प्रधानमंत्री जी, सफाई कर्मचारियों के पैर धोने के लिए आपको सलाम, अब इन्हें गटर और गुरबत से भी निकालिए..

कुंभ में डुबकी लगाने के बाद सफाई कर्मचारियों के पांव धोते पीएम मोदी की तस्वीर सांकेतिक भी है और अहम भी . सांकेतिक इसलिए कि शायद पहली बार ऐसी तस्वीर देश के सामने आई है कि कोई पीएम जमीन पर बैठकर समाज के सबसे निचले पायदान वाली जमात को कुर्सी को बैठाकर उनका पांव धो […]

कुंभ में डुबकी लगाने के बाद सफाई कर्मचारियों के पांव धोते पीएम मोदी की तस्वीर सांकेतिक भी है और अहम भी . सांकेतिक इसलिए कि शायद पहली बार ऐसी तस्वीर देश के सामने आई है कि कोई पीएम जमीन पर बैठकर समाज के सबसे निचले पायदान वाली जमात को कुर्सी को बैठाकर उनका पांव धो रहा है . अहम इसलिए क्योंकि देश के शहर , गांव ,गली , मोहल्ले से लेकर हमारे -आपके घरों की साफ -सफाई करने का जिम्मा जिन पर है , उन्हें सम्मान तो क्या , ठीक से गुजारे लायक पैसे ही नहीं मिलते हैं लेकिन पीएम उनके पांव पखार रहे हैं.

इस लिहाज से देखें तो वीडियो कैमरे की मौजूदगी में पीएम मोदी ने कांसे की थाली में उनके पांव रखकर अपने हाथों से जिस तरह धोने का सांकेतिक उपक्रम किया है , उसे देखकर पीएम मोदी को चाहने वाले उनके इस ‘सांकेतिक आयोजन’ पर लहालोट हुए जा रहे हैं . कोई इसे ऐतिहासिक दृश्य करार दे रहा है तो कोई सफाई कर्मचारियों को लेकर पीएम मोदी की नेकनियति पर फिदा होकर उन्हें महामानव घोषित कर दे रहा है . यकीनन मोदी ने सफाई कर्मचारियों के पांव धोकर उन्हें जो सम्मान बख्शा है , वो काबिल ए गौर है लेकिन कैमरे के सामने बनती ऐसी तस्वीरों पर न्यौछावर होने की लीक से हटकर संक्षिप्त में सफाई कर्मचारियों की हालत को समझ लें .

सफाई कर्मचारियों के बीच काम करने वाले संगठनों का कहना है कि मोदी सरकार स्वच्छ भारत मिशन की योजना में भी सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा की चिंता नदारद है . ‘सफाई कर्मचारी आंदोलन’ से जुड़े बेजवाडा विलसन ने इंडिया टुडे को बताया, ‘मोदी सरकार टॉयलेट निर्माण के लिए हजारों करोड़ आवंटित करती है, लेकिन ये मैनुअली सफाई करने वालों के पुनर्वास के लिए पर्याप्त मुआवजा देने में नाकाम रही है. पिछले बजट में इसके लिए महज 5 करोड़ रुपये रखे गए.’ विलसन के मुताबिक ‘ स्वच्छ भारत अभियान को लॉन्च हुए भी चार साल हो गए हैं, लेकिन प्रधानमंत्री की ओर से किसी भी सफाई कर्मी की मौत को लेकर कुछ नहीं बोला गया. विलसन ने कहा, ‘प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा के लिए वो क्या करने जा रहे हैं?’इंडिया टुडे की उस चिट्ठी तक पहुंच है, जिसके मुताबिक लाखों सफाई कर्मचारियों के कल्याण के लिए बना आयोग दंतहीन लगता है.

गटर में घुटती जिंदगी

तो इसका मतलब ये हुआ कि टीवी कैमरे के सामने सफाई कर्मचारियों के चरण धोने और मीडिया में वायरल होने भर से उनका उद्धार नहीं होगा . देश के शहरों के गटर में हर सैकड़ों सफाई कर्मचारी गैस में घुंटकर मर जाते हैं या मरते मरते बच जाते हैं . ‘ सफाई कर्मचारी आंदोलन’ नाम के इस एनजीओ के मुताबिक पिछले साल जनवरी से सितंबर तक में ही 221 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई . अकेले दिल्ली में सितंबर महीने में छह कर्मचारियों की मौत हुई थी , जिस पर कई दिनों तक हंगामा मचा रहा कि देश की राजधानी में अब तक ऐसे इंतजाम क्यों नहीं हुए कि गटर में ऐसी मौतें न हो . अकेले गुजरात में पांच सालों के दौरान 86 कर्मचारियों की मौत मैनहोल में हुई . सबसे ताज्जुब की बात तो ये है कि उनमें से 49 के परिवारों को अभी तक पहचान के संकट के कारण मुआवजा तक नहीं मिला है . गटर में मरने वाले इन 86 कर्मचारियों में से 53 तो अहमदाबाद के कर्मचारी थे . दिल्ली में भी कुछ दिनों पहले कई सफाई कर्मचारी ऐसे गटर में घुंटकर बेमौत मारे गए . उनका बिलखता परिवार आज भी कहीं बिलख रहा होगा . जिस सड़ांध के पास आप एक सेकेंड नहीं गुजार सकते , उस सड़ांध में उतरकर ये कर्मचारी सफाई करते हैं और कई बार मारे जाते हैं . चिंता करनी है तो इनकी करिए कि कैसे इतनी गंदगी के बीच जहरीली गैस में घुंसकर ऐसे बेमौत न मारे जाएं .

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ‘ मोदी सरकार की स्वच्छ भारत अभियान पर 50 हजार करोड़ रुपये खर्च करने की योजना है. इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों के घरों में 9 करोड़ टॉयलेट बनाना है, ताकि गावों को ‘खुले में शौच’ से पूरी तरह मुक्त किया जा सके. सरकार का दावा है कि देशभर में मिशन के तहत अब तक आठ करोड़ टॉयलेट बनाए भी जा चुके हैं. लेकिन योजना में सफाई कर्मियों की सुरक्षा के लिए बजट का कोई प्रावधान नहीं है. जाम सीवरों को खोलने के लिए देश में करीब आठ लाख सफाई कर्मचारी हैं, लेकिन उनको लेकर बहुत कम आंकड़े उपलब्ध हैं.

विलसन ने बताया कि इन सफाई कर्मियों में से 98 फीसदी अनुसूचित जाति से और महिलाएं हैं. इस सबंध में राज्य सरकारों का रवैया भी निराशाजनक रहा है. आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में साल 2013 से अब तक 39 सफाई कर्मियों की मौत हुई है. इनमें से सिर्फ 16 मामलों में ही परिजनों को 10-10 लाख रुपये मुआवजा दिया गया.

स्वच्छता अभियान से सीवर साफ करने वालों को फायदा नहीं

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक – ‘ सफाई कर्मचारी आंदोलन के वेजवाडा विल्सन कहते हैं कि प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान से सीवर साफ करने वालों को कोई फायदा नहीं हो रहा है. मैग्सेसे पुरस्कार विजेता विल्सन की संस्था दलितों और मैला उठाने वालों के लिए काम करती है. वे कहते हैं कि नियम के तहत इन्हें सीवर लाइन में उतारने की सख्त मनाही है . सिर्फ मशीन से ही सफाई का नियम है लेकिन इन्हें आज भी बिना किसी सुरक्षा और उपकरण के गटर में उतारा जा रहा है . विल्सन बताते हैं कि, ‘वर्ष 2000 से 1760 लोगों की गटर-सीवर साफ करते हुए मौत हो चुकी है  यानी औसतन हर वर्ष 97. हमने हर केस पर संबंधित मुख्यमंत्री, मंत्री, राज्यपाल और स्थानीय प्रशासन को पत्र लिखे हैं . मैं जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग कर चुका हूं लेकिन ऐसे मामलों में आज तक एक भी जिम्मेदार को सजा नहीं हुई है . इस पर हमारी संस्था ने केन्द्र सरकार से लेकर राज्य सरकार तक कई आरटीआई फाइल की है . इनमें पता चला कि किसी भी राज्य की पुलिस ने इस मामले में एक भी चार्जशीट फाइल नहीं की . उल्टा सरकार के पास पूरा डेटा नहीं है . सरकारी आंकड़ों के अनुसार इन सालों में केवल 323 मौतें हुई हैं.’

तो जब तक सफाई कर्मचारियों के लिए कल्याणकारी योजनाएं नहीं बनती और उनपर ठीक से अमल नहीं होता , तब तक कैमरो के सामने ऐसे सांकेतिक और प्रचारात्मक वीडियो तैयार कर देने भर से उनकी दशा नहीं बदलने वाली है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)