इस्लामोफोबिया का रोना रोने वाले इमरान के राज में नरक भोग रहे ये मुसलमान

इमरान खान उन तकरीरों में शिरकत करते हैं जहां अहमदियों के खिलाफ जहर उगला जाता है. कौन मानेगा इनको शांतिदूत?

UNGA(यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली) में जितना समय इमरान खान ने लिया उतना किसी भी राष्ट्राध्यक्ष ने नहीं लिया. 50 मिनट के जबरदस्ती वाले भाषण में मुसलमान-मुसलमान रटने के अलावा परोक्ष रूप से परमाणु युद्ध की धमकी भी दी.

विदेश मंत्रालय की सचिव विदिशा मैत्रा ने ‘राइट टू रिप्लाई’ का इस्तेमाल करके इमरान खान को करारा जवाब दिया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अपने गिरेबान में झांके. 1947 में वहां अल्पसंख्यकों की जनसंख्या 23 फीसदी थी. वहीं अब घटकर 3 फीसदी रह गई है.

अल्पसंख्यकों की बात छोड़ दीजिए, पाकिस्तान में मुसलमानों की जिंदगी नरक हो रखी है. अहमदिया जमात को वहां न तो समाज न ही कानून मुसलमान मानता है. आजादी के बाद से ही पाकिस्तान में अहमदी मुसलमानों पर जुल्मों सितम का ऐसा दौर चला कि बड़ी संख्या में पलायन कर गए.

जुल्म की शुरुआत

बंटवारे के बाद ही पाकिस्तान में अहमदी मुसलमानों के खिलाफ माहौल तैयार किया जाने लगा था. मुसलमानों के अंदर जहर भरा जाने लगा कि अहमदी जमात मुसलमान नहीं हैं. ये पैगंबर मुहम्मद की तौहीन कर रहे हैं. 1953 में पहली बार अहमदियों के खिलाफ दंगे हुए. कट्टरपंथियों के उकसाने पर चिंगारी भड़क उठी थी.

imran khan on islamophobia, इस्लामोफोबिया का रोना रोने वाले इमरान के राज में नरक भोग रहे ये मुसलमान

अधिकारों से बेदखल

सितंबर 1974 में पाकिस्तान के संविधान में संशोधन करके अहमदियों को गैर मुस्लिम घोषित कर दिया गया. इसके बाद संविधान के शह में उनका उत्पीड़न शुरू हुआ. घरों से निकाला गया, उनके बच्चों को स्कूल से निकाला गया. इबादत पर रोक लगा दी गई. जगह-जगह दंगे हुए जिनमें सैकड़ों अहमदी मारे गए. यहां तक कि उनसे सलाम करने का अधिकार भी छीन लिया गया.

ये काफी नहीं था. 1982 में प्रेसिडेंट जियाउल हक ने संविधान में फिर से संशोधन करके अहमदियों पर पाबंदी लगा दी कि वो खुद को मुसलमान नहीं कह सकते. पैगंबर की तौहीन करने पर मौत की सज़ा और कब्रिस्तान अलग कर दिए गए.

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28 मई 2010 को पाकिस्तान में दो अहमदी मस्जिदों को तालिबान ने निशाना बनाया. लाहौर की बैतुल नूर मस्जिद और दारुल जिक्र मस्जिद. बैतुल नूर मस्जिद में फायरिंग की गई और आत्मघाती बम विस्फोट किया गया जिसमें 94 लोगों की मौत हुई. दारुल जिक्र मस्जिद पर हमले में 67 अहमदी मुसलमान मारे गए.

ये पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का नहीं, मुसलमानों की एक जमात का हाल है. वही इमरान खान UNGA में जाकर रोना रोते हैं कि दुनिया इस्लामोफोबिया की शिकार है. वही इमरान खान उन तकरीरों में शिरकत करते हैं जहां अहमदियों के खिलाफ जहर उगला जाता है. कौन मानेगा आपको शांतिदूत?