Opinion: ऐसे तो इनसे 2024 में भी ना हो पाएगा !

बीजेपी 2019 आमचुनाव से पहले भी कई राज्यों में हारी और उसके बाद भी. बावजूद इसके इन तमाम राज्यों में आमचुनाव के नतीजे बीजेपी के पक्ष में एकतरफा रहे.

दिल्ली के एग्जिट पोल के नतीजों को फिलहाल सही मान लेते हैं. मानना ही पड़ेगा. राजनीति के सारे-के-सारे ज्ञानी कमोवेश एक ही बात कह रहे हैं. हालांकि बीजेपी को भरोसा नहीं है. उन्हें ‘एग्जिट पोल’ की बजाय ‘एग्जैक्ट पोल’ का इंतजार है. फिर भी दिख यही रहा है कि दिल्ली में बीजेपी का सपना अधूरा ही रहने वाला है. विपक्ष खुशियां मना सकता है.

बीजेपी विरोधी एक बार फिर इसे मोदी के ढलते करिश्मे के तौर पर पेश कर सकते हैं. हो सकता है 11 फरवरी को दोपहर बाद करेंगे भी. लेकिन क्या दिल्ली (एग्जिट पोल की तर्ज पर ही आए तो) और कई दूसरे राज्यों के विधानसभा चुनाव के हालिया नतीजे बीजेपी से कहीं ज्यादा विपक्ष के लिए चुनौती नहीं है? बीजेपी से कहीं ज्यादा विपक्षी खेमे में चिंतन की जरूरत नहीं है?

राज्यों में काबिज होते क्षत्रपों के लिए दिल्ली फिर भी बहुत दूर है !

2017 में 71 प्रतिशत राज्यों की सत्ता पर काबिज हो चुकी बीजेपी 2019 में झारखंड चुनाव के नतीजे आने के बाद 40 प्रतिशत इलाके में सिमट गई. ये आंकड़े बीजेपी विरोधियों को बड़े हसीन लग सकते हैं. लगते भी हैं. बीजेपी हरियाणा में गिरते-पड़ते सरकार बचा पाई, जबकि महाराष्ट्र में हाथ में आई सत्ता फिसल गई. अब दिल्ली जीतने का 2 दशक से भी ज्यादा पुराना सपना, सपना ही दिख रहा है. लेकिन क्या ये मोदी के छीजते दबदबे का संकेत है? इसे समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों में हुए राज्यों के चुनावी मिजाज को समझना होगा.

2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव से लेकर दिल्ली के चुनाव तक करीब दर्जन भर विधानसभाओं के चुनाव हो गए. बीजेपी 2019 आमचुनाव से पहले भी कई राज्यों में हारी और उसके बाद भी. बावजूद इसके इन तमाम राज्यों में आमचुनाव के नतीजे बीजेपी के पक्ष में एकतरफा रहे. यही वो तथ्य है, जो चीख-चीख कर कह रहा है कि मौजूदा तौर-तरीकों से कांग्रेस हो या दूसरी विपक्षी पार्टियां, 2024 में भी ज्यादा उम्मीद नहीं पाल सकतीं.

लगता यही है कि वोटिंग का एक नया पैटर्न विकसित हुआ है और इसी पैटर्न पर चलते हुए राज्यों और केंद्र की सरकारों को चुना जा रहा है. इसकी वजह मोदी का व्यक्तित्व और उनको लेकर पैदा भरोसा भी हो सकता है, या फिर विपक्ष की गैरमौजूदगी भी.

भूलना नहीं होगा कि जिस झारखंड में बीजेपी विरोधी पार्टियों ने अभी-अभी जीत का जलसा किया है वहां बीजेपी ने चंद महीने पहले 14 में से 12 लोकसभा सीटें जीत ली थीं. जबकि जिस दिल्ली में 11 फरवरी को जीत की पार्टी की तैयारी है, वहां बीजेपी सिर्फ 7 में से 7 लोकसभा सीटें ही नहीं जीती थी, बल्कि दूर-दूर तक कोई था ही नहीं. न कांग्रेस और न ही आप.

वो गुजरात का गणित था…देश का नहीं !

विपक्ष की उम्मीदों को पंख लगने की शुरुआत 2017 में हो गई थी. यहीं से 2019 में मोदी को हटाने के विपक्षी मुगालते परवान चढ़े. 2017 में राहुल गांधी ने पीएम मोदी के गढ़ में घुसकर चुनौती दी. जातियों पर आधारित सतरंगी समीकरण बनाए और विधानसभा चुनाव में कांटे की टक्कर भी दी. नतीजों के बाद यही माना गया कि सरकार भले ही बीजेपी की बन गई, लेकिन जीत कांग्रेस की हुई. कांग्रेस के सपने परवान चढ़ने लगे. बीजेपी विरोधी हवा बदलने का ऐलान कर बैठे. वो भी उसी गुजरात की धरती से, जहां से मोदी का उदय हुआ.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने अरमानों को आसमान पर चढ़ा दिया

लोकसभा चुनाव से ठीक पहले तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़. तीनों की ही सत्ता पर कांग्रेस ने कब्जा कर लिया. इसके बाद तीनों राज्यों से आने वाली कुल 65 लोकसभा सीटों को कांग्रेस बड़ी हसरत के साथ देख रही थी. 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजा आया तो तोते उड़ गए. मध्य प्रदेश में 29 में से 28, छत्तीसगढ़ में 11 में से 9 और राजस्थान में 25 में से 24 लोकसभा सीटें बीजेपी ले गई. जनादेश साफ था. राज्य में बदलाव जरूरी है, लेकिन केंद्र में मोदी मजबूरी हैं.

महाराष्ट्र का महासंदेश भी बिल्कुल साफ

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनसीपी 54 और कांग्रेस  44 सीटें जीत गई. ये किसी चमत्कार से कम नहीं था. महाराष्ट्र के इन्हीं वोटरों ने महज 6 महीने पहले लोकसभा चुनाव में 48 में से 41 सीटें उठाकर एकमुश्त एनडीए को सौंप दी थी. कांग्रेस को 1 सीट का सांत्वना पुरस्कार मिला था. महाराष्ट्र का महासंदेश भी बिल्कुल साथ था. यही कि केंद्र में मोदी का विकल्प दूर-दूर तक नहीं है.

कर्नाटक का कमाल भी मामूली नहीं था

कर्नाटक का केस तो बेहद दुर्लभ है. विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और जेडीएस अलग-अलग लड़े. दोनों के बीच वोट बंटने और कांग्रेस की सिद्धा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर के बावजूद बीजेपी बहुमत नहीं जुटा सकी. कांग्रेस और जेडीएस ने मिलकर सरकार बना ली. फिर लोकसभा चुनाव में दोनों मिलकर लड़े. बावजूद इसके 28 में से 26 सीटें एनडीए ले उड़ा. कांग्रेस और जेडीएस को एक-एक लोकसभा सीट का सिर्फ सांत्वना पुरस्कार मिला. ये कर्नाटक के वोटरों का बिल्कुल साफ इशारा था कि देश की सत्ता के लिए मोदी के सिवा उनकी नजर में कोई दूसरा है ही नहीं. दूर-दूर तक नहीं.

…तो क्या विपक्ष अभी से 2024 में हार मान ले?

भारत जैसे लोकतंत्र में सवा 4 साल पहले ऐसी भविष्यवाणी करना उचित नहीं है. लेकिन विपक्ष के रवैये और अधकचरी रणनीति को देखते हुए ऐसी भविष्यवाणी करने का जी जरूर करता है. हां, आने वाले वर्षों में केंद्र सरकार अगर जनता से जुड़े मोर्चों पर बुरी तरह से फेल होती है, तो यही एक सबसे बड़ी विपक्ष की उम्मीद भी हो सकती है. क्योंकि ऐसी स्थिति में वोटर किसी को जिताने की जगह असल में सत्ता पक्ष को हरा रहा होता है. और इसी हराने में सामने वाला वैसे ही जीत जाता है.

दिल्ली से बीजेपी को बेदखल करने का ख्वाब रखने वाले विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह राज्यों के नतीजों को मोदी के खिलाफ मूड मानने की गलती ना करे. इसी गलती से 2019 में कांग्रेस और कई दूसरे विपक्षी दलों की मिट्टी पलीद हुई. ऐसा न हो कि झारखंड, दिल्ली (अगर एग्जिट पोल के मुताबिक ही नतीजे रहे तो) और फिर आने वाले समय में दूसरे राज्यों के नतीजों को 2024 के लिए जनता का मूड मानने की गलती कर बैठे.

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