holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार
holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

होली प्रेम की वह रसधारा है, ऐसा उत्सव है, जो हमारे भीतर के कलुष को धोता है. होली में राग, रंग, हँसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती है. इस त्योहार से सामाजिक विषमताएँ टूटती हैं, वर्जनाओं से मुक्ति का अहसास होता है, जहाँ न कोई बड़ा है, न छोटा; न स्त्री न पुरुष; न बैरी, न शत्रु.
holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

होली प्रकृति का मंगल उत्सव है. भारतीय परम्परा में आनंद का उत्सव. होली समाज की जड़ता और ठहराव को तोड़ने का त्योहार है. उदास मनुष्य को गतिमान करने के लिए राग और रंग जरूरी है— होली में दोनों हैं. यह सामूहिक उल्लास का त्योहार है. परंपरागत और समृद्ध समाज ही होली खेल और खिला सकता है. रूखे और बनावटी आभिजात्य को ओढ़ने वाले समाज का यह उत्सव नहीं है. सांस्कृतिक लिहाज से दरिद्र व्यक्ति होली नहीं खेल सकता. वह इस आनंद का भागी नहीं बन सकता. सालभर के बंधनों, कुंठा और भीतर जमी भावनाओं को खोलने का ‘सेफ्टी वॉल्व’ होली है.

समाज के भीतर देवत्‍व के गुणों की पहचान 

होली प्रेम की वह रसधारा है, जिसमें समाज भीगता है. ऐसा उत्सव है, जो हमारे भीतर के कलुष को धोता है. होली में राग, रंग, हँसी, ठिठोली, लय, चुहल, आनंद और मस्ती है. इस त्योहार से सामाजिक विषमताएँ टूटती हैं, वर्जनाओं से मुक्ति का अहसास होता है, जहाँ न कोई बड़ा है, न छोटा; न स्त्री न पुरुष; न बैरी, न शत्रु. इस पर्व में व्यक्ति और समाज राग और द्वेष भुलाकर एकाकार होते हैं. किसी एक देवता पर केंद्रित न होकर इस पर्व में सामूहिक रूप से समाज के भीतर देवत्व के गुणों की पहचान होती है. इसीलिए हमारे पुरखों ने होली जैसा त्योहार विकसित किया.

फागुन बनारस के घाट की सीढि़यों पर लेट जाता है 

मैं बनारसी हूं. बनारस प्रतिपल उत्सव में जीता है. बेफ्रिकी उसका स्थायी स्वभाव है. इसलिए उत्सव प्रियता मेरी रगों में दौड़ती है. नीत्शे कह गए हैं, ‘बीमार परम्पराएं उदास समाज बनाती हैं’. सो होलियाना मस्ती को बनारसियों ने अपना जीवन दर्शन मान लिया. इसलिए बनारसी पूरे साल होली की मस्ती में रहता है. यही उमंग उसका जीवन सूत्र है. दुनिया भर में लोग होली को मनाते हैं, पर बनारस में होली को पहनते है… ओढ़ते हैं… बिछाते हैं… उसे जीते हैं. फागुन भी आनंद के रामानन्द की तलाश में कबीर बनकर बनारस के घाट की सीढ़ियों पर लेट जाता है.

आखिर काशी में इतनी उत्‍सवप्रियता क्‍यों?  

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

आप सोच सकते हैं कि आखिर काशी में इतनी उत्सवप्रियता क्यों? क्योंकि यहां मृत्यु भी उत्सव है. यहां श्मशान में भी होली खेली जाती है. यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है. मनुष्य की चिता भस्म से खेली जाने वाली होली, ताकि जीवन की आपाधापी को ठेंगे पर रखते हुए हमें जीवन की क्षणभंगुरता का अहसास बना रहे. रंगभरी एकादशी से बाबा विश्वनाथ होली खेलना शुरू करते हैं और दूसरे रोज वे महाश्मशान पर भूत-पिशाच, दृश्य-अदृश्य लोगों के साथ होली खेलते हैं. अमरत्व के उद्घोष के साथ. तभी तो ‘होली खेलत नंदलाल बिरज में’ कृष्ण रंगीले वृन्दावन में गोपिकाओं के साथ होली खेलते हैं. रघुवीरा अवध में साथियों के साथ होली के उमंग में हैं “होली खेले रघुवीरा अवध में”. पर शिव मसाने (श्मशान) में होली खेलते हैं. भूत-पिशाच के साथ चिता भस्म वाली तभी तो यहां गाते हैं, “खेले मसाने में होली दिगम्बर खेले मसाने में होली, भूत पिशाच बटोरी दिगम्बर खेले मसाने में होली” काशी राग की नहीं विराग की नगरी है. यहां लोग शरीर छोड़ कर मोक्ष पाने आते हैं. मरने नहीं. इसलिए काशी से मृत्यु का सम्बन्ध आने-जाने का है. आरोह और अवरोह का विराम और विलाप का नहीं. जो दिगम्बर है वह मसाने में ही होली खेलता है. भारतीय संस्कृति के तीन महानायक हैं राम, कृष्ण और शिव. तीनों की होली से हमें तीनों के जीवन दर्शन का साक्षात्कार होता है. यही बनारसी दर्शन है.

काम बसंत में ही भस्‍म हुआ था 

इस देश में पर्वों के महत्त्व को समझने का मतलब ऋतु परिवर्तन के महत्त्व को समझना है. बसंत के स्वभाव और प्रकृति के हिसाब से उसका असली त्योहार होली ही है. हमारे ऋतुचक्र में शरद और बसंत यही दो उत्सवप्रिय ऋतुएं हैं. बसंत में चुहल है, राग है, रंग है, मस्ती है. शरद में गांभीर्य है. परिपक्वता है. बसंत अल्हड़ है. काम बसंत में ही भस्म हुआ था. तब से वह अनंग तो हुआ, लेकिन बसंत के दौरान ही सबसे ज्यादा सक्रिय रहता है. पहले बसंत पंचमी को बसंत के आने की आहट होती थी. अब ‘ग्लोबल वॉर्मिंग’ से वह थोड़ा आगे खिसक गया है. बसंत की चैत्र प्रतिपदा को ही हमारे पुरखे ‘मदनोत्सव’ मनाते थे.

आजकल मौसम का अलग मिजाज देखने को मिल रहा है. देश के किसी हिस्से में तेज धूप की चुभन, तो कहीं ओले, तो कहीं रात में सर्दी का असर भी बरकरार है. समाज की तरह मौसम का मिजाज भी बदल रहा है.

शरद में राम की पूजा 

होली यानी ‘वसंतोत्सव’ में काम की पूजा होती है, जबकि शरद में राम की पूजा होती है. बसंत बेपरदा है. सबके लिए खुला है. लूट सके तो लूट. कवि पद्माकर कहते हैं-‘कूलन में, केलिन में, कछारन में, कुंजन में, क्यारिन में, कलिन में, कलीन किलकंत है. बीथिन में, ब्रज में, नवेलिन में, बेलिन में, बनन में, बागन में, बगरयो बसंत है.’

गीता में कृष्ण कहते हैं-‘ऋतूनां कुसुमाकर’

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

बसंत में ऊष्मा है, तरंग है, उद्दीपन है, संकोच नहीं है, तभी तो फागुन में बाबा भी देवर लगते हैं. बसंत काम का पुत्र है, सखा भी. इसे ऋतुओं का राजा मानते हैं. इसलिए गीता में कृष्ण कहते हैं-‘ऋतूनां कुसुमाकर’ अर्थात् ऋतुओं में मैं बसंत हूं. बसंत की ऋतु संधि मन की सभी वर्जनाएं तोड़ने को आतुर रहती है. इस शुष्क मौसम में काम का ज्वर बढ़ता है. विरह की वेदना बलवती होती है. तरुणाई का उन्माद प्रखर होता है. वयःसंधि का दर्द कवियों के यहां इसी मौसम में फूटता है. नक्षत्र विज्ञान के मुताबिक भी ‘उत्तरायण’ में चंद्रमा बलवान होता है।

बसंत तो है पर जीवन में इसका एहसास नहीं बचा 

यौवन हमारे जीवन का बसंत है और बसंत सृष्टि का यौवन. तेजी से आधुनिक होता हमारा समाज बसंत से अपने गर्भनाल रिश्ते को भूल इसके ‘वेलेंटाइनीकरण’ पर लगा है. अब बसंत उनके लिए फिल्मी गीतों ‘रितु बसंत अपनो कंत गोरी गरवा लगाएं’ के जरिए ही आता है. मौसम के अलावा जीवन में बसंत का कोई अहसास अब बचा नहीं है.

समाज की उदासी दूर करती है होली 

बसंत प्रकृति की होली है और होली समाज की. होली समाज की उदासी दूर करती है. होली पुराने साल की विदाई और नए साल के आने का भी उत्सव है. यह मलिनताओं के दहन का दिन है. अपनी झूठी शान, अहंकार और श्रेष्ठता बोध को समाज के सामने प्रवाहित करने का मौका है. तमस को जलाने का अनुष्ठान है. वैमनस्य को खाक करने का अवसर है.

मुझे होली पर बनारस बहुत याद आता है 

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

होली में हमें बनारस का अपना मुहल्ला याद आता है. महानगरों से बाहर निकले तो आज भी गांव, कस्बों और मुहल्ले में ही फाग का राग गहरा होता है. मेरे बचपन में मोहल्ले के साथी घर-घर जा गोइंठी (उपले) मांगते थे. जहां मांगने पर न मिलती तो उसके घर के बाहर गाली गाने का कार्यक्रम शुरू हो जाता. मोहल्ले में इक्का-दुक्का घर ऐसे जरूर होते थे, जिन्हें खूब गालियां पड़तीं. जिस मोहल्ले की होलिका की लपट जितनी ऊंची उठती, उतनी ही उसकी प्रतिष्ठा होती. फिर दूसरे रोज गहरी छनती. होलिका की राख उड़ाई जाती. टोलियों में बंटे हम, सबके घर जाते, सिर्फ उन्हें ही छोड़ा जाता जिनके घर कोई गमी होती. मेरे पड़ोसी ज्यादातर यादव और मुसलमान थे, पर होली के होलियारे में संप्रदाय कभी आड़े नहीं आता था. सब साथ-साथ इस हुड़दंग में शामिल होते. अनवर भाई भी वैसे ही फाग खेलते जैसे पं. अमरनाथ. जाति, वर्ग और संप्रदाय का गर्व इस मौके पर खर्च हो जाता.

राग और रंग होली के दो प्रमुख रंग 

हमारे साहित्य और संगीत होली वर्णन से पटे पड़े हैं. उत्सवों-त्योहारों में होली ही एकमात्र ऐसा पर्व है, जिस पर साहित्य में सर्वाधिक लिखा गया है. पौराणिक आख्यान हो या आदिकाल से लेकर आधुनिक साहित्य, हर तरफ कृष्ण की ‘ब्रज होरी’ रघुवीरा की ‘अवध होरी’ और शिव की ‘मसान होली’ का जिक्र है. राग और रंग होली के दो प्रमुख अंग हैं. सात रंगों के अलावा, सात सुरों की झनकार इसके हुलास को बढ़ाती है. गीत, फाग, होरी, धमार, रसिया, कबीर, जोगिरा, ध्रुपद, छोटे-बड़े खयालवाली ठुमरी, होली को रसमय बनाती है. उधर नजीर से लेकर नए दौर के शायरों तक की शायरी में होली के रंग मिल जाते हैं. नजीर अकबराबादी होली से अभिभूत हैं—‘जब फागुन रंग झमकते हों, तब देख बहारें होली की जब डफ के शोर खड़कते हों, तब देख बहारें होली की.’ तो ब्रज भाषा के ताक़तवर कवि पद्माकर कहते है-

फागु के भीर अभीरन तें गहि, गोविंदै लै गई भीतर गोरी।
भाय करी मन की पदमाकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी॥
छीन पितंबर कंमर तें, सु बिदा दई मोड़ि कपोलन रोरी।
नैन नचाई, कह्यौ मुसक्याइ, लला ! फिर खेलन आइयो होरी॥

टेसू के रंगों की पिचकारी 

वैदिक काल में इस पर्व को नवान्नेष्टि कहा गया, जिसमें अधपके अन्न का हवन कर प्रसाद बांटने का विधान है. मनु का जन्म भी इसी रोज हुआ था.अकबर और जोधाबाई तथा शाहजहां और नूरजहां के बीच भी होली खेलने का वृत्तांत मिलता है. यह सिलसिला अवध के नबावों तक चला. वाजिद अली शाह टेसू के रंगों से भरी पिचकारी से होली खेला करते थे.

जेठ-बहू का हुरंगा 

लोक में होली सामान्यतः देवर-भाभी का पर्व है, पर मथुरा के जाव इलाके में राधा-बलराम, यानी जेठ-बहू का हुरंगा भी होता है. पारंपरिक लिहाज से होली दो दिन की होती है. पहले रोज होलिका दहन और दूसरे दिन को धुरड्डी, धुरखेल, धूलिवंदन कहा जाता है. दूसरे रोज रंगने, गाने-बजाने का दौर दोपहर तक चलता है. देश के कई हिस्सों में पूरे हफ्ते होली मनाई जाती है. ब्रज के अलग-अलग इलाकों— बरसाने, नंदगांव, गोकुल, गोवर्धन, वृदांवन में भी होली का रंग अलग-अलग होता है. लेकिन हर कहीं आनंद, सांस्कृतिक संपन्नता और फसलों का स्वागत इसके मूल में है.

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

आंख फोड़ने वाले पेंट 

बौद्ध साहित्य के मुताबिक एक दफा श्रावस्ती में होली का ऐसा हुड़दंग था कि गौतम बुद्ध सात रोज तक शहर में न जा बाहर ही बैठे रहे. परंपरागत होली टेसू के उबले पानी से होती थी. सुगंध से भरे लाल और पीले रंग बनते थे. अब इसकी जगह गोबर और कीचड़ ने ले ली है. हम कहां से चले थे, कहां पहुंच गए? सिर चकराने वाले केमिकल से बने गुलाल, चमड़ी जलाने वाले रंग, आंख फोड़ने वाले पेंट, इनसे बनी है आज की होली.

अश्‍लीलता की सीमा लांघते सम्‍मेलन 

साहित्य में होली हर काल में रही है. सूरदास, रहीम, रसखान, मीरा, कबीर, बिहारी हर कहीं होली है. होली का एक और साहित्य है—हास्य व्यंग्य का. बनारस, इलाहाबाद और लखनऊ की साहित्य परंपरा इससे अछूती नहीं है. समाज की विसंगगियों और राजनीति में अर्न्तविरोध पर चोट करती होली की ये कविताएं भाषा की मर्यादा तो तोड़ती थीं.पर उसमें कलुष नहीं होता था. बनारस में अस्सी पर होने वाला कवि सम्मेलन तो बनारसी होली की पहचान बन गया था. इसमें राजनेताओं की मौजूदगी में उन्हें डंडा करती कविताएं पढ़ी जाती थीं. इन हास्य गोष्ठियों की जगह अब गाली-गलौजवाले सम्मेलनों ने ले ली है. जहाँ सत्ता प्रतिष्ठान पर तीखी टिप्पणी होती है. हालांकि ये सम्मेलन अश्लीलता की सीमा लांघते हैं, लेकिन चोट कुरीतियों पर करते हैं.

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

अब न भीतर रंग है और न बाहर 

होली सिर्फ उच्द्दृंखलता का उत्सव नहीं है. वह व्यक्ति और समाज को साधने की भी शिक्षा देती है. यह सामाजिक विषमताओं को दूर करने का त्योहार है. बच्चन कहते हैं—‘भाव, विचार, तरंग अलग है, ढाल अलग है, ढंग अलग, आजादी है, जिसको चाहो आज उसे वर लो. होली है तो आज अपरिचित से परिचय कर लो.’ फागुन में बूढ़े बाबा भी देवर लगते थे.वक्त बदला है! आज देवर भी बिना उम्र के बूढ़ा हो शराफत का उपदेश देता है. अब न भीतर रंग है न बाहर. होली बालकों का कौतुक है या मयखाने का खुमार. कहां गया वह हुलास, वह आनंद और वह जोगिरा सा रा रा रा! कहाँ बिला गई है फागुन की मस्ती! दिल्ली में हम होलीयारे समाज से वंचित वर्ग हैं. लेकिन बनारस में आज भी होली जिन्दा है. मुझे बनारस याद आता है. वो गलियां याद आती हैं. वो जीवन याद आता है.

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार
holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार

Related Posts

holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार
holi 2020 history in hindi, Holi 2020: काम, बसंत, मसाना, रंग, तरंग, राम, कृष्‍ण और शिव, यही है होली का सार