूर विचार करना चाहिए.

सरकारी कर्मचारियों को सप्ताह में पांच दिन काम मिलने की खुशी तो है ही लेकिन पूरे सप्ताह मेहनत करनेवालों के जीवन में सुख के दो क्षण कैसे पैदा होंगे, ये भी उन्हें देखना चाहिए. बाकी ‘छुट्टी’ तो अच्छे काम के लिए ही होती है!”

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