पुलवामा पर टूट ही गया राहुल का सियासी संयम !

Share this on WhatsAppनई दिल्ली:  कांग्रेस को ये क्या हो गया ! पुलवामा हमले के 7 दिनों के अंदर ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस ने अपना राग ही बदल लिया ? 14 फरवरी को जब जैश के आतंकी ने सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला कर 40 जवानों की जान ले ली, तो कांग्रेस […]

नई दिल्ली:  कांग्रेस को ये क्या हो गया ! पुलवामा हमले के 7 दिनों के अंदर ऐसा क्या हो गया कि कांग्रेस ने अपना राग ही बदल लिया ? 14 फरवरी को जब जैश के आतंकी ने सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमला कर 40 जवानों की जान ले ली, तो कांग्रेस ने कहा वो सरकार के साथ खड़ी है. खुद राहुल गांधी ने कहा कि ‘ संकट की इस घड़ी में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए ’.  लेकिन ये क्या ! उनका सब्र तो एक हफ्ते में ही टूट गया.

गुरुवार की सुबह कांग्रेस ने मोदी सरकार पर ताबड़तोड़ ‘ बमबारी ’ कर दी. पहले कमान संभाली पार्टी महासचिव रणदीप सुरजेवाला ने. एक के बाद अपने तरकश से ऐसे-ऐसे तीर छोड़े कि मोदी जी अगर साउथ कोरिया नहीं होते तो आज खैर नहीं थी. 7 दिन तक बर्दाश्त की गोली खाए सुरजेवाला ने सबसे पहले पीएम मोदी के आचरण पर ही सवाल खड़े कर दिए. 2019 की महाभारत में राहुल गांधी के ‘ सारथी ’ सुरजेवाला ने दावा किया कि 14 फरवरी को जब पूरा देश जवानों पर हुए आतंकी हमले पर आंसू बहा रहा था, प्रधानमंत्री मोदी जिम कॉर्बेट में समोसा ‘ दबा ’ रहे थे. जिस पीएम को तुरंत दिल्ली पहुंच कर जवानों की सुरक्षा का जायजा लेना चाहिए वो ‘ फिल्मी पोज ’ देने और बोट में हिचकोले लेकर घड़ियालों को निहारने में व्यस्त था. सुरजेवाला ने मीडिया के सामने चीख-चीख कर पीएम मोदी को राजधर्म की दुहाई भी दी. पूछा, ये जवानों की शहादत का अपमान नहीं तो क्या है ? बोले – ‘ धिक्कार है ऐसे प्रधानमंत्री पर जो छद्म-राष्ट्रवादी होने का दावा करता है.

अब जवाब आया तो सवाल उठना लाजमी था. साहब, सब मालूम था तो इतने दिन से मौन क्यों थे ? लेकिन सुरजेवाला तो पूरी तैयारी से आए थे, इससे पहले कि कोई ऐसा पूछे, खुद कह दिया कि कांग्रेस ने ‘ सब जानते हुए संयम रखा, क्योंकि कांग्रेस आका राहुल गांधी ने सही वक्त का इंतजार करने को कहा था ’.

फिर क्या ! सही वक्त आ ही गया तो खुद राहुल क्यों पीछे रहते. ‘ सारथी ’ सुरजेवाला के बाद खुद कांग्रेस अध्यक्ष ने ‘ गांडीव ’ संभाला और धड़ाधड़ मोदी पर ‘ बाण ’ जड़ दिए. राहुल ने हमला वहां किया जहां चोट ज्यादा लगनी थी. देश भर में घूम-घूम कर पुलवामा हमले का बदला लेने की सौगंध खाने वाले पीएम मोदी को ‘ जवान-विरोधी ’ करार दिया. पूछा, 40 जवानों ने देश के लिए अपने प्राण की आहूति दे दी तो उन्हें शहीद का दर्जा क्यों नहीं ? लगे हाथ कांग्रेस चीफ राफेल और अंबानी को भी इसमें घसीट लाए. कहा, ‘ ये मोदी का नया भारत है जहां जवानों को शहीद का दर्जा भले ना मिले, अंबानी को 30 हजार का तोहफा ज़रूर मिलता है ’.

दरअसल पुलवामा हमले के बाद शांत पड़े राहुल गांधी एक तीर से दो शिकार करना चाह रहे थे. राहुल परसेप्शन के खेल में माहिर हो चुके हैं. सुनने में ये ठीक भी लगता है कि आखिर आतंकी हमले में जान दे चुके जवानों को शहीद का दर्जा क्यों ना मिले? लेकिन राहुल को ये कौन बताए कि देश कानून से चलता है. और कानून की नज़र में सब बराबर हैं. जहां आम बोल चाल में जवानों की मौत पर उन्हें शहीद कहा जाता है. सरकार ऐसा कोई दर्जा ना तो सेना में किसी को देती है और ना ही अर्धसैनिक बलों में. हां, इनको मिलने वाली सुविधाओं में जरूर अंतर है. और अर्धसैनिक बलों की ये मांग रही है कि उन्हें सेना की बराबरी की सुविधाएं मिले. रिपोर्टेस के मुताबिक केन्द्र सरकार इस संदर्भ में कार्रवाई भी कर रही है.

लेकिन राहुल गांधी को इससे क्या ! अब सरकार नरेन्द्र मोदी की है तो आरोप तो उन्हें ही झेलना होगा. मौका मिला तो कांग्रेस आलाकमान ने धावा बोल दिया. हां, वो ये ज़रूर भूल गए कि पब्लिक तो सब जानती है (और सवाल भी पूछती है). पब्लिक पूछती है ‘ सरकार तो 2014 से पहले भी देश में होती थी , कानून बदलने का अधिकार तो उसे भी था. फिर जवानों को शहीद का दर्जा क्यों नहीं दिया ?’ सवाल ये है कि फैसला तो वन रैंक, वन पेंशन पर भी लिया जा सकता था. मांग तो कई सालों से थी. लेकिन कांग्रेस की सरकारें टालमटोल करती रहीं. फिर बाजी मोदी सरकार मार ले गई तो पेट में दर्द क्यों ?

बात सीधी सी है. कांग्रेस हो या बीजेपी. राजनीति का मौका कोई नहीं छोड़ता. चुनाव सामने है तो चांस लेने का सवाल ही नहीं उठता. चाहे मामला पुलवामा हमले जैसा संवेदनशील ही क्यों ना हो. 14 फरवरी की वारदात के बाद कांग्रेस ने पहले सरकार के साथ खड़े होकर लोगों का दिल जीतना चाहा. लेकिन नरेन्द्र मोदी का चुनावी भाषण जारी रहा. फर्क सिर्फ इतना था कि अब भाषणों की शुरुआत पुलवामा हमले से होती है. मोदी बदले की कसमें खाने लगे. ‘ करारा जवाब ’ की धमकियां देने लगे. पाकिस्तान से जनता का आक्रोश बढ़ता गया. सुरक्षा में चूक के सवाल पीछे छूटते चले गए. कांग्रेस ने सोचा था लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरेंगे. लेकिन 7 दिन बीत गए और ऐसा नहीं हुआ. कांग्रेस ने फिर अपनी रणनीति बदलने का फैसला लिया. अब मोदी उसके निशाने पर हैं. शहीदों पर सियासत ठनी हुई है.

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