आप काम नहीं करेंगे, यही आपका ‘काम’ होगा. चाहिए ऐसी जॉब?

बड़े पैमाने पर हो रहे ऑटोमेशन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के आकर्षण के बीच बहस इस बात पर हो रही है कि आखिर इंसानों का काम ही क्या रह जाएगा? ऐसे में इसका जवाब यही होगा कि तब हम सब वही कर रहे होंगे, जो ये शख्स (कोई काम नहीं करने वाला) कर रहा है.
Swedish Experimental art project, आप काम नहीं करेंगे, यही आपका ‘काम’ होगा. चाहिए ऐसी जॉब?

नयी दिल्ली: कुछ भी कीजिए बस काम मत कीजिए. ये एक ऐसी लाइन है, जो आपको उलझन में डाल सकती है. लेकिन ये सही है. आप फिल्में देख सकते हैं. किताबें पढ़ सकते हैं या फिर नींद ले सकते हैं. बस, आपको एक तय जगह पर रोज आना और जाना है. इस दौरान आपको दूसरे जॉब की चिंता भी नहीं करनी है, क्योंकि ‘काम न करने का ये काम’ स्थायी है.

ये दिलचस्प और नायाब योजना बाकायदा स्वीडन के गोटनबर्ग में 2026 में शुरू होगी और ये जॉब दुनिया के किसी भी हिस्से के व्यक्ति के लिए उपलब्ध है. इसमें शामिल होने वाले कर्मचारी को शहर के एक तय रेलवे स्टेशन पर रिपोर्ट करना होगा. इसके लिए उसे 2320 डॉलर प्रति महीने की सैलरी मिलेगी. सैलरी में सालाना इजाफा भी होगा, छुट्टियां मिलेंगी और रिटायरमेंट के बाद पेंशन की सुविधा भी होगी. साथ ही, इस बात की गारंटी भी रहेगी कि उसकी नौकरी कभी न जाए.

लेकिन ये जॉब इतनी आसान भी नहीं है. शर्त ये है कि कर्मचारी हर दिन सुबह रेलवे स्टेशन पर आकर टाइम क्लॉक को पंच कर अपनी हाजिरी लगाएगा. उसके ऐसा करते ही प्लेटफॉर्म पर एक खास रोशनी जल उठेगी. इससे स्टेशन पर मौजूद यात्रियों को पता चल जाएगा कि ‘कुछ भी न करने वाला कर्मचारी काम पर’ है.

शाम को वह फिर से टाइम क्लॉक पर पहुंचेगा और उसके दोबारा पंच करते ही वो लाइट्स जो सुबह जली थीं वो बुझ जाएंगी. आने और जाने के बीच की इस अवधि में वह कर्मचारी अपनी इच्छा से जो भी चाहेगा करेगा. लेकिन उसे ऐसा कुछ भी नहीं करना होगा, जो कुछ दूसरे काम पैसे लेकर जॉब के तौर पर किए जाते हैं. ये भी जरूरी नहीं होगा कि वह पूरे समय तक स्टेशन पर ही मौजूद रहे. वह कभी भी इस काम को छोड़ सकता है. अगर ऐसा होता है, तो उसकी जगह किसी और कर्मचारी को इसी ‘काम’ पर तैनात किया जा सकेगा. हालांकि अगर वह खुद ये ‘काम’ नहीं छोड़ देता है, तो ताउम्र उसके जॉब की गारंटी रहेगी.

इस काम न करने के ‘जॉब’ के लिए कोई तय योग्यता की जरूरत नहीं है. कोई भी इसके लिए आवेदन कर सकता है. इस जॉब के तहत कोई ड्यूटी या जिम्मेदारी नहीं है. कर्मचारी खुद जो कुछ भी करता है वही उसकी ड्यूटी होगी.

क्यों किया जा रहा है ये नायाब प्रयोग?
‘इटरनल एम्प्लॉयमेंट’ नाम से शुरू होने वाले इस प्रोजेक्ट के पीछे की सोच बड़ी गहरी है. दरअसल ये एक सामाजिक प्रयोग है. 2017 की शुरुआत में स्वीडन की पब्लिक आर्ट एजेंसी और स्वीडिश ट्रांसपोर्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने एक नए स्टेशन की डिजाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता रखी थी. विजेता सिमोन गोल्डिन और जैकब सेनेबाय को इसके लिए 7 लाख 50 हजार डॉलर मिले. इन दोनों ने खुद को मिले इस इनाम को एक ऐसे शख्स को सैलरी देने में इस्तेमाल करने का फैसला किया, जिसका वास्तव में कुछ भी नहीं करने का जॉब होगा.

याद दिलाई अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी की थ्योरी
इस जोड़ी ने फ्रांस के अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी की उस थ्योरी की भी याद दिलायी है जिसके मुताबिक – बड़े पैमाने पर आम इंसान के ग्रोथ में रुकावट की कीमत पर ही एक छोटे-से खास वर्ग में दौलत जमा होते चली जाती है और इसके नतीजे में आखिरकार चंद धनाढ्य और बाकी के तमाम लोगों के बीच एक बड़ी खाई बन जाती है.

इन्हीं विसंगतियों की ओर ध्यान दिलाने के लिए सिमोन और जैकब ने ये तरकीब निकाली है कि एक व्यक्ति को ये काम दिया जाए कि उसे कोई काम नहीं करना है. अगर दुनिया में ऐसी स्थिति आती है, तो क्या होगा? ये जोड़ी कहती है कि कुछ लोगों को लग सकता है कि पूरी तरह से नॉन-प्रॉडक्टिव और बेमानी इस कवायद से क्या लाभ? लेकिन कई बार बे-सिर-पैर की चीजों से भी एक नई राह निकलती है.

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