कहानी बिहार चुनावों की : जानिए कैसे शुरू हुआ बाहुबल के इस्तेमाल का दौर

बात 25 फरवरी 1957 की है. बिहार में दूसरे विधानसभा चुनाव के लिए मतदान शांतिपूर्ण तरीके चल रहा था जिसमें बेगूसराय सीट भी शामिल थी. रचियाही गांव के कछहरी टोला बूथ पर अचानक एक उग्र भीड़ ने हमला बोल दिया और फिर...

भारत की राजनीति में बिहार का अहम् योगदान शुरू से ही रहा है. 1952 के पहले विधानसभा चुनाव के बाद संविधान की अवहेलना करते हुए उपमुख्यमंत्री पद के निर्माण का श्रेय अगर बिहार को जाता है तो ठीक उसके पांच साल बाद बिहार से ही बूथ कैप्चरिंग परंपरा की ऐसी शुरुआत हुई जो आने वाले दिनों में पूरे देश में एक नासूर के तरफ फ़ैलती चला गई.

बात 25 फरवरी 1957 की है. बिहार में दूसरे विधानसभा चुनाव के लिए मतदान शांतिपूर्ण तरीके चल रहा था जिसमें बेगूसराय सीट भी शामिल थी. रचियाही गांव के कछहरी टोला बूथ पर अचानक एक उग्र भीड़ ने हमला बोल दिया. मतदान अधिकारियों को धमकी देकर चुप करा दिया गया.

उग्र भीड़ के कुछ सदस्य मतदान बूथ के अंदर गए, सारे बैलट पेपर को कब्ज़े में ले लिया और शुरू हो गया उनपर ठप्पा लगाने का काम. भीड़ के बाकी सदस्य बाहर थे, जिनका काम था मतदाताओं को डरा-धमका कर मतदान केंद्र से दूर रखना. आनन -फानन में कछहरी टोला बूथ पर मतदान संपन्न हो गया, और साथ में शुरू हो गयी भारत में प्रजातंत्र की हत्या का एक निंदनीय सिलसिला.

यहां से चुनाव में बाहुबल के इस्तेमाल की एक ऐसी प्रथा की शुरुआत हुई जिसने भारत में प्रजातंत्र की जड़ों को झकझोर कर रख दिया. बाहुबल का प्रयोग कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने किया थी पर सफलता मिली बेगूसराय से कांग्रेस पार्टी के प्रत्याशी सरयू प्रसाद सिंह को.

बाहुबली खुद भी चुनाव लड़ने की मंशा रखने लगे

बेगूसराय वैसे भी बाहुबलियों के कारण कुख्यात रहा है. आने वाले वर्षों में बेगूसराय के बाहुबली कामदेव सिंह सरीखे बाहुबलियों को बिहार के दूसरे हिस्सों से मुंहमांगी कीमत दे कर बूथ कैप्चर करने के लिए लाया जाता था. बूथ कैप्चरिंग अपने आप में एक इंडस्ट्री बन गया, जो चुनाव के दिनों में सक्रिय हो जाता था.

जाहिर सी बात है कि बाहुबली चुनाव जिता सकने की क्षमता रखते थे. उनके मुंह राजनीति के खून का चस्का भी लग गया था तो आने वाले वर्षो में बाहुबली खुद भी चुनाव लड़ने की मंशा रखने लगे. चुनाव में जिसकी लाठी, उसकी भैंस प्रचलन की नींव 1957 के बिहार विधानसभा चुनाव में ही रखी गई थी.

1957 में 330 सीटों के बजाय 318 सीटों पर चुनाव हुआ

1957 चुनाव में बिहार में कुल सीटों की संख्या कम हो गई. 1956 में राज्यों का पुनर्गठन किया गया जिसमें बिहार के 12 विधानसभा क्षेत्र पश्चिम बंगाल में शामिल किए गए और 1957 में 330 सीटों के बजाय 318 सीटों पर चुनाव हुआ.

यह आखिरी मौका था जब 54 सीटों से दो-दो प्रत्याशी चुने गए. कांग्रेस पार्टी 210 सीट जीत कर सत्ता में काबिज़ रही, हालांकि कांग्रेस पार्टी को 1951-52 के मुकाबले 29 सीटों का नुकसान हुई.

सीपीआई ने भी बिहार की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की

इस चुनाव में सभी समाजवादी शक्तियां इकट्ठी हो गईं और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी नाम की एक नई पार्टी का गठन हुआ जिसने 31 सीटों पर विजय पताका फहरा कर यह साबित कर दिया कि समाजवादियों की पकड़ बिहार के राजनीति में दिन प्रतिदिन मजबूत होती जा रही थी.

सीपीआई ने भी बिहार की राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की. 24 के मुकाबले इसबार 60 सीटों पर पार्टी ने प्रत्याशी उतारे और सीपीआई सात सीट जीतने में सफल रही.

स्थानीय दलों का ही दबदबा बना रहा

एक बार फिर से दक्षिण बिहार ने ये साबित कर दिया की उनकी मंशा एक अलग राज्य की स्थापना की है. वहां स्थानीय दलों का ही दबदबा बना रहा. झारखंड पार्टी को एक सीट का नुकसान हुआ और झारखंड पार्टी 31 सीटें जीतने में कामयाब रही. छोटानागपुर और संथाल परगना जनता पार्टी 1952 के मुकाबले 12 सीटों का इजाफा करते हुए 23 सीट जीतने में सक्षम रही. बिहार ने एक बार फिर से साबित कर दिया की हिन्दुवाद उनके लिए कोई मुद्दा नहीं था.

भारतीय जनसंघ 30 सीटों पर चुनाव लड़ी

भारतीय जनसंघ 30 सीटों पर चुनाव लड़ी पर उनकी जीत का सिलसिला शुरू ना हो सका. भारत को आज़ादी मिलने के नौ साल बाद 1957 का चुनाव हुआ, और अब तक यह स्पष्ट हो चुका था कि गरीब किसान और मजदूर कांग्रेस पार्टी की नीतियों से नाखुश थे. सीपीआई का सात सीटों के साथ खाता खोलना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण था.

बिहार में कांग्रेस पार्टी के कमजोर होने का सिलसिला

चुनाव के कुछ महीनों बाद ही उपमुख्यमंत्री डॉ. अनुग्रह नारायण सिन्हा का निधन हो गया और श्रीकृष्ण सिंह अपनी आखिरी सांस तक बिहार के मुख्यमंत्री पद पर बने रहे. 31 जनवरी 1961 को श्रीकृष्ण सिंह का निधन हो गया और वहीं से शुरू हुआ बिहार में कांग्रेस पार्टी के कमजोर होने का सिलसिला जो आजतक जारी है.

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