Video: CM नीतीश कुमार मौन, सुशील मोदी चुप, मासूमों की मौत का ज़िम्मेदार कौन?

सुशील मोदी ने ट्विटर पर तो बच्चों की मौतों को प्राकृितक आपदा कह दिया लेकिन कैमरों के सामने कुछ भी कहने से बचते रहे. वहीं सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कैमरों के सामने खामोश हैं.

पटना: इन्सेफेलाइटिस या चमकी बुखार बिहार में डेढ़ सौ से ज्यादा मासूम बच्चों को निगल गया. इन बच्चों की मौत का जितना जिम्मेदार ये मर्ज था उतना ही हिस्सेदार प्रशासन भी है. जिसके गैर जिम्मेदाराना रवैए के चलते वो बच्चे मौत का शिकार हुए.

अगर किसी सूबे में डेढ़ सौ से ज्यादा बच्चों की मौत हो जाए तो सूबेदार की जिम्मेदारी बनती है कि जनता के सामने आए और बताए कि ऐसा क्यों हुआ? बताए कि क्या बच्चों को बचाने के इंतजाम काफी थे या नाकाफी. सरकारी अस्पताल में बदइंतजामी की मियाद इतनी लंबी क्यों चली कि मौतों का सिलसिला थमा ही नहीं.

जाहिर है हमारा इशारा नीतीश कुमार की तरफ है. नीतीश कुमार करीब 13 साल से बिहार के सीएम हैं. इस नाते उनकी जिम्मेदारी बनती है कि मुजफ्फरपुर के अस्पतालों में हुई मौत के बारे में सार्वजनिक बयान देकर देश और प्रदेश को बताएं कि जो हुआ, वो क्यों हुआ. लेकिन नीतीश कुमार इन सवालों का जवाब देने से बच रहे हैं. मंगलवार को मुजफ्फरपुर में बचे. बुधवार को दिल्ली में बचे. आज यानी गुरुवार को पटना में बचे.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी साधे हैं चुप्पी

सरकार की तरफ से अधिकारियो ने भले ही इस बारे में कुछ सरकारी जानकारी दे दी लेकिन सूबे के मुखिया और जनप्रतिनिधि होने के नाते मीडिया और जनता को मुख्यमंत्री से जानने और पूछने का हक है कि लापरवाही कहां हुई? अगर उनके हिसाब से नहीं हुई तो भी उन्हें अपनी बात रखनी चाहिए ताकि पता तो चले कि बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इतने बच्चों की त्रासद मौतों को कैसे देख रहे हैं. लेकिन वो चुप हैं.

नीतीश कुमार की चुप्पी ही उनकी घेराबंदी कर रही है. उनका मौन ही उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहा है. यही हाल बिहार के डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी का है. बिहार में स्वास्थ्य मंत्री बीजेपी के कोटे से हैं. बीजेपी नेता सुशील मोदी डिप्टी सीएम हैं. मोदी से भी कल एक कार्यक्रम के दौरान बच्चों की मौत पर पूछा गया लेकिन वो भी कन्नी काट गए.

बिहार में 20 दिनों के भीतर इतने बच्चों की मौत हो जाए, अस्पताल और स्वास्थ्य सुविधाओं पर सैकड़ों सवाल खड़े हो जाएं और डिप्टी सीएम मौन हो, तो इसका क्या मतलब है. आइए सामने और कहिए कि कहां चूक हुई कि ये नौबत आ गई. सुशील मोदी ने ट्विटर पर तो बच्चों की मौतों को प्राकृितक आपदा कह दिया लेकिन कैमरों के सामने कुछ भी कहने से बचते रहे.

काश अश्विनी चौबे ने जो कहा होता उसपर अमल करते

बच्चों की मौत पर सीएम नीतीश कुमार खामोश हैं. डिप्टी सीएम सुशील कुमार मोदी खामोश हैं. बिहार के ही एक तीसरे बड़े नेता और केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री हैं अश्विनी चौबे. अश्विनी चौबे बिहार में भी 2010- 2013 तक स्वास्थ्य मंत्री रह चुके हैं. उनके कार्यकाल में भी एक साल बच्चों की मौतों का आंकड़ा सौ पार कर गया था. तब उन्होंने बतौर स्वास्थ्य मंत्री अगर अस्पतालों की हालत ही ठीक कर दी होती तो शायद आज इतना बुरा दौर न आता.

बतौर स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे ने एक बार चेतावनी देते हुए कहा था कि जो डॉक्टर ठीक से अपनी ड्यूटी नहीं करेगा उसका हाथ काट लिया जाएगा. ऐसे और भी बयान वो देते रहे हैं. तो जो नेता डॉक्टर के लिए काम नहीं करने पर हाथ काट लेने की धमकी दे चुका हो, उसकी भी कोई जिम्मेदारी बनती है या नहीं? अगर बनती है तो उनकी भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.

मुजफ्फरपुर में हुई बच्चों की मौतों के बाद ये सवाल भी उठता है कि वो दिन कब आएगा जब हमारे गांव-देहातों के प्राइमरी हेल्थ सेंटर की हालत सुधर जाएगी. मुजफ्फपुर के अस्पतालों में बच्चों का बेजान जिस्म लेकर बिलखते परिजन भी ऐसा ही सवाल कर रहे हैं. बस इंतजार है तो उनके चुने हुए नेताओं के जवाब का. जो अब तक खामोश ही हैं.