डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए

चंद आंकड़ों पर गौर करते हैं. 2019 में देश के 17 राज्यों ने बाढ़ की तबाही झेली. 1600 से ज्यादा लोग मारे गए. 2018 की बाढ़ से देश (Flood in India) को 95,736 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ.
reality and real situation of flood, डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए

ऑन कैमरा तबाह होते लोग. डूबता इंसान. बहती गाड़ियां. कहीं किसी टापूनुमा जगह पर फंसी आबादी. सीने तक पानी में डूबकर पीड़ा बयां करता कोई गरीब. ‘जूम इन’ के जरिये उस गरीब की आंखों में आंसू तलाशता कैमरा. बुझे हुए चूल्हे. खाली बर्तन, मैले-कुचैले कपड़ों में कातर आंखों से कैमरे को निहारते छोटे-छोटे बच्चे. कुछ अपवाद जरूर हैं, फिर भी टीवी मीडिया की नजर में कमोवेश इसी का नाम बाढ़ है. लेकिन क्या यही बाढ़ है?

चंद आंकड़ों पर गौर करते हैं. 2019 में देश के 17 राज्यों ने बाढ़ की तबाही झेली. 1600 से ज्यादा लोग मारे गए. 2018 की बाढ़ से देश को 95,736 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ. 1808 लोगों ने अपनी जान गंवा दी. 2020 की तबाही अभी जारी है. मौजूद साल के पूरे आंकड़े बाद में आएंगे. 1953 से अब तक औसतन हर साल बाढ़ की वजह से 1650 से ज्यादा लोगों की जान अपने देश में चली जाती है.

हर साल होता है इतने करोड़ का नुकसान

हर साल आम लोगों की 3,600 करोड़ से ज्यादा की संपत्ति बाढ़ बहाकर ले जाती है. अकेले असम में करीब 1.25 लाख लोग ऐसे हैं, जो बाढ़ की वजह से घर-बार और खेती की जमीन गंवा चुके हैं. ये सरकारी आंकड़े हैं. और आपदाओं से होने वाले नुकसान के सरकारी आंकड़े अक्सर वास्तविक नुकसान से कम ही होते हैं. अलग-अलग राज्यों के बाढ़ से जुड़े ऐसे आंकड़ों की बड़ी लंबी फेहरिस्त है.

reality and real situation of flood, डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए
PS- ANI

कुल मिलाकर रोना इस बात का है कि बाढ़ की तबाही पर रोने-धोने के लिए मीडिया का सिर्फ ‘मानसून सत्र’ ही क्यों आयोजित होता है? कैमरों को बस विजुअल की तलाश क्यों होती है? जनप्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारियों के लिए झकझोरने का अंदाज कहां है?

समाधान की उम्मीद ही समाप्त

मीडिया का रियलिटी शो – न्यूज चैनल्स का एंकर किसी वर्चुअल टापू पर खड़ा है. मानो जलप्रलय के बीच घिरा है. एकदम सूटेड-बूटेड है. उन्हें पता है कि बाढ़ का विकराल रूप प्रस्तुत करने का ये सबसे सस्ता तरीका है. बेशक ये छिछला है.

इन समाचार चैनल्स को सिर्फ सस्ते मनोरंजन का माध्यम मान चुका दर्शक वर्ग चमत्कृत है. लेकिन अभी भी इनसे उम्मीदें लगाए बैठा तबका हैरान है. जबकि बाढ़ की विभीषिका झेलने वाले लाखों-करोड़ों देशवासी परेशान हैं. उनके मुद्दे या तो गायब है या इतने विकृत रूप में पेश किए जा रहे हैं कि समाधान की उम्मीद ही समाप्त है.

बाढ़ की रियलिटी – उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और असम. इन चार राज्यों की एक जैसी समस्या है. हिमालय की नदियों से आने वाला पानी इन राज्यों में हर साल तबाही मचाता है. सरकारी फाइलों में इस आपदा को रोकने के लिए योजनाओं की कमी नहीं है. मगर हालात बदलते क्यों नहीं, ये सवाल कभी भी उतने अहम नहीं हैं. हर साल आने वाले इतने भीषण संकट को लेकर हम कितने गंभीर हैं?

reality and real situation of flood, डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए

करीब ढाई दशक से नहीं बनी बाढ़ प्रभावित इलाकों की नई लिस्ट

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हमने करीब ढाई दशक से बाढ़ प्रभावित इलाकों की नई लिस्ट ही नही बनाई. जबकि इन वर्षों में बाढ़ का पूरा पैटर्न ही बदल गया है. कई नए इलाके बाढ़ प्रभावित इलाकों के दायरे में शामिल हो चुके हैं. इनमें कई शहर भी शामिल हैं. आज भी जब देश के कुल बाढ़ प्रभावित इलाकों की बात होती है, तो कहा जाता है कि देश का करीब 4 से 5 करोड़ हेक्टेयर इलाका बाढ़ प्रभावित है. और ये देश की कुल भूमि का 12 फीसदी हिस्सा है. जबकि वास्तविक हालात कुछ और हैं.

हालात को समझिए. सितंबर का महीना दाखिल हो चुका है. उत्तरी राज्यों की तो छोड़िए, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई सारे इलाके पानी में डूबे हैं. 2018 के अगस्त महीने में केरल में आई तबाही से राज्य को 30 हजार करोड़ का आर्थिक नुकसान हुआ था. 433 लोग अपनी जान गंवा बैठे थे.

पीड़ितों की पीड़ा को कैमरे में कैद करने की कोशिश

मीडिया का रियलिटी शो- इन्हीं हालात के बीच भांति-भांति प्रकार की रिपोर्टिंग हो रही है. पीड़ितों का दर्द बांटने, उन तक मदद पहुंचवाने से ज्यादा उनकी पीड़ा को कैमरे में कैद और फिर त्रासदी की तस्वीरों को कैश करने की कोशिश है. हर साल ऐसी तबाही की वजहें बताने और जिम्मेदारी तय करने से ज्यादा जल्दी ये बताने की है कि इन तक पहुंचकर हमने कितना महान काम किया है. दर्शकों और पीड़ितों को बताया जा रहा है कि आपकी खातिर हमने कितना जोखिम उठाया है.

reality and real situation of flood, डूबती जान को तलाशते कैमरे… बाढ़ के रियलिटी शो और बाढ़ के रीयल हालात में कितना फर्क जानिए
flood like situation in Bihar

बाढ़ की रियलिटी- इस वक्त अकेले असम और बिहार में करीब सवा करोड़ लोग बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं. इन दो राज्यों में करीब 200 लोग जान गंवा चुके हैं. यूपी के सैकड़ों गांव डूबे हुए हैं. महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई के लिए तबाही हर साल की नीयति है. शहरी इलाकों में बाढ़ की सबसे बड़ी वजह जर्जर ड्रेनेज सिस्टम और वाटर बॉडीज (झीलों, जलाशयों, तलाबों) पर अवैध कब्जे हैं. इन दोनों ही चीजों के लिए जिम्मेदार लोग और सिस्टम मीडिया की आंखों (कैमरे) के बिल्कुल सामने है. लेकिन इनके खिलाफ कोई निर्णायक अभियान का आज तक इंतजार है.

मीडिया का रियलिटी शो – जब से टीवी वालों ने बाढ़ को बिकने लायक उत्पाद समझा है, तब से इसके लिए एक से बढ़कर एक विशेषण गढ़े गए हैं. ये विशेषण बाढ़ की भयावहता को बयां करने के लिए हैं- जलदैत्य, प्रलयंकारी, जलजला, सैलाब, उफान, समंदर, विनाशलीला, तबाही का मंजर, विभीषिका, जल प्रलय. कुछ शब्द हालात से मेल भी खाते हैं. कुछ हास्यास्पद हैं तो कुछ संदर्भों से परे भी. लेकिन बाढ़ पर आयोजित मीडिया के रोने-धोने के ‘मॉनसून सत्र’ को प्रमोट करने में ये कारगर जरूर रहे हैं.

तबाही झेलने वाले करोड़ों लोगों की त्रासदी की वजह कौन है?

बाढ़ की रियलिटी – टीवी पर बाढ़ में फंसे कुछ लोगों की जान बचाकर निकालती एनडीआरएफ की टीम देवदूत है. हां है. उनका काम काबिले-तारीफ है. बिल्कुल है. लेकिन हर साल बाढ़ की तबाही झेलने वाले करोड़ों लोगों की त्रासदी की वजह कौन है? क्या बड़ा सवाल ये नहीं है? हर वर्ष टापूनुमा हालात में बदलने को मजबूर देश के हजारों गांवों में पहुंचती आधी-अधूरी सरकारी मदद कैमरे पर जरूर दिखती है. इसके लिए अपनी ही पीठ थपथपाते स्थानीय जनप्रतिनिधि भी दिखते हैं. बस नहीं दिखता है, तो इस पीड़ा का स्थायी समाधान.

कभी सूखा पड़ेगा. कभी उम्मीदों से बहुत ज्यादा बारिश होगी. प्रकृति के फैसले पर हमाराजोर नहीं है. लेकिन इनसे होने वाले नुकसानों को कम करना हमारे हाथ में जरूर है. जब हम सामरिक, आर्थिक, बौद्धिक और तमाम मोर्चे पर ये ऐलान करते हैं कि ये साठ-सत्तर या अस्सी के दशक का भारत नहीं है, तो फिर हर साल बाढ़ की त्रासदी झेलते करोड़ों भारतीयों की तरफ से एक सवाल जरूर बनता है. इनके लिए आखिर भारत आज भी पचास-साठ के दशक वाला क्यों दिखता है?

Related Posts