फेल नहीं हुआ चंद्रयान-2 मिशन, ऑर्बिटर करेगा सारे काम

चंद्रयान जहां लैंड कर रहा था चांद का वो दक्षिणी ध्रुव सबसे ज्यादा जोखिम भरा स्थान है. वहां आज से पहले किसी ने नहीं छुआ था लेकिन दक्षिणी ध्रुव को छूना जरूरी था.

आखिरी के 2.1 किलोमीटर में अड़चन क्या आई, कई लोगों के स्वर बदल गए. के सिवन और इसरो का मजाक उड़ाया जाने लगा. लॉन्च से पहले पूजा पाठ किए जाने पर सारा दोष डाल दिया गया. जो लोग साइंस का S नहीं जानते वो इसरो के महान वैज्ञानिकों पर सवाल उठाने लगा.

इन नासमझों को कौन बताए कि के. सिवन ही वो महारथी हैं जिनकी देखरेख में इसरो ने साल 2017 में एक साथ 104 सैटेलाइट लॉन्च किए थे जो एक विश्व रिकॉर्ड है और जिसे तोड़ना दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों के लिए चुनौती बना हुआ है.

‘इसरो को मानव कल्याण से जोड़ा’

के. सिवन की पूजा पर सवाल उठाने वाले अंध आलोचकों को जानना चाहिए कि पीएसएलवी को आधुनिक बनाने का श्रेय भी पूजा पाठ करने वाले के. सिवन को जाता है जो इसरो के हर मिशन का आधार बनता है. भगवान में आस्था रखने वाले के. सिवन ही हैं जिन्होंने इसरो को सीधा मानव कल्याण से जोड़ा है.

के. सिवन के विजन के कारण ही मेडिकल फील्ड से लेकर डिफेंस फील्ड तक में इसरो की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. हाल ही में जब उड़ीसा में चक्रवात आया तो स्पेस साइंस की मदद से ही 10 लाख लोगों की जान बचाई गई थी. मानवता के लिए इसरो समर्पित है और आगे भी रहेगा.

‘दक्षिणी ध्रुव को छूना जरूरी था’

जिस के. सिवन के पास बचपन में चप्पल खरीदने के पैसे ना थे, जिसने पिता के साथ खेती करके अपनी पढ़ाई पूरी की है उस पर सवाल उठाने से पहले ये तो जान लेना चाहिए था कि चंद्रयान आखिर कहां चूका? और चूका भी है या नहीं?

दरअसल चंद्रयान जहां लैंड कर रहा था चांद का वो दक्षिणी ध्रुव सबसे ज्यादा जोखिम भरा स्थान है. वहां आज से पहले किसी ने नहीं छुआ था लेकिन दक्षिणी ध्रुव को छूना जरूरी था क्योंकि पहली बार चंद्रयान-1 ने इसी स्थान पर पानी का पता लगाया था जिसका क्रेडिट बाद में नासा हड़पना चाहता था.

‘लैंडर के अंदर कोई पायलट नहीं बैठा’

के. सिवन अगर सफलता के भूखे होते तो चांद के किसी आसान स्थान पर लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग करा देते लेकिन ये मानवजाति के साथ धोखा होता इसलिए इसरो ने तय किया कि सबसे कठिन स्थान पर लैंड किया जाएगा क्योंकि वहीं पानी मिल सकता है.

इसरो की पूरी टीम ये जानती थी कि सॉफ्ट लैंडिंग के आखिरी 15 मिनट ही सबसे ज्यादा मुश्किल भरे होंगे क्योंकि लैंडर के अंदर कोई पायलट नहीं बैठा है उसे कंट्रोल करना मुश्किल होगा और चांद का गुत्वाकर्षण लैंडिंग को और कठिन बना देता है.

‘चंद्रयान में 5 इंजन थे’

सॉफ्ट लैंडिंग का सफलता प्रतिशत करीब 35 फीसदी है. पूजा पाठ पर सवाल उठाने वाले आलोचकों को शायद ही पता होगा कि चंद्रयान में 5 इंजन थे चार इंजन कोने में और प्रमुख इंजन बीच में था.

जिस वक्त चंद्रयान से संपर्क टूटा उस वक्त प्लान के हिसाब से बीच वाला प्रमुख इंजन बंद रहा होगा जिसे तब स्टार्ट किया जाना था जब चंद्रयान चांद की सतह के काफी करीब पहुंच जाता करीब 100 मीटर की दूरी पर इस कारण ज्यादातर एक्सपर्ट मान रहे हैं कि कहीं ना कहीं चंद्रयान के इंजन में कोई खराबी आई होगी.

‘इसरो की रिपोर्ट से सच सामने आएगा’

वहीं कुछ अपने अनुभव से ये भी बोल रहे है कि जब चंद्रयान चांद की सतह के करीब पहुंचा होगा तो चांद की धूल भी एक समस्या हो सकती है जो लैंडर को उसके मार्ग से भटका दे लेकिन अभी पुष्टि के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता है. जांच के बाद ही इसरो की रिपोर्ट से सच सामने आएगा.

चंद्रयान के बजट को फिजूल बताने वाले शायद जानते नहीं हैं कि हमारे चंद्रयान का बजट स्पेस पर ही बनी हॉलीवुड फिल्म इंटरस्टेलर से भी कम था. चंद्रयान का बजट करीब 1000 करोड़ था जबकि हॉलीवुड की फिल्म 1062 करोड़ में बनी थी. ये पूजा पाठ करने वाले के.सिवन की काबिलियत नहीं तो और क्या है?

‘कितनी ही सफलता इसरो के साथ जुड़ी’

अगर सिर्फ इसरो की बात करें तो चंद्रयान वन, मंगलयान, 104 सैटेलाइट को एक साथ लॉन्च करना, जीएसएलवी मार्क-3 का सफल प्रक्षेपण, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम यानी GPS जैसी क्षमता हासिल करना, भारत की तीसरी आंख Cartosat-2 Series के Satellite Cartosat-2F का सफल परीक्षण करना जैसी कितनी ही सफलता इसरो के साथ हाल के कुछ सालों में जुड़ी हैं.

‘हिंदुस्तान को ताकतवर बनाने का संकल्प लिया’

अगर आने वाले वर्षों की बात करें तो गगनयान, चंद्रयान-3 और स्पेस स्टेशन बनाने तक की योजना पर इसरो तेजी से काम कर रहा है. ये सब इसरो के पूजा पाठ करने वाले वैज्ञानिकों की काबलियत से हो रहा है जो चाहते तो नासा में मोटी सैलरी लेकर बैठ जाते लेकिन उन्होंने हिंदुस्तान को ताकतवर बनाने का संकल्प लिया है. आलोचना ठीक है लेकिन किसी की निजी आस्था का मजाक उड़ाने से पहले उसके त्याग को समझना चाहिए.

‘एक साल तक चांद की सतह पर रिसर्च’

चंद्रयान फेल नहीं हुआ है क्योंकि लैंडर से पहले ही अलग चुका ऑर्बिटर चांद की सतह से 100 किलोमीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर लगातार चक्कर लगा रहा है जो अगले एक साल तक चांद की सतह पर रिसर्च करता रहेगा. चंद्रयान वन के ऑर्बिटर ने ही चांद की सतह पर पानी की मौजूदगी का पता लगाया था.

इस बार तो ऑर्बिटर की नजर चांद के उसी दक्षिणी कोने पर है जहां तापमान -250 डिग्री तक चला जाता है जहां बर्फ से लेकर जीवश्म तक मिल सकते हैं यानि कोई बड़ी खोज जरूर होगी. के. सिवन के मुताबिक अगले 14 दिनों तक लैंडर से संपर्क साधने की कोशिशें जारी रहेंगी.

‘चंद्रयान-2 किसी भी लिहाज से फेल प्रोजेक्ट नहीं’

लैंडर का काम 14 दिन का ही था क्योंकि उसी दौरान चांद पर दिन होता और रोवर को रिसर्च करने में मदद मिलती, सोलर एनर्जी के इस्तेमाल से चार्जिंग भी संभव होती. 15वें दिन के बाद तो ऑर्बिटर ही आंकड़े और तस्वीरें भेजता जो काम अभी भी जारी रहेगा.

हां, ये जरूर है कि लैंडर से रोवर को निकलता देखकर हर हिंदुस्तान के चेहरे पर गर्व की मुस्कान आ जाती जो इस बार संभव नहीं हुआ पर चंद्रयान-2 किसी भी लिहाज से फेल प्रोजेक्ट नहीं है.

‘अगले प्रोजक्ट को सफल बनाने में मदद मिलेगी’

जैसा कि महान वैज्ञानिक एडीसन ने कहा था कि वो बल्ब का अविष्कार करते समय 100 बार फेल नहीं हुए बल्कि उनको पता चला कि वो कौन से 100 तरीके हैं जिससे बल्ब नहीं बनाया जा सकता है उसी तरह से इस बार जो भी गड़बड़ी हुई उससे इसरो को अगले प्रोजक्ट को सफल बनाने में मदद मिलेगी.

‘कई साल बाद देश में साइंस को पर्व की तरह मनाया गया’

चंद्रयान हमारा गर्व था है और रहेगा. के.सिवन और उनकी पूरी टीम को बहुत बहुत बधाई. और मेरे हिसाब से चंद्रयान-2 का सबसे ज्यादा लाभ रहा कि देश के बच्चे इस बार क्रिकेट मैच या फिर किसी वेब सीरिज के इंतजार में नहीं बल्कि विज्ञान की सफलता को देखने के लिए आधी रात तक जगे हुए थे.

कई साल बाद देश में साइंस को पर्व की तरह मनाया गया है. यही बच्चे आने वाले युग के कलाम, कल्पना चावला या के.सिवन बनेंगे. एक विकासशील देश के लिए इससे बड़ी सफलता और क्या होगी.