इस्‍तीफे की अटकलों से निकलकर राहुल गांधी ने कमबैक तो किया पर जरा देर से!

वायनाड में राहुल गांधी ने स्‍पष्‍ट संकेत दे दिया कि वह राजनीति छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं. मतलब उनके इस्‍तीफे का चैप्‍टर अब क्‍लोज हो चुका है.   

नई दिल्‍ली: 2019 लोकसभा चुनाव में हार के बाद शुक्रवार को कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी पहली बार किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में नजर आए. वायनाड में उन्‍होंने जीत के लिए अपने संसदीय क्षेत्र के लोगों का धन्‍यवाद किया और अपने चिरपरिचित अंदाज में पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा. यहां राहुल गांधी ने स्‍पष्‍ट संकेत दे दिया कि वह राजनीति छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं है. मतलब उनके इस्‍तीफे का चैप्‍टर अब क्‍लोज हो चुका है.

राहुल गांधी ने केरल में एक जनसभा के दौरान कहा कि नरेंद्र मोदी देश में नफरत फैला रहे हैं.  कांग्रेस जानती है कि नफरत से निपटने का एकमात्र रास्ता प्यार है. उन्‍होंने कहा कि हम उन लोगों को पीएम मोदी से बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जो ‘खतरे की जद’ में हैं.

2019 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस परंपरागत सीट अमेठी गंवाने के बाद राहुल गांधी टूट गए थे. उन्‍होंने सिर्फ अपनी सीट ही नहीं गंवाई बल्कि पूरे देश में कांग्रेस को सिर्फ 52 सीटें ही प्राप्‍त हो सकीं. कांग्रेस के इस बुरे प्रदर्शन की जिम्‍मेदारी उन्‍हीं की थी, यही कारण रहा कि हार के तुरंत बाद उन्‍होंने इस्‍तीफे की पेशकश कर डाली. काफी दिनों तक राहुल गांधी इस पर अड़े भी रहे.

कांग्रेस सूत्रों के हवाले से छन-छनकर लगातार खबरें आती रहीं कि राहुल गांधी नहीं मान रहे हैं. राहुल गांधी ने पार्टी नेताओं से कह दिया है कि उनका विकल्‍प तलाश करें. उधर, मीडिया के सामने गांधी के परिवार का हर वफादार सामने आकर ये कहता दिखाई दिया कि राहुल गांधी इस्‍तीफा न दें, यह केवल उनकी हार नहीं है. उन्‍होंने बहुत अच्‍छी लड़ाई लड़ी, वगैरह…वगैरह.

इसी क्रम में कई बार कांग्रेस नेताओं की प्रेस कॉन्‍फ्रेंस हुईं और बार-बार राहुल गांधी के इस्‍तीफे की खबरों का खंडन किया.

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वायनाड में राहुल गांधी ने सीधे कुछ नहीं कहा, पर सबकुछ कह दिया 

राहुल गांधी ने इस्‍तीफों की अटकलों पर अब तक एक बार भी खुद कुछ नहीं कहा. हां, प्रियंका गांधी ने जरूर एक बार कहा, ‘मेरा भाई 15 साल से अकेला लड़ रहा है. किसी ने उसका साथ नहीं दिया.’  शुक्रवार को वायनाड में भी राहुल गांधी ने कहा इस्‍तीफे पर तो कुछ नहीं कहा, लेकिन जिस अंदाज में उन्‍होंने पीएम नरेंद्र मोदी पर निशाना साधा और कहा, ‘कांग्रेस पार्टी उन लोगों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है जो पीएम मोदी के ‘खतरे की जद’ में हैं.’

स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस में राहुल गांधी के इस्‍तीफे का चैप्‍टर अब क्‍लोज हो चुका है, लेकिन राहुल गांधी इस बार भी लेट हो गए. राहुल गांधी के इस्‍तीफे की अटकलों के दौर में राजस्‍थान, महाराष्‍ट्र जैसे राज्‍यों में पार्टी के भीतर अफरा-तफरी मच गई. इतना ही नहीं, तेलंगाना में तो पार्टी के 18 में से 12 विधायकों ने टीआरएस का दामन थाम लिया.

राहुल गांधी के लेट होने पर जोर इसलिए दे रहा हूं, क्‍योंकि उनके राजनीतिक करियर में कई फैसले में लेने में अब तक वह लेटलतीफी दिखाते रहे हैं. मसलन पार्टी अध्‍यक्ष पद संभालना हो या सक्रिय राजनीति में उतरना, 2019 चुनाव प्रचार में भी वह देर से ही उतरे, नरेंद्र मोदी उनसे पहले प्रचार शुरू कर चुके थे. कांग्रेस अध्‍यक्ष पद संभालने के बाद से पार्टी में जरूरी बदलावों को भी वह टालते गए.

बेहतर होता कि मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री पद रहते हुए जब घोटालों की गूंज पूरे देश में उठ रही थी, तब कांग्रेस के अंदर से राहुल गांधी को पीएम बनाने की मांग उठी थी. तब पीएम बनने की उनकी लालसा नहीं, लेकिन जब तक उन्‍होंने पीएम बनने का सपना देखा तब तक देर हो चुकी थी, पार्टी सत्‍ता से बाहर हो गई और अब तो हाल यह है कि नेता प्रतिपक्ष का हक मिलने लायक भी सीटें नहीं रह गई हैं.

वैसे पुरानी कहावत है, ‘देर आए दुरुस्‍त आए’, अब देखना होगा कि राहुल गांधी पुरानी गलतियों को कब तक और कैसे दुरुस्‍त करते हैं.

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