Delhi Violence: आपको दिल्ली की कसम…!अपने शहर को बदसूरत बनाने वालों का साथ कभी न दें

दिल्ली में आज जिन हाथों में पत्थर हैं, कल उनमें से ज्यादातर लोग सबसे अधिक अपराध बोध में होंगे. ऐसी भूल कर चुके होंगे, जिसकी भरपाई नहीं होगी, जिसे याद कर ग्लानि ही होगी.
anti caa protest, Delhi Violence: आपको दिल्ली की कसम…!अपने शहर को बदसूरत बनाने वालों का साथ कभी न दें

मंगलवार के दिन दिल्ली दो तरह की तस्वीरों से एक साथ रू-ब-रू होती रही. एक ऐतिहासिक लम्हा था, दूसरी तरफ ऐतिहासिक भूल और चिंता थी.

भूल उनकी, जो हाथों में नफरत के पिस्टल-पत्थर और लाठी-डंडे लेकर सड़क पर उतर आए थे. ऐतिहासिक लम्हा पूरे देश का, जो भारत और अमेरिकी रिश्तों की ऊंचाइयों का गवाह बन रहा था.

चिंता इस बात की कि इन हालात से निपटा कैसे जाए? गर्व और गौरव अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप से ये सुनकर कि जिस मुकाम पर इस वक्त भारत और अमेरिका के रिश्ते हैं, वैसे पहले कभी नहीं रहे.

वेदना और कष्ट उस दिल्ली की, जिसने हमेशा सबको गले लगाने की सीख दी. शान और गुमान उस देश का, जिसने अमेरिका जैसी महाशक्ति के साथ खुद को बराबरी के स्तर पर खड़े देखा.

इन दो तस्वीरों के बीच समझना मुश्किल हो गया कि देश कैसे रिएक्ट करे? दिल्ली खुद को कहां खड़ी देखे? खुशी से सीना ताने या शर्म और गलती के अहसास से सिर झुकाए? या फिर इसी असमंजस में उलझकर आंखें मूंद ले?

काश…मेहमान के शांति संदेश को सुन-समझ पाते!

सुबह-सबेरे अमेरिकी राष्ट्रपति राजघाट पर थे. दिल्ली के कई इलाके हिंसा में झुलस रहे थे. डोनाल्ड ट्रंप बापू की समाधि पर अपनी मौजूदगी से अहिंसा के पुजारी की सीख दुनिया को दे रहे थे. दिल्ली में खुद को भारतीय कहने वाले कुछ लोग हिंसक भीड़ का हिस्सा बनकर एक-दूसरे का खून बहा रहे थे. अमेरिकी राष्ट्रपति का संदेश जितना साफ और स्पष्ट था, उतनी ही स्याह और घिनौनी उन लोगों की करतूत दिखी, जो खुल्लम-खुल्ला सबकुछ तबाह कर देने पर आमादा थे. जान, माल और देश की इमेज भी. आपको दिल्ली की कसम. आप ऐसा न होने दें.

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गर्व के लम्हों पर नफरत को भारी न होने दें

जिस वक्त देश अमेरिका के साथ ऐतिहासिक समझौतों पर दस्तखत कर रहा था, उसी समय दिल्ली के खुशनुमा चेहरे पर कुछ लोग हिंसा के काले अक्षरों से हस्ताक्षर कर रहे थे. सवाल बाकी रह गया कि ऐसा क्यों? इनके पीछे कौन? क्या इससे आपकी दिल्ली की सूरत नहीं बिगड़ी? दिल्ली न इस पार्टी की है, न उस पार्टी की. दिल्ली सिर्फ दिल्ली वालों की है. यही स्थायी सच है. अंतिम सच ये भी है कि हिंसा में राजनीति का भला हो सकता है, दिल्ली का नहीं. आपको दिल्ली की कसम. दिल्ली को बदसूरत बनाने वालों का कभी साथ न दें.

देश के गृहमंत्री और दिल्ली के मुख्यमंत्री राजधानी की चिंता में दिखे. अफसरों का पूरा तामझाम फिक्रमंद होकर बैठकें करता रहा. दिल्ली में लगी नफरत की आग कैसे बुझे? दिल्ली कैसे शांत हो? ये सब उसी वक्त होता रहा, जब हमारे प्रधानमंत्री के सामने अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के गौरव और उपलब्धियों का गान-बखान कर रहे थे. सवाल बाकी रह गया कि देश के गौरव से जुड़े इतने बड़े इवेंट से पहले एजेंसियों ने अपनी जिम्मेदारी में कहां चूक कर दी?

अधिकारों के साथ कुछ सवाल भी हैं, कर्तव्य भी

एक खेमे के लिए ये जंग नागरिकता के नाम पर है, अधिकारों की लड़ाई है. दूसरे खेमे के लिए ये नागरिकता कानून के विरोधियों का विरोध है. सड़क जाम करने का प्रतिकार है. लेकिन विरोध की आग में किसी की जान लेने का अधिकार किसने दिया, ये बड़ा सवाल है.

एक गुट कहेगा कि ये नागरिकता कानून के विरोध की आवाज को दबाने की साजिश है. दूसरा समूह कहेगा कि देखो ये लोग नागरिकता कानून के विरोध में किस हद तक जा रहे हैं. कैसी हिंसा कर रहे हैं. कोई नतीजा नहीं निकलेगा. कोई राजनेता नहीं भुगतेगा. भुगतेगी दिल्ली. भुगतेंगे दिल्ली के लोग. हो सके तो समझदारी दिखाएं. अपनी दिल्ली को बचा लें. दिल्ली के वास्ते आइंदा हाथ में एक भी पत्थर ना उठाएं. आपको दिल्ली की कसम.

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याद रहे…ये पत्थर आपको ही जख्मी करेंगे

याद रहे, दिल्ली में आज जिन हाथों में पत्थर हैं, कल उनमें से ज्यादातर लोग सबसे अधिक अपराध बोध में होंगे. ऐसी भूल कर चुके होंगे, जिसकी भरपाई नहीं होगी. जिसे याद कर ग्लानि ही होगी. जो इन्हीं की अगली पीढ़ियों की दिल्ली को बदनुमा करेगी. और जिसकी गैरत फिर भी न जागे, कम-से-कम उनकी देश को लेकर चिंता पर हमेशा सवाल रहेंगे. जिसने भी पत्थर उठाने के लिए उकसाया, वह न दिल्ली का हो सकता है और न देश का. दिल्ली उन्हें भी याद रखेगी, जिनके हाथों में पत्थर हैं. दिल्ली उन्हें भी याद रखेगी, जिनकी वजह से हाथों में पत्थर हैं. आपको दिल्ली की कसम, दूसरों को एक जख्म भी न दें.

दिल्ली को आपकी हैप्पीनेस क्लास की जरूरत

दिल्ली के स्कूल में नन्ही-सी बच्ची अमेरिकी फर्स्ट लेडी मेलानिया को तिलक लगा रही थी. मेलानिया स्कूल में ‘हैप्पीनेस क्लास’ की मेहमान थीं. उसी वक्त दिल्ली के ही कुछ लोग दिल्ली की खुशी छीन लेने पर आमादा थे. मेलानिया स्कूल के बच्चों में भारत का भविष्य देख रही थीं. हमीं में से कुछ लोग उन्हीं बेटे-बेटियों की दिल्ली के भविष्य में नफरत घोल रहे थे. आपको दिल्ली की कसम, आइंदा ऐसा कभी न हो.

कोई एक नेता मीडिया के सामने आता है. हद से आगे जाकर उकसाने की बातें करता है. फिर दो दिन बाद शांति की अपील करता है. 48 घंटे में इस बदलाव की वजह भी दिल्ली समझती है और इस बदलाव की मजबूरी भी. लेकिन दिल्ली की बहुसंख्यक आबादी ऐसे कर्कश सुरों को नहीं सुनना चाहती. दिल्ली सर्वोदय विद्यालय के उन बच्चों के सुरीले स्वर को सुनना चाहती है, जो आज मेलानिया ट्रंप के साथ थे. दिल्ली को ‘हैप्पीनेस क्लास’ चाहिए, खुशियों पर ग्रहण लगाने वाले चेहरे नहीं. आपको दिल्ली की कसम. अपने-अपने मोहल्लों में सुलह-शांति के लिए ‘हैप्पीनेस क्लास’ जरूर लगाएं.

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